"रवसा" की एंट्री : क्या देवीसिंह भाटी वाले "सामाजिक न्याय" के रास्ते पर है रवींद्रसिंह भाटी का "EWS सरलीकरण" बदलेंगे समीकरण, चुनाव पर भी असर!
राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम गठजोड़ से भाजपा को नुकसान, भाजपा - कांग्रेस सतर्क हुई, गुणा - भाग करने में लगे
आर्थिक आधार पर अगड़ी जातियों को मिले आरक्षण के सरलीकरण व अन्य मांगों को लेकर शिव के निर्दलीय विधायक रवींद्र सिंह भाटी ' रवसा ' ने 5 व 6 अक्टूबर को बीकानेर में रैलियां, सभाएं की। रवसा ने शुद्ध रूप से इसी मुद्दे पर अपने दौरे को केंद्रित रखा, मगर ये समय पंचायती राज चुनाव का है। जाहिर है, इससे राजनीतिक दलों व नेताओं के भीतर बड़ी हलचल तो हुई है।
मधु आचार्य ' आशावादी '
आर्थिक आधार पर अगड़ी जातियों के आरक्षण का मसला नया नहीं है। समय समय पर अनेक नेताओं ने इसे उठाया है और ब्राह्मण, राजपूत समाज के संगठनों ने भी इसकी लड़ाई लड़ी है। ईडब्ल्यूएस का प्रावधान हुआ, मगर वो सीमाओं में बंधा हुआ था। जिससे अगड़ी जातियों को एतराज था।
क्या देवीसिंह भाटी के रास्ते पर बढ़े रवींद्रसिंह भाटी :
याद होगा, जब दिगज्ज नेता देवीसिंह भाटी ने भी सामाजिक न्याय मंच बनाकर इस लड़ाई को लड़ा। अलग राजनीतिक दल बनाया और कई विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार भी उतारे। सामाजिक स्तर पर जब उन्होंने इसके लिए बीकानेर, सीकर आदि में इसको लेकर रैलियां की तो उनमें भारी भीड़ हुई। मगर राजनीतिक दल बनाकर इस लड़ाई को लड़ना चाहा तो लोगों ने उस तुलना में साथ नहीं दिया। हारकर, देवीसिंह भाटी को फिर से भाजपा में लौटना पड़ा। इस मुद्दे पर कुछ न हो पाने का मलाल उनको अब भी है। जिसे वे अनेक बार व्यक्त भी करते हैं। पर दलीय सीमाओं में रहते हुए ज्यादा कुछ नहीं कर पाते हैं। पर मलाल उनका अनेक बार व्यक्त हुआ है।
ईडब्ल्यूएस के सरलीकरण की बात काफी दिनों से राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर चल रही है। जिसको उठाने का काम सामाजिक संगठन कर रहे हैं। राजनीतिक दल वोट के डर से इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोल रहे। अन्य जातियां जिनको आरक्षण है, उस पर टिप्पणी राजनीतिक रूप से दलों के लिए किया जाना संभव नहीं है। चाहे कोई सा भी राजनीतिक दल हो, यह कटु सत्य है।
अब इस मामले में हुई रवसा की एंट्री :
इसी मामले को लेकर अब बाड़मेर के शिव से निर्दलीय विधायक रवींद्र सिंह भाटी ' रवसा ' खड़े हुए हैं। रवसा के राजनीतिक सफर की कहानी कोई ज्यादा लंबी व रहस्यमयी नहीं है। भाटी को जयनारायण व्यास विवि, जोधपुर में छात्र संघ के अध्यक्ष पद का टिकट नहीं दिया गया। मगर उनके तो चुनाव लड़ने की धुन थी। बाड़मेर से आकर वे जोधपुर में पढ़ रहे थे, छात्र राजनीति में सक्रिय थे। छात्र संघ के अध्यक्ष का रवींद्र सिंह भाटी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और शान से जीत भी गये। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि इस छात्र नेता के मन में दूर तक राजनीतिक सफर करने की योजना है। इसे महज उन्होंने छात्र राजनीति तक ही सीमित समझा।
रवसा रुके नहीं। बाड़मेर आकर भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक सफर शुरू किया। भाजपा ने इनको हल्के में लिया। टिकट नहीं दिया तो थोड़े ही दिनों में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और निर्दलीय शिव विधानसभा से खड़े हो गए। समाज के साथ अन्य समाजों ने भी इनका समर्थन किया। राजनीतिक समीकरण पक्ष में बने और यह छात्र नेता निर्दलीय विधायक बन गया। शिव के लोगों ने इस पर खूब भरोसा किया। बातों में दम और जबरदस्त ऊर्जा इस युवा की बड़ी ताकत है। जिसके दम पर वो अभी भी पूरे राज्य में युवाओं की मजबूत आवाज बने हुए हैं।
लोकसभा लड़कर इरादे जता दिये :
विधानसभा चुनाव जीतने के बाद रवींद्र सिंह भाटी बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय के रूप में चुनाव अखाड़े में उतर गए। तब लोगों को पहली बार अहसास हुआ कि यह युवा शौकिया तौर पर राजनीति में नहीं आया है, कुछ ठानकर, कुछ अलग करने के लिए आया है। इतने बड़े संसदीय क्षेत्र में चुनाव प्रचार का भाटी का अंदाज भाजपा - कांग्रेस दोनों को ही डरा गया।
उस कशमकश के चुनाव में पहली बार, निर्दलीय के रूप में उतरे भाटी ने खूब वोट लिए। हालांकि वे जीत नहीं सके, मगर केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी को जरूर उन्होंने बुरी तरह से हरवा दिया। वो चुनाव कांग्रेस के उमेदाराम बेनीवाल जीत गए। पर रवसा पूरे बाड़मेर के एक कद्दावर नेता के रूप में स्थापित हो गए। प्रदेश स्तर पर राजनीतिक दल व नेता अब उनको गम्भीरता से लेने लग गए। उनकी विधानसभा में अभिव्यक्ति व बेबाकी ने उनको और लोकप्रिय बना दिया।
अब रवसा की सरलीकरण यात्रा !
रवींद्र सिंह भाटी अब सरलीकरण यात्रा पर है। 5 - 6 अक्टूबर को वे बीकानेर में यात्रा पर थे। उनके आने का जिस युद्ध स्तर पर प्रचार हुआ और जिस योजनाबद्ध तरीके से कार्यक्रम बना, उससे जानकार समझ गए कि रवसा ने अब लम्बा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्हें पता है कि भाजपा या कांग्रेस, सरलीकरण की बात नहीं उठा सकते, वोट बैंक खिसक सकता है। वे निर्दलीय है इस कारण बेबाकी से उठा रहे हैं। श्रीडूंगरगढ़, लूणकरणसर, जूनागढ़ बीकानेर, नत्थूसर गेट बीकानेर व नोखा में हुई उनकी सभाएं देखकर अन्य नेता व राजनीतिक दल भीतर से हिल गए हैं। इस सफलता की उम्मीद उनको नहीं थी। उनको लग गया कि यह रैलियां कोई हवा में चलाया हुआ तीर नहीं है, एक सुनिययोजित राजनीतिक प्रयास है।
ध्येय क्या है, उसे सामने आने में अभी समय लगेगा। मगर रवसा ने साबित कर दिया कि एक समझदार बड़ी टीम उनके साथ है और समाज का बड़ा तबका उनको प्रोत्साहन दे रहा है। नत्थूसर गेट की सभा मे पुजारी बाबा का होना, सरजुदास जी महाराज का होना, अकस्मात नहीं। कई मायने हैं। मतलब, रवसा के पीछे एक टीम काम कर रही है।
पंचायत चुनाव पर भी दिखेगा असर :
बीकानेर में भाटी की एंट्री उस समय हुई है जब पंचायत चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। इस एंट्री का उस पर असर पड़ेगा,यह तो तय है। क्योंकि रवसा के मुद्दे से राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। उस सूरत में चुनाव पर तो भले ही भाटी न चाहे, असर तो पड़ेगा। भाटी की एंट्री से भाजपा व कांग्रेस सतर्क हो गयी है। अब पूरा राजनीतिक खाका तो सामने आने में थोड़ा समय लगेगा। मगर रवसा की एंट्री ने दलों और नेताओं को गुणा - भाग करने में लगा दिया है।