BIKANER : नाबालिग ब्याही गई ‘मुक्ता’ को 05 साल लंबे संघर्ष के बाद बाल विवाह से मुक्ति मिली
RNE Bikaner.
‘मुक्ता’ उसका असली नाम नहीं है लेकिन यहां हम इसी नाम से उस लड़की की कहानी बयां कर रहे हैं जिसे आज बीकानेर की एक कोर्ट ने बाल विवाह के दुरुह बंधन से मुक्ति का आदेश दिया है। इस कहानी में छोटे से गांव की एक किशोरी की पीड़ा के साथ ही संघर्ष के जरिये उसका अदम्य हौसला भी सामने आया है। इस कहानी में पग-पग पर सहारा देने वाली महिला सुरक्षा एवं सलाह केन्द्र की काउंसलर एडवोकेट विजयलक्ष्मी की प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता शामिल है। इस महिला अधिवक्ता ने काउंसलर की अपनी कार्यालयीन जिम्मेदारी से आगे बढ़ते हुए मानवीय पहलू और संवेदना के साथ एक बालिका को न्याय दिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
05 साल से जूझ रही मुक्ता:
यह दास्तां बीकानेर जिले के खारी चारणान गांव की एक किशोरी की है जिसे लगभग 16 वर्ष की उम्र में कोलायत के एक युवक से 18 जुलाई 2021 को ब्याह दिया गया। पहले दिन से ही इस विवाह को नहीं माना और सभी पारिवारिक, सामाजिक प्रताड़नाएं झेलते हुए भी कथित ससुराल जाने से मना कर दिया। उसे घर में कैद कर दिया गया लेकिन मौका पाकर उसने जानकारी जुटाई और न्याय पाने के लिए उसने महिला सुरक्षा एवं सहायता केन्द्र जो कोलायत पुलिस थाना में संचालित होता है वहां तक अपनी व्यथा पहुंचा दी। कोलायत थाने में सेवा दे रही महिला सुरक्षा एवं सहायता केन्द्र प्रभारी काउंसलर और विधि परामर्शी एडवोकेट विजयलक्ष्मी ने मामले की गंभीरता देखते हुए ग्राउंड रिपोर्ट कलेक्ट करने के साथ ही उच्चाधिकारियों-प्रशासन तक भी बात पहुंचाई।
एडवोकेट विजयलक्ष्मी बताती हैं, न्यू आदर्श शिक्षा समिति की अध्यक्ष को पूरा मामला अवगत करवाने के साथ ही फोन पर बच्ची से बात की तो पता चला कि उसे घर में कैद किया गया है। कथित ससुराल जाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उसे अमानवीय प्रतापड़ना भी सहन करनी पड़ रही थी। ऐसे गजनेर थाना पुलिस से संपर्क कर बच्ची को छुड़ाया। उसे मेरे पास कोलायत थाना केन्द्र लाया गया।
शुरू हुई सामाजिक-कानूनी लड़ाई:
घरवाले ससुराल जाने का दबाव बना रहे थे। कथित ससुराल वाले बार-बार आ रहे थे। इस बीच जब विवाह नहीं मानने की बात कही तो वे मुकर गये। समय बीतता जा रहा था। ऐसे में वूलन हैल्प लाइन के जयपुर कंट्रोल रूम से बात हुई। पीड़ित बच्ची ने भी बात की। इसके बाद बीकानेर कलेक्ट्रेट और तहसीलदार के यहां से भी फोन आया। ‘मुक्ता’ हर हाल में विवाह को शून्यीकरण करवाना चाहती थी। इस बीच बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष जुगलकिशोर व्यास ने पूरा मामला समझा और प्रशासन सहित जिम्मेदार पक्षों के सामने पूरी बात रखी।
न्यायालय में पहुंचा मामला :
पूरी प्रक्रिया के बावजूद बाल विवाह को शून्य घोषित करवाने के लिए न्यायालय की शरण में जाने की जरूरत महसूस हुई। ऐसे में महिला सहायता एवं सुरक्षा केन्द्र की विधि परामर्शी एडवोकेट विजयलक्ष्मी ने अपनी पहल से ‘मुक्ता’ की पैरवी करने का निर्णय लिया। उसके परिजनों और कथित ससुराल वालों की भी समझाइश की। एडवोकेट विजयलक्ष्मी के मुताबिक आखिरकार छोटी उम्र में मुक्ता से ब्याह करने वाले दूल्हे ने स्वीकार लिया कि उसने जब शादी की तो बच्ची किशोर अवस्था में थी। वह भी पूरे प्रकरण में मुक्ता का साथ देने को सहमत हो गया। आखिरकार बीकानेर के पारिवारिक न्यायालय संख्या 03 में आज मुक्ता को एक रुढिवादी विवाह बंधन से मुक्ति मिल गई।
देखा जाए तो इस एक घटना ने जहां मुक्ता को नई राह दिखाई है। वहीं बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ खड़ी एक चट्टान नजर आ रही है। पूरे मामले में थानों में खुले महिला सहायता और सुरक्षा केन्द्र की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। देखा जाए तो ऐसे केन्द्र खोले जाने का औचित्य सफल हो गया। इस केन्द्र की सोशल काउंसलर संगीता पुरोहित ने विवाद को संयमित करने और समाधान की ओर ले जाने में बड़ी भूिमका निभाई।

