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सीएम की रेस में थे सतीशन, वेणुगोपाल व चेन्नीथला, विधायकों का झुकाव था वेणुगोपाल की तरफ ज्यादा

राहुल, खड़गे थे असमंजस में, सोनिया ने बताया रास्ता
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

आखिरकार कल केरलम के नए मुख्यमंत्री वी डी सतीशन ने सीएम के रूप में शपथ ले ली। 60 साल बाद पहली बार केरलम में पूरे मंत्रिमंडल ने एक साथ शपथ ली है। ये एक ऐतिहासिक काम हुआ है। आजकल सत्ता का लालच देकर सभी पार्टियां अपने ही असंतोष को थामने का काम करती है। इस असंतोष पर लगाम के चलते ही लंबी अवधि तक मंत्रियों के सभी पद भरे नहीं जाते।

राजस्थान भी इसका उदाहरण है। राज्य में 30 मंत्री बन सकते है, मुख्यमंत्री सहित। मगर सरकार को बने हुए ढाई साल हो गए, 6 मंत्रियों के पद अभी भी रिक्त ही चल रहे है। सरकार ने अपना आधा कार्यकाल 24 मंत्रियों के साथ ही निकाल दिया। वसुंधरा खेमे के विधायक मंत्री बनने की उम्मीद में है, मगर विस्तार हो तब ना। ठीक इसी तरह तमिलनाडु में विजय थलापति ने पहली बार सरकार बनाई है, मगर 9 मंत्री ही बनाये है। बाकी पद राजनीतिक गणित हल करने व समीकरण साधने के लिए खाली रखे हुए है।

मगर कांग्रेस और केरलम के सीएम सतीशन ने इस धारा के विपरीत चलकर मंत्रियों के सभी पद भर दिए और पूरे मंत्रिमंडल को एक साथ शपथ दिलाई। बड़ी बात इस वजह से है, क्योंकि सरकार कांग्रेस की नहीं वरन संयुक्त लोकतांत्रिक गठबन्धन की है। सहयोगी दलों के तय कोटे के नाम भी अभी लिए और शपथ दिलाई। इस कारण 60 साल बाद कांग्रेस ने ऐतिहासिक काम किया है।

ये तीन थे सीएम के दावेदार:

केरलम में इस बार कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन को प्रचंड बहुमत मिला। 10 साल बाद पार्टी सत्ता में आई थी। सीएम पद के दावेदार भी अधिक थे। के सी वेणुगोपाल, शशि थरूर, वी डी सतीशन और रमेश चेन्नीथला मुख्य रूप से दावेदार थे।

थरूर के लोकसभा क्षेत्र तिरुअनंतपुरम में निकाय चुनाव के समय भी भाजपा जीत गई और उसका मेयर बना। विधानसभा चुनाव में भाजपा पहली बार राज्य में 3 सीटें जीती और वे भी थरूर के ही संसदीय क्षेत्र की थी। उनके आलाकमान से सम्बंध भी ठीक नहीं। वो तो पहले ही कट गए। बचे बाकी 3 दावेदार।
 

सबसे मजबूत दावेदार कांग्रेस के संगठन महामंत्री व राहुल के नजदीकी के सी वेणुगोपाल को माना जा रहा था। उसके बाद थे वरिष्ठ नेता रमेश चेन्नीथला। उनको आलाकमान केंद्रीय संगठन से जोड़े हुए है और कई राज्यों की जिम्मेवारी भी दी हुई है। वे वरिष्ठ भी है। चौथे दावेदार थे सतीशन। जो पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे और विजयन सरकार के खिलाफ खूब संघर्ष किया। पदयात्रा निकाली। विपक्ष की सशक्त भूमिका निभाई।

यूं चला प्रोसेस:

सबसे पहले चुनाव के मुख्य पर्यवेक्षक सचिन पायलट व सहायक इमरान प्रतापगढ़ी ने विधायकों से संभावित सीएम पर बात की और रिपोर्ट खड़गे व राहुल को दी। फिर विधिवत विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें मुकुल वासनिक व प्रभारी महासचिव दीपा दास मुंशी गये। विधायकों की राय ली।

अधिक संख्या में विधायक वेणुगोपाल के पक्ष में थे। मगर सतीशन का भी मजबूत और स्वाभाविक दावा था। राहुल और खड़गे ने मंथन किया पर बात तय नहीं हो पाई। इधर सीएम चुनने में देरी को लेकर कांग्रेस की आलोचना भी शुरू हो गयी थी।

तब खड़गे व राहुल ने मामला सीधे  कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अदालत में पहुंचा दिया। सोनिया गांधी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, उनको अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ा। पर उन्होंने खड़गे व राहुल को कह दिया कि इस मसले पर केरल के नेता ए के एंटनी से बात करो, जो वो कहे, स्वीकार लो।

तब मसला पहुंचा एंटनी के पास:

सोनिया के कहने के बाद राहुल व खड़गे ने एंटनी से बात कर हल मांगा। एंटनी केरलम के दिग्गज कांग्रेसी नेता है। बेहद ईमानदार नेता के रूप में उनकी छवि है। वे निष्ठावान कांग्रेसी रहे है। केंद्र में वर्षों तक मंत्री रहे। इन सबसे बड़ी बात, वे गांधी परिवार के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंहराव आदि के समय मे बड़े रणनीतिकार थे। पार्टी के भीतर नेताओं को लेकर उन्होंने एक रिपोर्ट भी तैयार की थी, जो एंटनी रिपोर्ट के नाम से पहचानी जाती है।

एंटनी से जब राहुल ने बात की तो उन्होंने केवल एक लाइन में जवाब दिया --- इस समय हमें उप चुनाव में नहीं जाना चाहिए। यह वाक्य सतीशन का नाम तय करने का आधार बना। इससे वेणुगोपाल पीछे हो गए। क्योंकि यदि वेणुगोपाल को सीएम बनाया जाता तो दो उप चुनाव होते। वेणुगोपाल सीएम बनने के लिए विधायक का चुनाव लड़ते, उसके लिए एक विधायक इस्तीफा देता। उस पर उप चुनाव होता और वेणुगोपाल लड़ते। साथ ही सीएम बनने के लिए वेणुगोपाल को लोकसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ता, वहां भी उप चुनाव होता। एंटनी इस कारण ही कहा कि उप चुनाव में जाने से बचना चाहिए। वेणुगोपाल इस बात से पिछड़ गए।
 

सतीशन तय हो गए। क्योंकि वेणुगोपाल के बाद सर्वाधिक विधायक उनके ही साथ थे। वे 5 साल से वाम सरकार के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष के रूप में संघर्ष भी कर रहे थे, इस कारण स्वाभाविक रूप से सीएम के दावेदार थे। यूं तय हुआ केरलम का सीएम।