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मोहन भागवत के नाम लिखा वायरल पत्र, आखिर झूठ निकला, पकड़े गए लोगों को तो लाभ नहीं, फिर किसकी कारस्तानी ?

इस प्रकरण की जांच और तह तक पहुंचना जरूरी
 

मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
 

इस बार जब विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला तो सबको उम्मीद थी कि मुखिया तीसरी बार वसुंधरा राजे को बनाया जायेगा। मगर ऐसा हुआ नहीं। केंद्रीय नेतृत्त्व ने इस बार नया नेता सामने लाने का मन में ठान रखा था और उसकी भनक किसी को नहीं थी। जबकि विधायकों का एक बड़ा धड़ा वसुंधरा के साथ था, ये सबको मालूम भी था। अब भी उनके साथ विधायक व सांसद भी है।

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्त्व ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को यहां पर्यवेक्षक बनाकर भेजा, जिनके रहते राजे ज्यादा बोलती नहीं। उन्होंने विधायक दल की बैठक बुलाई। राजे को पर्ची थमाई और उनको ही खोलकर नाम बोलने के लिए कहा।

सबने यह दृश्य टीवी चैनल्स पर लाइव देखा था। पर्ची खुली तो नाम पढ़कर राजे विस्मित थी। मगर पार्टी अनुशासन की बात थी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्त्व ने इस बार भजनलाल शर्मा को विधायक दल का नेता चुना था। उनके नाम की घोषणा भी राजे से ही कराई गई। ये सब लाइव टीवी चैनल्स पर चला और सबने देखा।

उस वक्त से ही स्थितियां बदली:

उस वक्त वसुंधरा समर्थकों को यह निर्णय पसंद नहीं आया, मगर चुप रहने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। राजे ने खुद तो किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी। भाजपा में इस तरह की रवायत भी नहीं है। कांग्रेस होती तो कोई न कोई नेता समर्थक बोल ही देता, मगर भाजपा का सांगठनिक ढांचा अलग तरीके का है जिसमें इस तरह के बोलने वालों को जगह नहीं।

हां, एक असर जरूर भाजपा सरकार में दिखा। जो विधायक पहले से राजे के साथ थे, उनके मंत्रिमंडल में जिम्मेदार मंत्रालयों को संभाला था, इस बार भी जीते हुए थे, मगर उनको मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला। जाहिर है, कयास यही लगाया गया कि वे राजे समर्थक है इस कारण मंत्री नहीं बन सके। कालीचरण सर्राफ, श्रीचंद कृपलानी, बाबूसिंह राठौड़, अनिता भदेल आदि मंत्रिमंडल में स्थान नहीं पा सके।

बाद में एक अलग तरह की दूरी राजे व भाजपा सरकार के मध्य दिखाई जाने लगी। जबकि स्वयं राजे व सीएम भजनलाल ने ऐसा कुछ भी कभी भी नहीं दर्शाया। मगर राजे के बयानों के व सीएम के निर्णयों के अलग अर्थ निकाले जाते रहे। एक गेप सरकार व राजे के मध्य बन जरूर गया। यह कैसे बना, किसने बनाया, उसका किसी को पता नहीं चला।

वसुंधरा के बयानों का असर:

पिछले 2 साल में वसुंधरा राजे के बयानों ने जरूर नई तरह की स्थितियों को जन्म दिया। उनके तंज वाले बयान खूब चर्चा में रहे और एक राजनीतिक हलचल उनसे जरूर बनी। 

 

राजे के बयानों में गहरे राजनीतिक कटाक्ष थे। उनको लेकर सियासी हलके में जबरदस्त गर्माहट हो जाती थी। कई तरह के राजनीतिक अर्थ भी निकाले जा रहे थे। उन बयानों से राजे को लेकर एक परसेप्शन बना और कुछ लोगों ने जानबूझकर बनाया। कुछ अर्थों में बयान थे ही मारक। 

गहलोत, डोटासरा के बयान भी थे:

भाजपा के इस शासन में एक बात प्रदेश की जनता व राजनीति में रुचि रखने वालों को अजीब लगी। इस बार पूर्व सीएम अशोक गहलोत व पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा हर मुद्दे पर वसुंधरा राजे का पक्ष लेते नजर आये। 

अखिलेश यादव व अन्य कई नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि सीएम वे होती तो विकास योजनाबद्ध तरीके से होता। अभी जब रिफाइनरी में आग लगी तो भाजपा नेताओं ने पहले की गहलोत सरकार पर हमला बोला।
 

इस पर गहलोत ने कहा कि जिनको ABCD मालूम नहीं, वे बोल रहे है। यदि वसुंधरा राजे जैसी रिफाइनरी को समझने वाली नेता कुछ कहती तो जवाब देता। ठीक इसी तरह सदन में भी अनेक बार डोटासरा राजे की तारीफ करते नजर आए है। इनसे भी पार्टी के कुछ लोगों में उनको लेकर अलग तरह का परसेप्शन बना हुआ है।

वायरल पत्र का मामला:

ताजा मामला एक पत्र का है जो सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ। यह पत्र संघ प्रमुख मोहन भागवत को राजे की तरफ से लिखा दिख रहा है। इस पत्र में नारी शक्ति अधिनियम को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की गई है। यह कहा गया है कि पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक रही है। पत्र के अनुसार वसुंधरा राजे ने मोहन भागवत से आग्रह किया है कि वे इस मामले में दखल दें।

सोशल मीडिया पर यह पत्र वायरल होते ही खूब बवाल मचा। खुद राजे सामने आई और स्पष्ट किया कि यह पत्र उनका लिखा नहीं है। भाजपा जयपुर से दिल्ली तक हिल गयी थी। तुरंत कार्यवाही हुई और राजे के झूठे नाम से वायरल यह पत्र वायरल करने वाले मध्यप्रदेश के तीन लोग थे। बताया जा रहा है कि इनमें से दो सीधे युवक कांग्रेस से जुड़े हुए है। उनको पकड़कर जयपुर लाया गया है। वहीं मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेता इस कार्यवाही को गैरकानूनी बता रहे है।

साजिश किसकी है ?

जाहिर है, इन युवकों को तो वायरल पत्र से कोई लाभ होना नहीं है। इसका अर्थ है इनके पीछे कोई और है जिसने यह साजिश रची है। उसको सामने लाना जरूरी है। तभी इस बात का पता चलेगा कि राजे व पार्टी के मध्य यह गेप कोई साजिश तो नहीं। कौन कर रहा है ये साजिश, उसी से तस्वीर साफ होगी।