विधायकों, नेताओं की डिजायर ही रहेगी आधार, तृतीय श्रेणी शिक्षकों के तबादले नहीं होंगे
मधु आचार्य ' आशावादी '
RNE Network.
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शिक्षकों व अन्य कार्मिकों के तबादलों के लिए तबादला नीति बनाने का आदेश वर्षों से दिया हुआ है। मगर तबादला नीति का निर्माण तो द्रोपदी के चीर की तरह लम्बा ही होता जा रहा है। अब भी तबादला नीति नहीं बनी है, भले ही नीति नहीं बनी मगर हर साल थोक के भाव में तबादले हो रहे हैं। ' राज्यादेश ' एक ऐसा अमोघ अस्त्र है सरकार के पास कि उसका उपयोग कर जब चाहे वह तबादला कर देती है।
राज्य कर्मचारियों में सबसे अधिक कर्मचारी शिक्षा विभाग में है। इस कारण यहां तबादलों का फलसफा बहुत पुराना है। हर साल शिक्षा विभाग कैम्प लगाकर थोक के भाव में तबादले करता है। शिक्षकों को इधर से उधर किया जाता है। सर्वाधिक कर्मचारी होने के बाद भी इस विभाग में तबादला नीति नहीं बनी हुई है। हर साल तबादला नीति के स्थान पर तबादला निर्देश जारी कर खानापूर्ति कर दी जाती है और फिर ईच्छा से शिक्षकों के तबादलों की बड़ी बड़ी सूचियां जारी हो जाती है। कुछ तबादले बाद में परिवेदना निस्तारण के नाम पर भी कर दिए जाते हैं। तबादलों के कारण हर पार्टी के राज में शिक्षा विभाग विवाद में आता ही है।
तबादला नीति के अधूरे प्रयास:
अनेक बार शिक्षा विभाग में तबादला नीति बनाने के प्रयास भी हुए। राज्य में जब शिक्षा मंत्री गुलाब चंद जी कटारिया, घनश्याम जी तिवारी, सी पी जोशी आदि थे तब तबादला नीति बनाने के प्रयास भी हुए। अफसरों के देश के राज्यों में दौरे भी हुए। शिक्षक संगठनों से सुझाव भी लिए गए। मसौदा भी तैयार हुआ। मगर उस मसौदे को कभी मंजूरी नहीं मिली।
राज बदल जाता तो फिर से यही कवायद जीरो से शुरू हो जाती। पहले पहल शिक्षक तबादलों की नीति आंध्र प्रदेश की तर्ज पर बनाने का निर्णय हुआ। अधिकारी आंध्र प्रदेश गए, ड्राफ्ट भी तैयार किया। पैसा खर्च हुआ। यात्राएं हुई, मगर अब वो आंध्र की तर्ज पर बनी पॉलिसी ही कहीं गायब हो गयी।
फिर ओडिशा अधिकारियों का एक दल गया और वहां की तबादला नीति की जानकारी ली। उसके आधार पर राज्य में भी मसौदा तैयार किया गया। जोर शोर से प्रचार हुआ, मगर वो नीति भी हवा में उड़ गई।
लगातार तबादले राज्यादेश से ही हो रहे हैं। सरकारें भी यही व्यवस्था चाहती है। क्योंकि यदि नीति बन गयी तो उनके हाथ में कुछ नहीं रहेगा। तबादले को राजनेता हथियार नहीं बना सकेंगे। अपने चहेतों को लाभ नहीं दे सकेंगे और विरोधियों को प्रताड़ित नहीं कर सकेंगे। इस कारण तबादला नीति बनाने के हर प्रयास अधूरे ही रहे हैं।
डिजायर ही बनेगी आधार:
इस बार भी विधायकों की लिखी डिजायर ही तबादले का शिक्षा विभाग में आधार बनेगी। जहां विधायक है वहां विधायक, जहां नहीं है वहां चुनाव लड़े प्रत्याशी की डिजायर को स्वीकारा जायेगा।
जाहिर है , जब डिजायर तबादले का आधार है तो तबादले का प्रकार भी राज्यादेश का होगा।
इस कारण ही इन दिनों सत्तारूढ़ विधायकों के क्षेत्र के आवास व जयपुर के सरकारी मकानों पर तबादला चाहने वालों की भीड़ लगी हुई है।
तृतीय श्रेणी शिक्षक फिर निराश:
डेढ़ दशक से अधिक हो गया, मगर तृतीय श्रेणी शिक्षकों को तबादले का कोई भी लाभ नहीं मिल रहा। शिक्षा विभाग में इस श्रेणी के शिक्षकों की ही संख्या सर्वाधिक होती है, यही तबादले के अधिकार से वंचित हैं।
राज्य सरकार ने इस बार ओर इनके तबादलों पर से प्रतिबन्ध नहीं हटाया है। मतलब उनके स्थान परिवर्तन की कोई संभावना ही नहीं है। जबकि इस अवधि में तीन सरकारें बन गयी, मगर इस श्रेणी के शिक्षकों को केवल आश्वासन ही मिला।