बीकानेर का रवींद्र रंगमंच व टाउन हॉल कलाकारों की पहुंच के बाहर, प्रदेश की संगीत नाटक अकादमी भी ठप, राज्य के रंगमंचों, अकादमियों पर ध्यान समाज की जरूरत
अभिषेक आचार्य
सुनो सरकार ! हमारे शहर में सरकार कभी कभार ही इतना लंबा समय देती है। इस अवसर पर हम कलाकारों को भी आप तक अपनी बात सीधे पहुंचाने का अवसर मिला है। सरकार के आगमन का स्वागत है, क्योंकि उसके आने से ही उम्मीद जगी है कि नाट्यकर्मियों, गायकों, नर्तकों, संगीतकारों, लोक कलाकारों की बात आप तक सीधे पहुंचेगी तो सही। नहीं तो बात केवल शहर तक सीमित होकर रह जाती है, सरकार तक पहुंच ही नहीं पाती है।

सरकार ! बीकानेर के कला जगत का पूरे देश में बड़ा नाम है। इस शहर ने हरीश भादानी, नंदकिशोर आचार्य, यादवेंद्र शर्मा चन्द्र, लक्ष्मी नारायण रंगा, निर्मोही व्यास, श्रीगोपाल आचार्य जैसे नाटककार दिए हैं। कंठ कोकिला पद्मश्री अल्लाह जिलाही बाई भी इस शहर का गौरव है। सितारवादक पंडित जसकरण गोस्वामी, कत्थक गुरु डॉ जयचंद्र शर्मा, डॉ मुरारी शर्मा, पुंडरीक जोशी, तबला वादक गुलाम मोहम्मद, गायक रजब अली, मोतीलाल रंगा, ढूंढ महाराज, राजा हसन, संदीप आचार्य आदि की एक लंबी फेहरिस्त है जो इस बीकानेर की बड़ी देन है। जिनके के कारण देशभर में बीकानेर पहचाना जाता है और सम्मान पाता है।
बीकानेर को उत्तर भारत की नाट्य राजधानी का भी दर्जा मिला है। यहां नाट्य मंचन सर्वाधिक होते हैं, इतने राज्य क्या उत्तर भारत के किसी भी शहर में नहीं होते। यहां प्रतिष्ठित बीकानेर थियेटर फेस्टिवल होता है। रंग आनंद नाट्य समारोह होता है। अमर कला महोत्सव होता है। कहने का अर्थ यह है कि यहां विपुल सांस्कृतिक गतिविधिया होती है। जो हमारी भारतीय संस्कृति को पोषित, पल्लवित करती है।
हमारे प्राचीन गर्न्थो, परम्परा में कहा भी गया है कि जिस व्यक्ति का कलाओं से जुड़ाव नहीं है वो व्यक्ति पशु के समान है। इस कारण यह बात तो जग जाहिर है कि किसी भी समाज, शहर व राज्य की पहचान वहां की संस्कृति से ही होती है। हर लोक कल्याणकारी सरकार भी कलाओं को पोषित करती है और आश्रय देती है। क्योंकि कलाएं सरकार के लिए कमाई का साधन नहीं है। इसी कारण कलाकारों की सरकार से उम्मीदें भी है।

बीकानेर के रंगकर्मी हैं परेशान
सुनो सरकार ! इन दिनों बीकानेर के रंगकर्मी बहुत परेशान हैं। बीकानेर में नाट्य मंचन व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए सरकार की तरफ से केवल दो ही स्थान मुहैया कराए गए हैं। एक तो है पुराना टाउन हॉल और दूसरा है रवींद्र रंगमंच। टाउन हॉल रियासतकाल का है। जबकि रवींद्र रंगमंच 30 साल के कलाकारों के आंदोलन के बाद तत्कालीन भाजपा की सरकार ने ही बनाया। उस समय सरकार की मुखिया वसुंधरा राजे थी।
रवींद्र रंगमंच आरम्भ से कलाकारों की पहुंच से बाहर था। अत्यधिक किराया होने के कारण रंग व कला संस्थाएं इसका उपयोग करने में अक्षम थी। बीकानेर में पूरा का पूरा नाट्यकर्म और सांस्कृतिक कर्म अव्यावसायिक है।
सब कलाकारों का सहारा टाउन हॉल ही था। उसका न्यूनतम किराया सभी वहन कर लेते थे और यहां विपुल आयोजन होते थे। यहां जब सुविधाओं का अभाव हुआ तब भी उस समय के नगर विकास न्यास ने उसे दुरस्त नहीं कराया। कलाकारों की पीड़ा को उनके लाडले सांसद व देश के कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने समझा और अपने सांसद कोटे से 15 लाख रुपये देकर सुविधाएं उपलब्ध कराई।

आपने विकास के भाव से न्यास की जगह बीकानेर में विकास प्राधिकरण बनाकर बड़ी सौगात दी। कलाकारों ने सोचा अब हमारे टाउन हॉल की दशा सुधरेगी। सांसद जी ने भी मदद कर ही दी। मगर हुआ उल्टा। नफे का भाव रखते हुए बीकानेर विकास प्राधिकरण ने टाउन हॉल के किराये में 1000 गुना बढ़ोतरी कर दी। ये कलाकारों पर बड़ा वज्रपात था।
कलाकारों ने सभी अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों से इस किराये को कम कराने का आग्रह किया। मगर स्थिति जस की तस है। इसका असर यहां की सांस्कृतिक गतिविधियों पर पड़ा है, वे अचानक से बहुत ही कम हो गयी है। इसके बाद भी प्रशासन इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है।

टाउन हॉल कमाई का साधन नहीं
कला और संस्कृति किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य की कमाई के साधन नहीं हो सकते। उनको साधन बनाना भी नहीं चाहिए। मगर टाउन हॉल को विकास प्राधिकरण ने कमाई का साधन मानकर यह निर्णय किया है, इसे संवेदनशीलता तो नहीं कहा जा सकता। कला हित में बढ़ा हुआ किराया वापस लेना चाहिए और रवींद्र रंगमंच का किराया भी कम किया जाना चाहिए। सरकार ! अब आपसे ही न्याय की उम्मीद है। आप न्यायप्रिय हैं, कलाकारों के दर्द को पहचानेंगे।
हम रंगकर्मियों की मार्मिक अपील है ये सरकार !
हम हैं --- प्रदीप भटनागर, एल एन सोनी, मालूसिंह, मधु आचार्य ' आशावादी ', विजय सिंह राठौड़, नानक हिंदुस्तानी, दयानन्द शर्मा, सुधेश व्यास, रामसहाय हर्ष, सुनील जोशी, दलीप सिंह, प्रमोद चमोली, मंदाकिनी जोशी, मीनू गौड़ आदि रंगकर्मी।

