क्रॉस वोटिंग के शिकार हुए बीजेपी के मेयर प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह शेखावत ने हाईकमान को रिपोर्ट सौंपी!
27 पार्षदों वाली भाजपा के मेयर प्रत्याशी को मिले 30 वोट, डिप्टी मेयर में पार्टी का आंकड़ा 40 पहुंचा। करीब 10 पार्षदों के मतदान पैटर्न पर सवाल, लेकिन संगठन की चुप्पी बरकरार।
- मधु आचार्य ‘आशावादी’
Rudra News Express Bikaner.
बीकानेर नगर निगम के मेयर चुनाव में भाजपा के भीतर क्रॉस वोटिंग का मामला अब पार्टी हाईकमान तक पहुंच गया है। भाजपा के मेयर प्रत्याशी रहे सुरेंद्र सिंह शेखावत ने प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में मतदान के दौरान पार्टी की ओर से बताए गए वोटिंग पैटर्न से अलग मतदान करने वाले पार्षदों को लेकर जानकारी दी गई है। बताया जा रहा है कि करीब 10 पार्षदों के मतदान पैटर्न पर सवाल उठे हैं। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भाजपा के पास 27 पार्षद थे और शेखावत को 30 वोट मिले, तो फिर भाजपा में क्रॉस वोटिंग कैसे हुई? यही इस पूरे मामले का असली गणित है।
दरअसल बीकानेर नगर निगम के मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग का खेल दोनों प्रमुख दलों को उलझा गया। मेयर चुनाव में कांग्रेस के अनिल कल्ला को 50 वोट मिले, जबकि भाजपा के सुरेंद्र सिंह शेखावत 30 पर सिमट गए। अगले ही दिन डिप्टी मेयर चुनाव में तस्वीर बदली और भाजपा के पंकज गहलोत को 40 वोट मिल गए, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को 38 वोट मिले। यानी मेयर चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में और डिप्टी मेयर चुनाव में भाजपा के पक्ष में वोटों का गणित बदला। सवाल यह नहीं कि क्रॉस वोटिंग हुई या नहीं, बल्कि यह है कि "किसने किसके वोट काटे, किसके खाते में वोट जोड़े और ऐसा क्यों हुआ?"
सुरेन्द्र का संशय : 27 अपने, 8 निर्दलीय साथ… फिर 30 वोट ही क्यों?
भाजपा के 27 पार्षद जीते थे। मेयर प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह शेखावत ने आठ निर्दलीय पार्षदों के साथ होने की तस्वीर भी साझा की थी। इस हिसाब से समर्थकों का आंकड़ा 35 तक पहुंचता था। चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर 51 प्लस का दावा भी सामने आया। लेकिन नतीजे में शेखावत को केवल 30 वोट मिले। यहां एक जरूरी बात समझनी होगी। 30 वोट मिलने का अर्थ यह नहीं कि भाजपा के सभी 27 पार्षदों ने शेखावत को वोट दिया। संभव है कि भाजपा के कुछ वोट दूसरी तरफ गए हों और निर्दलीय खेमे से कुछ वोट शेखावत को मिले हों। कुल संख्या से यह तय नहीं होता कि किस पार्षद ने किसे वोट दिया, लेकिन नतीजा पार्टी के दावों और चुनावी गणित पर सवाल जरूर खड़े करता है।
.. डिप्टी मेयर में 40 वोट कहां से आए?
डिप्टी मेयर चुनाव में भाजपा के पंकज गहलोत को 40 वोट मिले। मेयर चुनाव में शेखावत के 30 वोटों के मुकाबले यह 10 वोट ज्यादा थे। दूसरी ओर, कांग्रेस के मेयर प्रत्याशी अनिल कल्ला को मिले 50 वोट डिप्टी मेयर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के 38 वोट रह गए। यही दोनों चुनावों का सबसे दिलचस्प गणित है। मेयर चुनाव में भाजपा के खाते में 30 वोट आए, जबकि अगले दिन डिप्टी मेयर में यह संख्या 40 हो गई। कांग्रेस के वोट भी 50 से घटकर 38 रह गए।
10 पार्षदों के मतदान पैटर्न पर सवाल :
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने केवल वोटों की कुल संख्या नहीं देखी, बल्कि मतपत्रों पर लगी मोहरों के पैटर्न को भी परखा। पार्टी की ओर से समर्थक पार्षदों को मतदान का एक तरीका बताया गया था। मतगणना के दौरान कुछ मतपत्रों पर मोहर तय पैटर्न से अलग दिखाई देने पर करीब 10 पार्षदों के मतदान को लेकर संदेह जताया गया। हालांकि, इन पार्षदों में भाजपा के कितने और निर्दलीय कितने थे, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। पार्टी की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली जांच से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सुरेन्द्र ने रिपोर्ट हाईकमान को दी :
भाजपा के मेयर प्रत्याशी रहे सुरेंद्र सिंह शेखावत ने पार्टी नेतृत्व को रिपोर्ट सौंपने की पुष्टि की है। उन्होंने किसी पार्षद विशेष के खिलाफ व्यक्तिगत शिकायत करने से इनकार किया और कहा कि वे संगठन के सभी पार्षदों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। शेखावत ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़, संगठन महामंत्री अजय कुमार और निकाय चुनाव के राजस्थान प्रभारी अरुण द्विवेदी को घटनाक्रम की जानकारी दी है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल से भी उनकी मुलाकात हुई। अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें जयपुर बुलाया है और मुलाकात प्रस्तावित बताई गई है।
..संगठन खामोश क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम में गौर करने वाली बात यह है कि भीतरघात की पड़ताल को लेकर शेखावत खुद सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। शहर भाजपा संगठन और दूसरे प्रमुख नेताओं की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट कार्रवाई या जांच का निष्कर्ष सामने नहीं आया है। रिपोर्ट हाईकमान तक पहुंचने के बाद अब निगाहें इस पर हैं कि संगठन मामले की औपचारिक जांच करता है या यह सवाल सियासी चर्चाओं तक ही सीमित रह जाता है।
कांग्रेस में जांच, भाजपा में सवाल :
कांग्रेस में डिप्टी मेयर चुनाव की क्रॉस वोटिंग को लेकर शिकायत और जांच की मांग उठी है। भाजपा में भी मेयर चुनाव के नतीजे और अगले दिन डिप्टी मेयर के आंकड़ों ने सवाल खड़े किए हैं। फर्क इतना है कि कांग्रेस में मामला पार्टी के भीतर शिकायत के रूप में सामने आया, जबकि भाजपा में मेयर प्रत्याशी की रिपोर्ट के जरिए यह मुद्दा प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचा है। दोनों दलों के लिए यह आत्ममंथन का विषय है। पार्षद जनता के वोट से चुने जाते हैं और उनसे अपने वार्ड के हित में काम करने की अपेक्षा होती है। यदि पार्टी के घोषित प्रत्याशी के विरुद्ध मतदान हुआ है, तो उसके कारणों को समझना जरूरी है। लेकिन बिना प्रमाण किसी पार्षद पर भीतरघात का ठप्पा लगाना भी ठीक नहीं।