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Bikaneri Usta Art से सजी राजस्थान की झांकी देशभर में सराही गई, मिला तीसरा स्थान

Bikaneri Usta Art से सजी राजस्थान की झांकी देशभर में सराही गई, मिला तीसरा स्थान
 

RNE New Delhi-Jaipur. 
 

नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में निकली राजस्थान की झांकी ने 'पॉपुलर च्वाइस' श्रेणी में तीसरा पुरस्कार प्राप्त किया है। अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता ने बीते नई दिल्ली में रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ से यह पुरस्कार लिया।

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बीकानेर की उस्ता कला पर आधारित इस झांकी को जनता के ऑनलाइन मतदान के आधार पर यह सम्मान मिला है। इस झांकी में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और शिल्पकारी का प्रदर्शन किया गया था। इस श्रेणी में गुजरात को पहला और उत्तर प्रदेश को दूसरा स्थान मिला है।

कर्तव्य पथ पर छाई थी राजस्थान की झांकी : 
 

77 वें गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर निकली परेड में राजस्थान की झांकी आकर्षण का केंद्र रही। बीकानेर की विश्वविख्यात उस्ता कला को केन्द्र में रखकर तैयार की गई इस झांकी ने अपनी विशिष्ट शिल्पकला, सांस्कृतिक वैभव और जीवंत प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया।

ये रही झांकी की बारीकियां : 
 

झांकी के अग्र भाग में राजस्थान के प्रसिद्ध लोक वाद्य रावणहट्टा का वादन करते कलाकार की 180 डिग्री घूमती प्रतिमा प्रदर्शित की गई। इसके दोनों ओर उस्ता कला से सजी सुराही, कुप्पी और दीपक आकर्षक फ्रेमों में लगाए गए।

ट्रेलर भाग में उस्ता कला से अलंकृत घूमती हुई पारंपरिक कुप्पी तथा हस्तशिल्प पर कार्य करते कारीगरों के दृश्य प्रदर्शित किए गए, जो इस कला की जीवंत परंपरा को दर्शाते हैं। झांकी के पृष्ठभाग में विशाल ऊँट और ऊँट सवार की प्रतिमा राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति एवं लोक जीवन का सशक्त प्रतीक बनी। दोनों ओर उस्ता कला से सजे मेहराबों में पत्तेदार स्वर्ण कारीगरी के उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रदर्शित किए गए।

चारों ओर गेर नृत्य : 
 

झांकी के चारों ओर गेर लोक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकारों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। कुल मिलाकर यह झांकी पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और शाही विरासत का सजीव संगम बनकर सामने आई।

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क्या है उस्ता आर्ट : 
 

उल्लेखनीय है कि उस्ता कला ऊँट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण जड़ाई की पारंपरिक शाही कला है, जिसकी उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। इसका विकास मुगल काल में हुआ तथा बीकानेर के महाराजा राय सिंह के शासनकाल में यह कला बीकानेर पहुँची, जहाँ स्थानीय कारीगरों ने इसे विशिष्ट पहचान दिलाई। इस कला में 24 कैरेट स्वर्ण पत्र एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में इसका विस्तार लकड़ी, संगमरमर, कांच एवं दीवारों तक हो चुका है। बीकानेर की उस्ता कला को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) भी प्राप्त है, जो इसकी मौलिकता और सांस्कृतिक महत्व को प्रमाणित करता है।