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प्रदेश की गुटबाजी का जिलों पर भी दिख रहा है असर, सब देख रहे विधानसभा चुनावों के लिए समीकरण

जिला संगठनों के गठन से भी उपजा असंयोष असर करेगा
बिना बदलाव नहीं सुधरेगी राज्य कांग्रेस की दशा
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

राजस्थान में अब पंचायत राज व स्थानीय निकाय चुनाव के लिए सियासी शतरंज बिछनी आरम्भ हो गयी है। एक लंबी अवधि के बाद इन दोनों स्थानीय सरकारों के चुनाव हाईकोर्ट के दखल के बाद हो रहे हैं, इस वजह से लोगों में खास उत्साह भी है। दरअसल, इन संस्थानों के जरिये ही आजकल केंद्र व राज्य सरकारें अपनी विकास योजनाओं को क्रियान्वित करती है। विकास की यात्रा भी इन संस्थानों से ही शुरू होती है तो लोगों की आधारभूत सुविधाएं भी इन्हीं सरकारों के माध्यम से मिलती है। इस वजह से इन सरकारों को लेकर नेताओं और जनता, दोनों का खास मोह भी रहता है।
विधानसभा और लोकसभा में तो चुनाव लड़ने की एक सीमा होती है, ये चुनाव हर कोई तो लड़ नहीं सकता। जो राजनीति में सक्रिय होते हैं, उनकी नजर इस हालत में स्थानीय निकाय व पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव पर ही रहती है। इस कारण ही इस चुनाव को लेकर नेताओं - कार्यकर्ताओं का विशेष आकर्षण रहता है।

इस समय में राज्य में इन चुनावों के लिए पूरी तरह से माहौल बन गया है। जिला, ग्राम पंचायत स्तर पर एक तरफ जहां राजनीतिक दल सक्रिय हो गए हैं वहीं चुनाव लड़ने के ईच्छुक नेता - कार्यकर्ताओं ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और टिकट की जुगाड़ में लग गए हैं। अपने अपने आकाओं को पकड़ने में लगे हैं। भाजपा व कांग्रेस ने सांगठनिक स्तर पर भी कमेटियां बना अपने नेताओं को चुनावी कमान सौंप दी है। कुल मिलाकर स्थानीय निकाय व पंचायती राज विभाग चुनावों की शतरंज बिछ गई है और मोहरे भी तैयार हो गए हैं।

कांग्रेस और स्थानीय सरकारों के चुनाव:

राजस्थान में इस समय भाजपा की सरकार है और कांग्रेस विपक्ष में है। आमतौर पर कांग्रेस का हर दौर में पंचायत राज चुनावों में वर्चस्व रहता है। भाजपा इन चुनावों को अभी तक साध नहीं पाई है। जबकि स्थानीय निकायों के चुनाव में अधिकतर भाजपा का पलड़ा भारी रहता है। इस विचार के आधार पर ही दोनों पार्टियां भी अपनी रणनीति बनाती है।

कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव हारी थी। इस वजह से इन चुनावों को लेकर वह ज्यादा उत्साहित हैं। जिनके माध्यम से कांग्रेस अगले विधानसभा चुनाव तक की यात्रा तय करना चाहती है। उसी के अनुसार तैयारी भी की जा रही है।
 

मगर कांग्रेस के लिए इस बार स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों की राह इतनी आसान नहीं है। अपनी ही गुटबाजी के कारण कांग्रेस इन चुनावों को लेकर उलझती नजर आ रही है। शहरी क्षेत्रों में वैसे भी भाजपा का प्रभाव ज्यादा है, वो तो विधानसभा चुनाव से ही स्पष्ट है। इसके अलावा राज्य में भी भाजपा की सरकार है, जिसका स्वाभाविक लाभ उसे मिलेगा। कांग्रेस शहरों में तो ज्यादा गुटबाजी में उलझी हुई है।
 

पंचायत राज चुनावों में हालांकि अधिकतर कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता आया है। मगर इस बार उसकी राह आसान नहीं लगती। क्योंकि पिछले 7 सालों से गुटबाजी में उलझी कांग्रेस एकजुट होगी, यह मुश्किल लगता है। इस गुटबाजी का फायदा उठाने की भाजपा पूरी तरह से तैयारी कर रही है। इसलिए उसने संभागवार नेताओं को जिम्मेवारी भी सौंप दी है। 

पहले कांग्रेस में सीधे सीधे दो गुट, अशोक गहलोत व सचिन पायलट के थे। इन दोनों की टकराहट तो सार्वजनिक है और नेताओं की स्थिति भी स्पष्ट है कि कौन किसके साथ है। यह दोनों गुट लगातार आपस में टकराते रहते हैं। इन दो गुटों के मध्य अब एक तीसरा गुट पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा का भी खड़ा हो गया है। हाल में डोटासरा का गहलोत पर किया गया तंज इस गुटबाजी को चौड़े ले आया है। इस तरह अब अशोक गहलोत, सचिन पायलट व गोविंद डोटासरा, यह तीन गुट साफ़ साफ नजर आते हैं और गांव व पंचायत तक नेता व कार्यकर्ता इन गुटों में बंटे हुए भी दिखते हैं। इस गुटबाजी का प्रतिकूल असर स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों पर पड़ना निश्चित है, इस कारण ही चुनावों को लेकर कांग्रेस की राह आसान नहीं है।

जिला संगठनों के गठन से गुटबाजी बढ़ी है:

संगठन सृजन अभियान के तहत इस बार कांग्रेस आलाकमान ने तटस्थ भाव से जिला अध्यक्ष बनाने का काम किया। उसका असर भी रहा। अनेक वाजिब कार्यकर्ताओं को अवसर मिला, कमियां तो फिर भी रही जो स्वाभाविक भी थी।असल खेल जिला कार्यकारिणी के गठन के समय हुआ। यह काम आलाकमान ने प्रदेश नेतृत्त्व पर छोड़ दिया। वहीं से चूक होनी आरम्भ हो गयी और पूरे प्रदेश की कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी समस्या बन गयी। 
कुछ जगह आपराधिक छवि वाले तो कुछ जगह भाजपा के प्रति सॉफ्ट रहने वाले भी पदाधिकारी बन गए। कुछ तो वो भी पदाधिकारी बन गए जो पहले निष्क्रियता की श्रेणी में आ चुके थे। कुछ ऐसे पदाधिकारी भी जिलों में बने हैं, जिनके भाजपा नेताओं से गहरे व निकट के रिश्ते है। जबकि राहुल गांधी का स्पष्ट निर्देश था कि जो भाजपा के प्रति सॉफ्ट है, निष्क्रिय है और बारात के घोड़े है, उनको घर बिठाया जाए। मगर इस निर्देश की तो पूरी तरह पालना नहीं हुई है। जिससे असंतोष भी उभर के सामने आया है। इसका असर स्थानीय निकाय व पंचायत राज चुनावों पर पड़ना तय है।

बिना बदलाव नहीं सुधरेगी दशा:

राजस्थान कांग्रेस में तीव्र गुटबाजी है, यह बात जगजाहिर है। आलाकमान के गुटबाजी खत्म करने के सारे प्रयास बेकार सिद्ध हो चुके हैं। अब तो प्रदेश कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव ही कांग्रेस को लाभ की स्थिति में लाकर गुटबाजी को समाप्त कर सकता है। यदि प्रदेश स्तर पर बदलाव नहीं हुआ तो स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों में बेहतर परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती।