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बूंदी वाले मटका अनारों की चमक के आगे फीकी आधुनिक आतिशबाजी

 

Rudra News Express Diwali Special

राजस्थान में दीपावली के मौका पर "धनराज, दया, ज्वालामुखी.." जैसे नाम लिए जाएं तो आम आदमी भले ही कुछ न समझें लेकिन आतिशबाजी के शौकीनों की आँखों में चमक दिखने लगती है। जेहन में उभरती है रोशनी बिखेरने वाले उन मिट्टी के अनार की तस्वीर जो फटते नहीं मगर इतनी रोशनी बिखेरते हैं कि लगता है आसमान के तारे जमीन पर उतर आए। 

जी हां, यहां बात हो रही है राजस्थान में बूंदी के पारंपरिक मिट्टी के अनार की जिसे मटका अनार, या कुल्हड़ अनार भी कहते हैं। सन 1850 से शाही महलों की खास खुशियों को व्यक्त करने वाले ये पटाखे अब भी महीनों की मेहनत से हाथों से बनाए जाते हैं। बूंदी में मिट्टी से तैयार होने वाले इन खास अनारों की दीपोत्सव पर जबरदस्त मांग है। डिमांड बहुत है लेकिन कारीगरों की कमी से पूरी नहीं हो रही है।इनकी खासियत है कि ये पारंपरिक पटाखों की तरह धमाका नहीं करते, बल्कि रोशनी की खूबसूरत छटा बिखेरते हैं। बूंदी के अलावा प्रदेश के कई जिलों से इनके ऑर्डर आते हैं, लेकिन हाथों से तैयार होने वाली इस पारंपरिक आतिशबाजी की मांग के मुकाबले उत्पादन कम पड़ रहा है।

1850 से शाही महलों की छतों पर बिखेर रहे रोशनी : 

बूंदी के मिट्टी के अनारों का इतिहास करीब 175 साल पुराना बताया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, 1850 से 1900 के बीच हसन शोरगर का नाम बूंदी रियासत की शाही आतिशबाजी के लिए मशहूर था। राजघराने की शादियों, दीपावली और दूसरे आयोजनों में उनकी बनाई आतिशबाजी खास आकर्षण होती थी। कहते हैं कि राजमहलों की छतों से जब उनके बनाए मिट्टी के अनार रोशनी बिखेरते थे तो आसमान रंगीन नजारे से जगमगा उठता था। हसन शोरगर से यह हुनर उनके दामाद काले खां, फिर जमील अहमद सोलगर और अब अगली पीढ़ी तक पहुंचा। इस तरह एक पारिवारिक कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।

नाम भी खास, अंदाज भी खास : 

बूंदी के इन मिट्टी के अनारों के नाम भी लोगों के आकर्षण का हिस्सा हैं। धनराज, दया और ज्वालामुखी जैसे अलग-अलग नामों और आकारों में उपलब्ध ये अनार दीपावली पर खास पसंद किए जाते हैं। इनकी बाहरी संरचना मिट्टी के कुल्हड़ से तैयार होती है। इन्हें बनाने में मशीनों के बजाय हाथों और पारंपरिक औजारों का इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी को आकार देने से लेकर अंतिम सजावट तक कारीगरों की मेहनत दिखाई देती है। इनकी कीमत आकार और रोशनी के हिसाब से 50 रुपये से लेकर 700 रुपये तक बताई गई है।

परिवार के लोग संभाल रहे विरासत : 

इस पारंपरिक हुनर को बचाए रखने में खलील भाई का परिवार जुटा हुआ है। खलील भाई, उनकी पत्नी, बेटा और अन्य कारीगर मिलकर इन अनारों को तैयार करते हैं। कारीगरी का ज्यादातर काम हाथों से होता है। यही वजह है कि सीमित कारीगरों के साथ उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं है। दीपावली के आसपास मांग तेजी से बढ़ती है, लेकिन पर्याप्त प्रशिक्षित लोग नहीं होने से सभी ऑर्डर पूरे करना चुनौती बन जाता है।

विरासत पर संकट, नई पीढ़ी की रुचि कम : 

इस पारंपरिक कला के सामने सबसे बड़ी चुनौती कारीगरों की कमी है। आधुनिक फायरवर्क्स, बदलती जीवनशैली और नई पीढ़ी की घटती दिलचस्पी के कारण इस हुनर को आगे बढ़ाने वाले लोग सीमित होते जा रहे हैं। कारीगर परिवार चाहता है कि सरकार बूंदी की इस पारंपरिक कला को हेरिटेज क्राफ्ट के रूप में पहचान दे। इससे इस हुनर से जुड़े परिवारों को प्रोत्साहन मिलने के साथ नई पीढ़ी को भी इससे जुड़ने का अवसर मिल सकता है।