उर्दू अदब का नर्म लहजा खामोश : बशीर बद्र के वो शेर, जो हमेशा जिंदा रहेंगे
उर्दू साहित्य के महान शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी शायरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी। सरल भाषा, गहरी संवेदनाएं और मोहब्बत, तन्हाई व जिंदगी के एहसास को बेहद खूबसूरती से बयान करने वाले बशीर बद्र आधुनिक उर्दू गजल के सबसे लोकप्रिय शायरों में गिने जाते थे।
उनके शेर सिर्फ अल्फाज़ नहीं, बल्कि जिंदगी के अनुभवों और रिश्तों की नमी से भरे एहसास थे। यही वजह है कि उनकी गजलें आम लोगों से लेकर साहित्य प्रेमियों तक हर दिल में बस गईं।
बशीर बद्र के कुछ अमर और चर्चित शेर
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।”
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
“हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं,
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में।”
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
“मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।”
“ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।”
“कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा,
मुझे मालूम है किस्मत का लिखा भी बदलता है।”
“मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलते तो हाथ भी न मिला।”
“घरों पर नाम थे और नामों के साथ ओहदे भी थे,
बहुत तलाश करने पर भी कोई आदमी नहीं मिला।”
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि उन्होंने कठिन उर्दू अल्फाज़ के बजाय आम बोलचाल की भाषा में दिल की बात कही। यही कारण है कि उनकी गजलें पीढ़ियों तक लोगों की जुबान पर रहेंगी।