बीकानेर में बागियों का खेल : चेहरा निर्दलीय, "गणित" किसी और का!
मधु आचार्य ' आशावादी '
नगर निगम चुनाव की बयार अब दिन की तेज गर्मी व रात की सुहानी ठंड के मध्य भी तेजी से बहने लगी है। अब तो लगभग सभी दलीय उम्मीदवारों के चुनावी कार्यालय खुल गए, जिनके बाकी है, उनके कल नामांकन वापस लेने के अंतिम दिन की समाप्ति के बाद खुल जायेंगे। कल हर वार्ड की चुनावी संघर्ष की तस्वीर साफ हो जायेगी। कल ही प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह भी आवंटित हो जायेंगे।
जिन बागियों व निर्दलीयों ने दलीय सीमा का उल्लंघन कर नामांकन दाखिल किया और अपना चुनावी कार्यालय खोल लिया है, उनके नाम वापस लेने की संभावना अब बहुत कम रह गयी है। लेकिन जिन्होंने कार्यालय नहीं खोले है, उनके बैठने या मानने की गुंजाईश अभी भी बनी हुई है।
बागियों की समस्या से कांग्रेस व भाजपा, दोनों ही दल ग्रसित है। राजनीति और वो भी स्थानीय निकाय की राजनीति में बागी एक बड़ी जमात होती है। ये राजनीतिक बागी होते ही हैं चुनावों की गणित बिगाड़ने के लिए। इनको बार बार दल छोड़ते, दल बदलते हुए शर्म भी नहीं आती। वे केवल अपना लाभ देखते हैं और उसके लिए लगाई जाने वाली हर तोहमत को स्वीकार कर लेते हैं। जिनको ' राजनीतिक ढीठ ' की संज्ञा भी दी जाती है।
कुछ तो सोचकर बने हैं बागी :
दोनों दलों में कुछ बागी ऐसे हैं जो सोचकर बगावत की राह पर चले हैं। उसकी अपनी वजह है। जैसे उनका वार्ड पार्षद चुनाव का टिकट पाने का अधिकार था, मगर पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया। किसी और के हाथ में टिकट थमा दी। इस बात से वे नाराज होकर चुनावी मैदान में उतर गए हैं।
ऐसे बागी पार्टी का सिंबल तो नहीं ले सके, मगर खुद अरसे से वार्ड में पार्टी का सिंबल बने हुए हैं। इस वजह से उनके कारण पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को निश्चित रुप से नुकसान होगा। ये सोचकर बागी बने हैं। इस श्रेणी में लगभग 15 वार्ड आते हैं।
कुछ को ' बागी ' बनाया गया है :
इस जमात की दूसरी कैटेगिरी है उन बागियों की जो बगावत तो कर रहे हैं, मगर वे खुद बागी नहीं बने, उनको तो किसी और ने बागी बनाकर उतारा है ताकि चुनावी समीकरण बिगड़े और बागी के जरिये वे अपना राजनीतिक खेल खेल सकें। यह कटु सत्य है और लगभग 9 वार्ड ऐसे हैं जिनमें इस तरह के बागी खड़े हैं, जिनकी डोर कहीं दूर बैठे किसी राजनीतिक खिलाड़ी के पास ही है। वो ही कठपुतली को नचा रहा है।
इन खिलाड़ियों की जमात में दोनों पार्टियों के कुछ नेता व कुछ उम्मीदवार स्वयं शामिल हैं। ये आश्चर्यजनक सत्य है कि इन बागियों खर्चा भी वे उम्मीदवार उठा रहे हैं, जिनके सामने ये बागी खड़े हैं। ये भी बड़ा सत्य है कि इनके खड़े रहने से ही उनकी जीत की संभावनाएं बनेगी।
कुछ पाने की ' उम्मीद ' वाले बागी :
दो तरह के बागियों के बाद बागियों की एक श्रेणी ऐसी भी है जो कुछ ' पाने ' की उम्मीद में बागी बने हैं। जिनके लिए चुनाव या अन्य कोई आयोजन या सामाजिक कार्य, उत्सव की तरह होते हैं, क्योंकि उनमें ही उनकी ' उम्मीद ' पूरी होती है। उस उम्मीद से बड़ा तो उनका जमीर भी नहीं होता है।
ऐसे लोग भी इस बार भी बागी के रूप में बने हैं। जिनमें से कुछ तो कल ' उम्मीद ' पूरी कर हट सकते हैं। बस, उम्मीद पूरी करने वाला चाहिए। इस कारण ही ये बागी नामांकन वापसी से पहले ज्यादा जोर से प्रचार आरम्भ कर देते हैं, ताकि ' उम्मीद ' दायरा बड़ा हो जाये। उनके लिए नामांकन वापसी से पहले किया जाने वाला खर्चा ' इन्वेस्टमेंट ' है।
शहर में बागी बनकर अधिक शोर करते हुए जो भी उम्मीदवार है, वे इस श्रेणी के ही बागी हैं। उनकी यह फ़ितरत लोग जानते हैं, पर इनको फर्क नहीं पड़ता। ' उम्मीद ' से बड़ी ' प्रतिष्ठा ' नहीं होती। इनके जीवन का यही मूल मंत्र है। इस तरह से अभी तक तो बागियों ने ही चुनाव को रोचक बना रखा है। ये रोचकता कितनी बरकरार रहती है, यह तो कल नामांकन वापसी का समय समाप्त होने के बाद ही पता चलेगा।