UP Politics : यूपी में लाल-नीले पर सियासी संग्राम, अखिलेश के नीले कार्ड पर मायावती गुस्से में लाल, कांग्रेस पर भी निशाना!
Rudra News Express Lucknow.
उत्तर प्रदेश की सियासत में अब रंग भी सियासी बयान बन गए हैं। समाजवादी पार्टी के पारंपरिक लाल रंग के बीच नीले रंग की एंट्री ने बहुजन राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी छात्रसभा की नई ड्रेस लॉन्च करते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नीले रंग को युवाओं, नई पीढ़ी और बहुजन समाज का रंग बताया। इसके साथ ही उन्होंने इसे अन्याय के खिलाफ लड़ाई और पार्टी की विचारधारा से भी जोड़ा।
सपा कार्यालय में समाजवादी छात्रसभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता नीली टीशर्ट, नीली जींस और लाल टोपी में नजर आए। अखिलेश यादव ने छात्रसभा के लिए इस नई ड्रेस को लॉन्च किया। अब यही छात्रसभा की आधिकारिक ड्रेस होगी।
नीले रंग पर अखिलेश का बयान :
नई ड्रेस लॉन्च करने के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि नीला रंग युवाओं का रंग है, नई पीढ़ी का रंग है और बहुजन समाज का रंग है। उन्होंने इसे अन्याय के खिलाफ लड़ाई का रंग बताते हुए कहा कि नीला रंग बहुजन समाज के साथ विचारधारा का भी रंग है। अखिलेश ने कहा कि नई पीढ़ी की नई सोच होती है। इसी सोच के साथ समाजवादी पार्टी अब छात्रों और युवाओं से सीधे संवाद करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत छात्र जागरूकता अभियान शुरू किया जाएगा।
मायावती ने खोला मोर्चा :
अखिलेश के नीले रंग को बहुजन समाज और विचारधारा से जोड़ने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा और कांग्रेस पर हमला बोल दिया। मायावती ने कहा कि सपा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल नीला रंग सिर्फ दिखावे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। केवल नीला रंग पहनने या मंच पर इस्तेमाल करने से दलितों, गरीबों और बहुजन समाज के प्रति किसी दल की सोच नहीं बदल जाती। उन्होंने विपक्षी दलों पर जातिवादी, संकीर्ण, सामंतवादी और पूंजीवादी सोच नहीं बदलने का आरोप लगाया।
मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर कहा कि सिर्फ नीला रंग अपना लेने से सोच नहीं बदल जाती। उन्होंने सपा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर दिखावे के लिए नीले रंग का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और कहा कि ये दल दिल से कभी सच्चे अंबेडकरवादी नहीं हो सकते।
मायावती ने कहा कि नीला रंग अपनाकर सपा और कांग्रेस दलितों और गरीबों के प्रति अपनी जातिवादी और पूंजीवादी सोच नहीं छिपा सकतीं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये पार्टियां दलितों और पिछड़ों के मुद्दों पर गिरगिट की तरह रंग बदलती हैं।
बसपा प्रमुख ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वाले नारे पर भी सवाल उठाया और इसे दोगला तथा बेईमान बताया। उन्होंने दावा किया कि एकमात्र सच्ची अंबेडकरवादी पार्टी बसपा है। कांग्रेस को भी मायावती ने निशाने पर लिया। उन्होंने कांग्रेस को डूबते जहाज जैसा बताते हुए बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के कांग्रेस से दूर रहने की चेतावनी का हवाला दिया।
क्या है अखिलेश के लाल में मायावती के नीले का समीकरण!
दरअसल, सपा की राजनीतिक पहचान लंबे समय से लाल रंग से जुड़ी रही है। ऐसे में सपा छात्र सभा की नई नीली ड्रेस ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है। बसपा की राजनीति में नीला रंग अंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति की पहचान से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि मायावती ने सपा की इस पहल को महज संगठनात्मक फैसला मानने के बजाय राजनीतिक संदेश के तौर पर लिया है।
आकाश आनंद प्रकरण भी चर्चा में :
इसी बीच बसपा से बाहर किए गए आकाश आनंद को लेकर भी सियासी चर्चाएं तेज हैं। सपा और कांग्रेस की ओर से आकाश आनंद को अपने साथ आने का ऑफर दिए जाने की चर्चाओं को यूपी में दलित वोटों के नए समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। आकाश आनंद का फैक्टर इस समीकरण को और दिलचस्प बना देता है। बसपा से बाहर किए गए आकाश आनंद युवा चेहरा हैं और उनके अगले राजनीतिक कदम पर यूपी की राजनीति की नजर है। सपा और कांग्रेस से उनकी संभावित नजदीकी की चर्चाएं यदि आगे बढ़ती हैं, तो इसका असर दलित वोटों के समीकरण पर पड़ सकता है।
लाल के बीच नीला रंग, यूपी में दलित वोट की नई खींचतान :
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों का अपना सियासी अर्थ है। भाजपा के लिए भगवा, समाजवादी पार्टी के लिए लाल और बसपा के लिए नीला रंग लंबे समय से राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में सपा के राजनीतिक कार्यक्रम में नीले रंग की बढ़ती मौजूदगी को केवल ड्रेस या रंग के बदलाव के रूप में देखना आसान नहीं है। सपा की ओर से PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश पहले से चर्चा में रही है। ऐसे में नीले रंग का इस्तेमाल उस सामाजिक दायरे तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है, जिसे बसपा लंबे समय से अपना मजबूत आधार मानती रही है।
यूं समझिए मायावती की चिंता :
बसपा की राजनीति में नीला रंग केवल पहचान नहीं, बल्कि अंबेडकरवादी राजनीति का प्रतीक रहा है। यदि सपा भी इसी प्रतीक को अपने संगठन और राजनीतिक गतिविधियों में प्रमुखता देती है, तो बसपा के सामने चुनौती सिर्फ वोटों की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकों और विचारधारा की जमीन पर भी खड़ी हो सकती है। मायावती का ताजा हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर सभी प्रमुख दल अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटे हैं। नीले रंग पर शुरू हुआ विवाद अब विचारधारा, राजनीतिक पहचान और सामाजिक समीकरण की बहस में बदलता नजर आ रहा है।
एक रंग और 22 प्रतिशत पर नजर :
यूपी में दलित आबादी करीब 21 से 22 प्रतिशत मानी जाती है। चार करोड़ से अधिक आबादी वाला यह सामाजिक वर्ग विधानसभा चुनाव में कई सीटों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें आरक्षित हैं। इसलिए लाल और नीले की मौजूदा बहस को सिर्फ रंगों का विवाद मानना राजनीतिक रूप से अधूरा होगा। इसके पीछे असली मुकाबला दलित वोट बैंक, अंबेडकरवादी पहचान और विपक्षी सामाजिक गठजोड़ की जमीन पर है।
इसलिए मायावती के निशाने पर कांग्रेस भी :
सपा यदि PDA के जरिए दलित आधार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है, तो बसपा के सामने अपनी परंपरागत सामाजिक जमीन बचाए रखने की चुनौती है। कांग्रेस भी विपक्षी सामाजिक समीकरण में अपनी भूमिका तलाश रही है। यही कारण है कि मायावती ने नीले रंग के बहाने सपा और कांग्रेस दोनों पर हमला बोला है। उनका संदेश साफ है कि अंबेडकरवादी राजनीति की पहचान पर किसी दूसरे दल का दावा बसपा आसानी से स्वीकार करने वाली नहीं है। यूपी की चुनावी सियासत में इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लाल के साथ नीला कितना घुलेगा। असली सवाल यह है कि नीले रंग से जुड़े दलित वोटों की राजनीतिक दिशा किस तरफ जाएगी। यानी रंगों की यह सियासत दरअसल वोट और राजनीतिक हिस्सेदारी की लड़ाई है।