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24 मंत्रियों के सहारे ही चल रही राज्य की सरकार, ढ़ाई साल बाद भी न मंत्री बने, न राजनीतिक नियुक्तियां हुई

संगठन में फिर मिल रहे पहले बदलाव के संकेत
पंचायत व निकाय चुनाव बड़ी चुनोती बने
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

राजस्थान की भजनलाल सरकार को बने ढ़ाई साल हो गये, मगर अब भी मंत्रियों की निर्धारित संख्या को पूरा नहीं किया जा सका है। 200 विधानसभा सदस्य हैं तो 15 प्रतिशत के हिसाब से मुख्यमंत्री सहित 30 मंत्री राज्य सरकार में हो सकते हैं। यह अपने आप में विचित्र बात है कि जब से राज्य की भजनलाल सरकार बनी है तब से इसमें मंत्री कभी भी पूरे 30 नहीं रहे हैं।

आरम्भ में 25 मंत्री बनाये गए। सुरेंद्र पाल सिंह टीटी को मंत्री बनाया गया जबकि वो उस समय विधायक नहीं थे। करणपुर से भाजपा के उम्मीदवार थे, जहां विधानसभा चुनाव गुरमीत कुन्नर के निधन के कारण स्थगित हो गए थे। टीटी को मंत्री रहते हुए करणपुर से चुनाव लड़ाया, मगर उसके बाद भी वे जीत नहीं सके। हारने के बाद टीटी को इस्तीफा देना पड़ा और सीएम सहित कुल मंत्री 24 रह गए, वही मंत्री आज भी बने हैं। मन्त्रिमण्डल का उसके बाद से विस्तार ही नहीं हुआ।

राज्य की भजनलाल सरकार आधे से अधिक कार्यकाल केवल 24 मंत्रियो के सहारे निकाल चुकी है। ऐसा नहीं है कि सीएम ने मन्त्रिमण्डल विस्तार व पुंर्गगठन का प्रयास न किया हो। अनेकों बार यह प्रयास हुए मगर बात कभी भी सिरे नहीं चढ़ पाई। विधायक मंत्री बनने के लिए जयपुर से दिल्ली तक दौड़ लगाते, लॉबिंग करते मगर बाद में थककर बैठ जाते। सरकार के जब 2 साल पूरे हुए तो एकबारगी तो तय हो गया कि मंत्रिमंडल विस्तार हो ही रहा है, मगर बात फिर अटक गई। जो अटकी वह अब तक आगे नहीं सरक सकी है। मंत्री बनने की चाह में दौड़ लगाने वाले कई विधायक तो थककर अब उम्मीद ही छोड़ चुके हैं। वसुंधरा राजे समर्थक विधायक तो अब मौन भी हो गए हैं। अब जल्दी मंत्रिमंडल का विस्तार व पुनर्गठन होता प्रतीत नहीं हो रहा है।

मंत्रियो के पास अतिरिक्त प्रभार:

चूंकि मंत्री केवल 24 है तो जाहिर है मंत्रियो के पास अतिरिक्त विभाग भी है। उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी, प्रेमचंद बैरवा के पास भी ज्यादा विभाग है। इसी तरह संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर, कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा आदि के पास भी बड़े बड़े महकमे है। 

जाहिर है, इस स्थिति में काम तो प्रभावित होता ही है। किरोड़ी लाल मीणा के पास कृषि जैसा बड़ा महकमा है मगर साथ में दूसरे विभाग भी है। उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी के पास वित्त मंत्रालय के अलावा कला, संस्कृति, पर्यटन व पीडब्लूडी जैसे महकमे भी है। दूसरे उप मुख्यमंत्री डॉ प्रेमचंद बैरवा के पास उच्च शिक्षा के अलावा परिवहन जैसा बड़ा मंत्रालय भी है। यदि मंत्रिमंडल के रिक्त 6 पद भर जाएं तो संतुलन होगा और सरकार के कामकाज में भी सुधार होगा।

राजनीतिक नियुक्तियां फिर टल गई:

मंत्रिमंडल विस्तार व पुनर्गठन का काम टलने से जो सबसे अधिक काम प्रभावित हुआ है वह है राजनीतिक नियुक्तियों का। मंत्रिमंडल विस्तार के बिना यह काम होना संभव नहीं है। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद ही नियुक्तियां होगी, यह तो अब पूरी तरह से स्पष्ट है।

 

अब कोई भी राजनीतिक नियुक्ति हो, उसे पूरा काम करने का अवसर तो मिलेगा नहीं। अधिकतर नियुक्तियों की अवधि 3 साल होती है मगर सरकार का कार्यकाल भी इतना नहीं बचा। साथ ही, अंतिम 6 महीनें तो आचार संहिता रहती है। उस समय को हटा दिया जाए तो नियुक्ति पाने वाले को 2 साल भी काम के लिए नहीं मिलेंगे। 

संगठन में बदलाव के भी संकेत:

राज्यसभा चुनाव के बाद अब राज्य के भाजपा संगठन में भी बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। अभी तो नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को अपनी टीम बनानी है। राज्य की उसमें भी भागीदारी होगी। उसी छांव में राज्य की टीम में भी परिवर्तन तय माना जा रहा है। उसकी भी अब पूरी तैयारी है।


पंचायत व निकाय चुनाव चुनोती:

राज्य सरकार अलग अलग कारणों से बार बार पंचायत व निकाय चुनाव टाल रही है। कोर्ट लगातार सरकार को चुनाव कराने के लिए कह रहा है। अब तो ऐसा लगने लग गया है कि सरकार इन चुनावों से बचना चाह रही है। आधा कार्यकाल पूरा करने के बाद भी सरकार की जल्दी पंचायत व निकाय चुनाव कराने की मंशा दिख नहीं रही।