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तभी तो कहते हैं कि राजनीति में दुश्मनी स्थायी नहीं होती, ममता बिल्कुल नए अंदाज में नजर आयी

 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

राजनीति को दुनिया में सबसे रहस्यमयी काम माना जाता है। उसकी वजह भी है। प्लेटो और अरस्तु ने जिस तरह से राजनीति की व्याख्या कर सार्वभौमिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था और दुनिया की राजनीति उस पर चली थी, अब वे सिद्धांत केवल किताबों में कैद सुंदर तहरीर बनकर रह गए हैं। राजनीति उन पर जरा सी भी नहीं चलती दिखती।
 

ज्यादा दूर न जाएं और गांधी, नेहरू, पटेल को ही याद कर लें। उनकी राजनीति पर ही एक नजर डाल लें तो भी लगेगा राजनीति कितनी बदल गयी। कितने नए सिद्धांत बन गए। जिनकी कल्पना अरस्तु व प्लेटो को छोड़ें, गांधी - नेहरू और पटेल तक ने नही की थी। आज यदि वे होते तो राजनीति के पल पल रंग बदलकर ईस्टमैन कलर होते देखते तो शायद राजनीति को छोड़ गुमनामी में चले जाते।

राजनीति का एक और उजला पक्ष नेहरू, पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भीमराव अंबेडकर, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, राम मनोहर लोहिया, नंबूदरीपाद, मुलायम सिंश यादव, ताऊ देवीलाल, चौधरी चरण सिंह, कामराज आदि ने भी देश के सामने रखा था। तभी तो नेहरू के मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे। देश में सरकार कांग्रेस की और संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का पक्ष रखने अटल बिहारी वाजपेयी गए। नेहरू ने खुद कहा कि एक दिन अटल बिहारी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे। वे बने भी जनता पार्टी के शासन में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे। उस समय विदेश मंत्रालय की बिल्डिंग में पंडित नेहरू का चित्र लगा था। जो एक चापलूस अधिकारी ने हटा दिया तो अटल जी गुस्से में आ गए। उस अधिकारी को डांटा और नेहरू का चित्र वापस लगवाया। 
 

राजनीति एक गरिमा के सिद्धांत से चलती रही। मगर पिछले ढाई दशक में राजनीति ने अपने रंग को ही बदल लिया। अब तो राजनीति के सिद्धांत नेता लोग रोज गढ़ते है और रोज मिटाते है। मतलब सिद्धांत के बिना की राजनीति का बोलबाला हो गया है। 

राजनीति की ये कहानी इसलिए...

कल दिल्ली में इंडिया गठबन्धन की बैठक हुई। इस बैठक में देश के विपक्ष के छोटे - बड़े 25 राजनीतिक दल शामिल हुए। बैठक उस बड़े राजनीतिक परिणाम के फलस्वरूप हुई थी जो विधानसभा चुनावों के परिणामों से निकला था। पश्चिम बंगाल, असम व तमिलनाडु में विपक्षी दलों को भाजपा ने बेहद करारी शिकस्त दी। विपक्ष बिखर गया। बंगाल को ममता बनर्जी की टीएमसी का अभेध किला माना जाता था मगर उस पर भाजपा ने विजय पा ली। सरकार बदलाव के साथ ही टीएमसी पर भाजपा ने राजनीतिक प्रतिशोध रख राजनीतिक हमला बोला। टीएमसी बिखर गई। पार्षद, अधिकतर विधायक व सांसद भी पार्टी छोड़ भाग लिए। ममता को अकेला छोड़ दिया। हालत यहां तक हो गयी कि उनके भतीजे व सांसद अभिषेक बनर्जी पर हमला तक किया गया।

रोज ईडी, इनकम टैक्स आदि के टीएमसी नेताओं पर छापे। डर गए टीएमसी के नेता और पार्टी छोड़ भाजपा की शरण मे आना शुरू हो गये।
 

ममता के इस कठिन दौर में राहुल ने उनसे फोन पर बात की और इंडिया गठबंधन की बैठक का निमंत्रण दिया। ताकत में जब ममता थी तो गठबन्धन से दूरी बनाए हुए थी, मगर गर्दिश के इन दिनों में गठबन्धन की बैठक में आने के लिए तुरन्त हां भर दी।
 

जिस राहुल गांधी और कांग्रेस को ममता कोसते हुए नहीं थकती थी, उसके प्रति बोल ही बदल गए। जब वे ताकत में थी तो भूल गयी कि सोनिया गांधी ने ही कांग्रेस के शासन में उनको बंगाल का सीएम बनाया। बाद में उन्होंने अपनी पार्टी बना ली और कांग्रेस को हिकारत से देखने लगी। कभी समझौता नहीं किया। कांग्रेस से इंडिया गठबंधन का नेतृत्त्व छिनने की कोशिश की। अंट शंट राहुल व कांग्रेस के लिए बोला।

मगर सोमवार को इंडिया गठबंधन की बैठक से दो तस्वीरें ऐसी निकलकर सामने आई, जिनको देखकर जनता चकित है। बड़बोली ममता ने एक तस्वीर में सोनिया गांधी को गहरे से गले लगा बड़ी झप्पी डाली हुई है। वहीं दूसरी तस्वीर में वह राहुल के पास बैठी उनसे गंभीर चर्चा करने में मशगूल है। 
 

ये दो तस्वीरें बदली हुई राजनीतिक विचारधारा का प्रतिबिंब है और यह बताती है कि आधुनिक राजनीति का यह सिद्धांत सही है कि राजनीति में कभी भी दुश्मनी स्थायी नहीं रहती।