रंधावा अब नहीं रहेंगे प्रभारी, पंजाब की राजनीति का असर, सचिन पायलट की ताजपोशी के लिए रास्ता साफ होगा
गहलोत को भी दिल्ली में कर सकते हैं एडजेस्ट
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
पंजाब कांग्रेस का मसला सुलझते ही अब राजस्थान कांग्रेस में सर्जिकल स्ट्राइक की आलाकमान ने पूरी तैयारी कर ली है। राजस्थान का नम्बर पहले था, मगर पंजाब में बदलाव को लेकर उठे असंतोष के बाद राजस्थान में बदलाव थोड़े समय के लिए टल गया। यदि पंजाब में सब कुछ सही रहता तो अभी तक तो राजस्थान कांग्रेस की सूरत पूरी तरह बदल चुकी होती।
अब आलाकमान पहले पंजाब में डेमेज कंट्रोल की कवायद में है। पंजाब के प्रभारी भूपेश बघेल डेमेज को कंट्रोल करने के लिए वहीं डेरा डाले हुए हैं। यह भी अपने आप में आश्चर्य की बात है कि अब तक राजस्थान में अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे सुखजिंदर सिंह रंधावा भी पंजाब में समस्या पैदा करने वालों के साथ है। यूँ कहें कि समस्या को जन्म देने के बड़े कारण है, तो भी गलत नहीं है।
पंजाब में इस बार राहुल गांधी ने भले ही निर्णय का विरोध करने वाले पार्टी नेताओं से बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं, मगर साथ ही स्पष्ट संकेत दे दिया है कि आलाकमान अपने निर्णय को नहीं बदलेगा। बघेल ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अध्यक्ष पद से राजा वडिंग को किसी भी सूरत में नहीं हटाया जायेगा। राहुल के इस स्पष्ट वक्तव्य के बाद रंधावा, चरनजीत सिंह चन्नी भी सहम गए हैं और बीच का कोई रास्ता निकालने के प्रयास में है।
पंजाब के सेटलमेंट के बाद राजस्थान में बदलाव निश्चित ही है। क्योंकि पंजाब का संदेश एक तरह से राजस्थान के उन नेताओं को भी है जो आलाकमान के निर्णय पर एतराज करते हैं। उनकी बोलती बंद करने की ही यह कोशिश है।
अब रंधावा की विदाई तय:
सुखजिंदर सिंह रंधावा काफी वर्षों से राजस्थान के प्रभारी का काम देख रहे हैं। पंजाब में अब विधानसभा का चुनाव है, उनको वहां सक्रिय होना ही है। इस कारण उनको बदला जाना था। मगर उन्होंने पंजाब में आलाकमान के निर्णयों से असहमति जताकर राज्य से अपनी जल्दी विदाई तय कर ली है। यह तो साफ हो ही गया।
राज्य में अशोक गहलोत - सचिन पायलट गुट आमने - सामने है। गहलोत गाहे - बगाहे मानेसर प्रकरण उठाकर सचिन पर हमला बोल देते हैं, ताकि आलाकमान उनको राज्य की जिम्मेदारी न दे। वे मानेसर के बहाने इस कारण भी हमला बोलते हैं ताकि उनके समर्थक विधायकों की आलाकमान के खिलाफ की गतिविधि पर से पर्दा न उठे। रंधावा इस गुटबाजी को थाम नहीं पाए। हुआ ये कि अब खुद ही पंजाब में इसी तरह की गुटबाजी के कारण बन गये। इस वजह से रंधावा की राज्य से विदाई तय है।
गहलोत को राज्य से शिफ्ट करेंगे ?
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा तो इस बात कि है कि आलाकमान अशोक गहलोत को कहां फिट करेंगे। एक बार उनको कांग्रेस अध्यक्ष पद का ऑफर सोनिया गांधी की तरफ से किया जा चुका है, उस समय वे सीएम ही बने रहे। अभी कुछ दिनों पहले अध्यक्ष के प्रस्ताव वाली बात पर अपने ही बयान के कारण उलझ गए। आलाकमान ने भी उस बयान पर संज्ञान लिया।
अब यह तो तय है कि सचिन पायलट को यदि आलाकमान राजस्थान की कमान सौंपता है, जैसी उसकी मंशा है, तो गहलोत को दिल्ली में एडजेस्ट करना होगा। काफी दिनों से गहलोत को दिल्ली में जिम्मेदारी देनी की बातें हवाओं में है। कभी उनको संगठन महासचिव तो कभी कोषाध्यक्ष तक बनाये जाने की बातें हवा में तैरती है। अब क्या होगा, यह तो समय बतायेगा। मगर सचिन को कमान देंगे तो उनको राज्य से बाहर शिफ्ट करने का ही विकल्प रहेगा।
डोटासरा को भी बड़ी जिम्मेदारी की चर्चा:
पार्टी अध्यक्ष के रूप में पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा के काम से आलाकमान प्रभावित है, यह बात राहुल गांधी ने पुष्कर दौरे के समय सार्वजनिक रूप से भी कही है। उनको राज्य में फायर ब्रांड नेता के रूप में जनता जानती है और पसंद करती है। सड़क हो या सदन, भाजपा व राज्य सरकार को वे तकड़ा घेरते है। हमलावर रहते हैं।
उनकी कार्यशैली के कारण राहुल गांधी उनको अब बड़ी जिम्मेदारी भी दे सकते हैं। राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा है कि डोटासरा को भी सचिन, हरीश चौधरी की तरह किसी राज्य का प्रभारी बनाया जा सकता है। अब ये चर्चा है, होता क्या है, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
राज्य कांग्रेस की नई टीम होगी:
कांग्रेस आलाकमान राजस्थान में अगले विधानसभा चुनाव की अभी से तैयारी आरम्भ करना चाहती है। उस लिहाज से ही टीम का गठन किया जा रहा है। आधे से अधिक पुराने प्रदेश पदाधिकारियों को हटाने का कड़ा निर्णय भी हो चुका है। जिलों में नए जिलाध्यक्ष व उनकी नई टीमों का भी गठन इसी ध्येय से किया गया है।
कांग्रेस के राज्य के बदलाव के बाद आने वाली नई टीम की पहली परीक्षा पंचायत राज व स्थानीय निकायों के चुनाव की होगी। उससे ही विधानसभा चुनाव की तैयारी आरम्भ मानी जायेगी।