थार से नई राजनीतिक धड़ेबंदी की शुरुआत, आरएलपी के प्रति नरम रुख भी चकित करने वाला
पंचायत चुनावों का भी बिगुल फूंक दिया
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Special.
मकर सक्रांति के दिन थार के धोरीमन्ना में एक बड़ी महारैली निकालकर कांग्रेस ने प्रदेश में बन रहे नये राजनीतिक समीकरणों का बिगुल भी बजा दिया है। इस महारैली ने जहां एक तरफ कांग्रेस के भीतर की कई धड़ेबंदियो को गिराया है, वहीं नये बदलाव की तरफ भी ईशारा किया है।
धोरीमन्ना की इस महारैली में जहां कांग्रेस का एक गुट पूरी तरह से सक्रिय दिखा, वहीं एक गुट पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। उनकी बड़े जन आंदोलन में कोई भागीदारी ही नजर नहीं आई।
पंचायतों की सीमाओं को तोड़ उनके जिले बदलने के खिलाफ धोरीमन्ना में धरना आरम्भ हुआ। इस धरने से पहले सचिन पायलट गुट के व बुजुर्ग कांग्रेसी नेता हेमाराम चौधरी जुड़े। फिर बायतु विधायक व कांग्रेस के मध्यप्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी समर्थन में आये। उसके बाद बाड़मेर सांसद व पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा के निकटस्थ व पायलट गुट के उमेदराम बेनीवाल मैदान में उतरे। धोरीमन्ना में 14 जनवरी को महारैली की घोषणा हुई और उसमें आने के लिए सचिन पायलट, गोविंद डोटासरा व टीकाराम जुली ने घोषणा कर दी। एक धड़े की कड़ी से कड़ी जुड़ती गयी।
कांग्रेस का एक गुट उपेक्षित रहा:
एक कथित सीडी कांड के बाद कांग्रेस ने पूर्व विधायक मेवाराम जैन को पार्टी से निष्काषित किया। पार्टी उम्मीदवार का विरोध कर रवींद्र सिंह भाटी का समर्थन करने पर अमीन खान को भी पार्टी से निकाला गया था। ये दोनों पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निकटस्थ है।
पिछले दिनों इन दोनों को वापस पार्टी में लेने की कवायद शुरू हुई। हरीश चौधरी ने उसका विरोध किया, उनको सचिन पायलट व सांसद उमेदराम बेनीवाल का समर्थन था। मगर गहलोत ने इन दोनों की कांग्रेस में वापसी करा दी। हरीश चौधरी ने खुलकर विरोध किया। मगर कुछ भी बदलवा नहीं सके।
थार की राजनीति में जैन व अमीन खान भी बड़े नेता है। मगर धोरीमन्ना के इस आंदोलन से ये दोनों ही नेता कोसों दूर थे। इनको बुलाया तक नहीं गया। न अशोक गहलोत को 14 को आने के लिए कहा गया। पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली व सचिन पायलट के आने के बाद भी ये सार्वजनिक आयोजन में शामिल नहीं किये गए। अलग से ही इनकी इन नेताओं से मुलाकात हो सकी। गहलोत गुट के जैन व खान मजबूरन चुप ही रहे। वहीं हरीश चौधरी मुखरित रहे।
हरीश का मास्टर स्ट्रोक:
इस आंदोलन को हरीश चौधरी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। उन्होंने करीने से एक गुट व उसके नेताओं को अलग कर प्रदेश कांग्रेस में नए समीकरणों का संकेत दे दिया। पिछले दिनों उनकी व डोटासरा की अकेले में हुई लंबी बातचीत का परिणाम इसको माना जा रहा है।
आरएलपी के प्रति भी रुख बदला:
आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल व हरीश चौधरी के बीच छतीस का आंकड़ा है, जो जग जाहिर भी है। मगर धोरीमन्ना आंदोलन से उसमें भी कुछ नरमी दिखी। वो नरमी हेमाराम चौधरी की वजह से थी। हनुमान बेनीवाल हेमाराम जी का सम्मान करते है, इस कारण उनके आंदोलन को समर्थन दिया। वहीं मंच से अपने भाषण में हरीश चौधरी ने भी थार की आरएलपी का धन्यवाद दिया।
पंचायत चुनावों का शंखनाद भी:
पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली, सचिन पायलट व हरीश चौधरी ने इस आंदोलन व धोरीमन्ना महारैली से पंचायत चुनावों का भी बिगुल फूंक दिया। सभी नेताओं के भाषणों में सरकार को पंचायत चुनाव में हराकर सबक सिखाने की बात थी। पंचायत चुनाव का इसे बिगुल बजाना ही कहा जायेगा, मगर बिगुल पूर्व सीएम अशोक गहलोत की अनुपस्थिति में बजाया गया। उनके गुट के भी नेता उपस्थित नहीं थे।
धोरीमन्ना का असर दूर तक जायेगा:
धोरीमन्ना की इस महारैली का असर केवल थार तक सीमित नहीं रहेगा, पूरे प्रदेश की कांग्रेस राजनीति पर इसका प्रभाव पड़ेगा। आने वाले दिनों में प्रदेश की कांग्रेस में नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिलेंगे।