West Bengal Election : 92.66% मतदान से उठा सवाल, "ममता के आँचल" की छाँव या "मोदी की गोदी"
Abhishek Purohit
RNE Kolkata.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92.66% मतदान ने सियासत को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इतना भारी मतदान केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि एक संकेत है—लेकिन सवाल यही है कि यह संकेत किसके पक्ष में है? क्या जनता एक बार फिर “ममता के आँचल” में भरोसा जता रही है या “मोदी की गोदी” में बैठकर बदलाव का मन बना चुकी है?
क्या कहता है रिकॉर्ड वोटिंग का इतिहास:
एक रिपोर्ट के मुताबिक आजादी के बाद हुए 17 विधानसभा चुनावों में सिर्फ 4 बार सत्ता बदली है। दिलचस्प बात यह है कि जब भी वोटिंग में 4.5% से ज्यादा का उतार-चढ़ाव हुआ, तब 3 बार सरकार बदली।
हालांकि 2011 में ममता बनर्जी ने महज 2.4% बढ़ी वोटिंग के साथ 34 साल का लेफ्ट शासन खत्म कर दिया था। मतलब यह कि "हाई वोटिंग = बदलाव" यह फॉर्मूला हर बार काम नहीं करता।
SIR का गणित या ‘अस्तित्व का डर’ :
करीब 91 लाख वोटर्स के नाम कटने से कुल मतदाता घट गए, जिससे प्रतिशत बढ़ा दिख रहा है।
लेकिन एक्सपर्ट्स कहते हैं—यह सिर्फ गणित नहीं, मनोविज्ञान भी है। लोगों को डर है कि अगर वोट नहीं दिया तो नाम भी कट सकता है।
महिला वोटर्स- गेमचेंजर :
पिछले चुनावों का ट्रेंड है कि महिलाओं को साधो, सत्ता पाओ। लगभग 15 राज्यों के आंकड़ों में 90% मामलों में ऐसी योजनाएं असरदार रही हैं जो महिलाओं को लुभाने वाली है। बंगाल में ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार योजना में बढ़ोतरी का वादा किया है। इसी तरह बीजेपी ने ₹3000 माह, मुफ्त बस यात्रा, 33% आरक्षण जैसे मुद्दे उछाले हैं।
'नो वायलेंस’ फैक्टर :
बंगाल चुनावों की पहचान रही हिंसा इस बार काफी हद तक गायब रही। हर 150 वोटर्स पर एक जवान की तैनाती ने भरोसा बढ़ाया। नतीजा—डर कम, वोट ज्यादा। इसके साथ ही 15 साल की सत्ता के बाद टीएमसी के खिलाफ नाराजगी भी है। इन सबके बीच हजारों प्रवासियों की चुनाव में वोटिंग के लिये वापसी, बीजेपी में मोदी-शाह का आक्रामक कैंपेन, टीएमसी में ममता- अभिषेक का बूथ लेवल मैनेजमेंट काफी हद तक हाई वोटिंग के लिये जिम्मेदार है। कुल मिलाकर दोनों दलों ने इसे "करो या मरो” की लड़ाई बना दिया।
फायदा किसे :
मूल बात यह है कि इतनी ज्यादा वोटिंग का फायदा किसे है। क्या यह बदलाव की वोटिंग है या ममता में विश्वास जताने का जोश। इस पर एक्सपर्ट्स में एक राय नहीं है। हालांकि लंबे समय से चल रही सरकारों के दौर में भारी मतदान बदलाव का संकेत देता है लेकिन हमेशा ऐसा ही नहीं होता। पिछले अनुभव बात रहे हैं कि भारी मतदान के बावजूद 09 में से 06 बार सरकार नहीं बदली। ऐसे में लगभग 93% वोटिंग का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि लोग उत्साहित हैं बल्कि यह संकेत है कि बंगाल का वोटर इस बार चुप नहीं बैठना चाहता।
यह बदलाव की आंधी है या ममता के प्रति भरोसे की बाढ़ इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसकी एक वजह यह भी है कि अभी जिन 16 जिलों में चुनाव हुए हैं वे कमोबेश बीजेपी के आधार वाले भी है। दूसरे चरण का चुनाव जहां होना है वह TMC का गढ़ माना जाता है। कुल मिलाकर बंगाल फिर ममता के आँचल में रहेगा? या मोदी की गोदी में जाकर नया रास्ता चुनेगा? यह तस्वीर दूसरे चरण की वोटिंग का बाद ही साफ होगी। फिलहाल बंगाल पूरी तरह सियासी उबाल पर है।