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Bhanwar Singh Samour का निधन : राजस्थानी भाषा, संस्कृति के एक युग का अवसान, राज्यपाल बागड़े सहित समूचे राजस्थान ने जताया शोक 

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, 'संस्कृति री सनातन दीठ' पर मिला राष्ट्रीय सम्मान
 

 

 

Rudra News Express Jaipur-Churu-Bikaner. 

 

राजस्थान और राजस्थानी भाषा-संस्कृति के लिए शनिवार को बहुत दुखद खब आई। खबर यह कि प्रख्यात साहित्यकार, इतिहासकार, कवि, संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. भंवरसिंह सामौर नहीं रहे। जिसने भी यह सुना उसके मुंह से यही निकला "राजस्थानी भाषा और संस्कृति के एक युग का अवसान हो गया।" राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें राजस्थानी साहित्य और संस्कृति का महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बताया।

 

राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने शोक संदेश में कहा कि डॉ. सामौर का शोधपरक अध्ययन, कोश निर्माण का कार्य और साहित्यिक सृजन अनुकरणीय है। ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति और शोक संतप्त परिजनों को यह दुख सहन करने की शक्ति दे। 

 

कौन थे बोबासर के भंवरसिंह सामौर : 

डॉ. सामौर उन साहित्यकारों में शामिल थे, जिन्होंने अपना जीवन राजस्थानी भाषा को पहचान और सम्मान दिलाने के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना के रूप में प्रस्तुत किया।

 

15 अगस्त 1943 को चूरू जिले के बोबासर गांव में जन्मे भंवरसिंह सामौर के पिता उजीणदान और दादा चतुरदान सामौर थे। राजस्थान विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा पाने वाले समौर का साहित्यिक जीवन पांच दशक से अधिक समय तक फैला है। राजस्थानी और हिंदी दोनों भाषाओं में साहित्य, इतिहास, संस्कृति और लोक परंपराओं पर लेखन किया। वे केवल कवि और लेखक नहीं थे, बल्कि राजस्थानी भाषा के शोधकर्ता और सांस्कृतिक दस्तावेजों के संरक्षण के पक्षधर भी थे।

'संस्कृति री सनातन दीठ' को साहित्य अकादमी सम्मान

उन्हें राजस्थानी कृति "संस्कृति री सनातन दीठ" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार 2020 के लिए चुना गया। साहित्य अकादमी ने 26 अगस्त 2021 को इसकी आधिकारिक घोषणा की थी। यह सम्मान राजस्थानी भाषा में उनके साहित्यिक योगदान की राष्ट्रीय पहचान बना।