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"बीरा रमक-झमक होय आयजो.." जैसे मायरा गीतों पर मंथन!

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की पहल : ‘भात में बीरा गायन’ के महत्व पर चर्चा

 

Rudra News Express Bikaner. 

"बीरा रमक-झमक होय आयजो.." शब्द गूँजते ही जेहन में उभरती है शादी के मौके पर दूल्हा-दुल्हन के ननिहाल पक्ष से आने वाले मायरे की। भात यानी मायरे के ऐसे ही दूसरे कई गीत है जो कब, किसके लिए और क्यों गाए जाते हैं इन पर सामान्यतया साहित्यिक आयोजनों में चर्चा नहीं होती लेकिन अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने ऐसे ही गीतों पर केंद्रित विशेष आयोजन रखा। 

साहित्य परिषद् की नगर इकाई, बीकानेर ने प्राक् लोक मंथन कार्यक्रम ‘भात में बीरा गायन’  का आयोजन किया। बेसिक कॉलेज में हुए कार्यक्रम में राजस्थानी लोकगीतों की समृद्ध परंपरा को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। लोकगीतों के माध्यम से राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक आत्मीयता और लोकजीवन की जीवंत परंपराओं को अभिव्यक्ति मिली।

लोक ही भारत की आत्मा : अन्नाराम 

राजकीय डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय लोक साहित्य प्रमुख प्रो. अन्नाराम शर्मा ने इस मौके पर कहा कि लोक ही भारत की आत्मा है और लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक हैं। भारत की पहचान केवल उसके इतिहास और भूगोल से नहीं, बल्कि उसकी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से निर्मित होती है। नगर, महानगर, गांव, कस्बे, मेले, सोलह संस्कार, ऋतुएं, पशु-पक्षी, त्योहार, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषाएं और लोकाचार मिलकर भारतीय जीवनोत्सव को साकार करते हैं।

‘प्राक् लोकमंथन-2026’ के बारे में : 

‘प्राक् लोकमंथन-2026’ राष्ट्रीय स्तर का ऐसा वैचारिक विमर्श मंच है, जहां विचारक, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक, साहित्यकार, न्यायवेत्ता, इतिहासकार, शोधार्थी, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता समकालीन वैश्विक समस्याओं पर भारतीय दृष्टि से विचार-विमर्श करते हैं। वर्ष 2016 में भोपाल से शुरू हुई लोकमंथन की यात्रा रांची, गुवाहाटी और भाग्यनगर तक पहुंची है। इस क्रम में आगामी 4 से 6 दिसंबर 2026 तक जयपुर में लोकमंथन का आयोजन होगा। इस वर्ष का ध्येय वाक्य ‘हम भारत के लोग’ है। कार्यक्रम के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा भी उपलब्ध है।

लोकगीतों की सुरलहरियां : 

कार्यक्रम संयोजक डॉ. राजश्री भाटी के साथ विनोद तंवर, सुधा आचार्य, डॉ. शशि बेसरवारिया सरिता गहलोत सहित अन्य लोक गायिकाओं ने ठेठ राजस्थानी भाषा में पारंपरिक गीतों की प्रस्तुतियां दीं। महाविद्यालय की डी.एल.एड. की छात्राओं ने भी लोकगीतों की प्रस्तुतियों में सहभागिता की। 

मुख्य अतिथि ठाकुर दास ने लोकगीतों के विविध रूपों और उनकी सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने पारिवारिक परंपराओं को लोक संस्कृति से जोड़ते हुए ‘भात' परंपरा तथा ‘मायरा’ की महत्ता बताई। अध्यक्षता बेसिक महाविद्यालय के निदेशक रामजी व्यास ने की। उन्होंने प्रो. अन्नाराम शर्मा को गीतों की एक पुस्तक भेंट की। संचालन राजकीय डूंगर महाविद्यालय की व्याख्याता डॉ. छाया शर्मा ने किया तथा अंत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संभाग सह-संयोजक डॉ. मूलचंद बोहरा ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बसन्ती हर्ष डाॅ. श्रीनिवास शर्मा, मोनिका गौड़ मधुरिमा जी आदि भी उपस्थित रहे।