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पीबीएम को लेकर कांग्रेस तो बिजली व्यवस्था को लेकर भाजपा नेता मैदान में

कांग्रेस एकजुट होकर लड़ रही तो मेड़तिया अपने बूते मैदान में
सरकार को दखल देना चाहिए
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

बीकानेर आंदोलनों का शहर रहा है। आरम्भिक दौर में यहां समाजवादी ताकत में रहे। सोशलिस्ट पार्टी के मुरलीधर व्यास विधायक थे। उनकी सत्ता तो कभी रही नहीं, उस सूरत में उनके पास आंदोलनों के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं था। वे हर मुद्दे पर आंदोलन को ही हल करने का एकमात्र रास्ता समझते थे, अपनाते भी थे। उस समय सरकारे भी संवेदनशील थी। आंदोलन पर तुरंत ध्यान देती और उसे समाप्त कराने के लिए प्राथमिकता देती। समस्या का हल निकाल आंदोलन को समाप्त भी कराती।
 

अब वो लोकतंत्रीय व्यवस्था ही नहीं रही। जिसका जीता जागता उदाहरण बीकानेर कलेक्ट्री परिसर है। यहां कई कई धरने तो महीनों चले हैं। न उन पर सरकार ध्यान देती है और न ही प्रशासन। अभी भी इस तरह का एक धरना चल रहा है। उस धरने के सामने से सत्ता व विपक्ष के नेता निकलते हैं, जिले के बड़े अफसर निकलते हैं, मगर कोई भी धरने की वजह जान उसे हल कराने का सोचता भी नहीं।
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अभी बीकानेर दो आंदोलनों से घिरा हुआ है। इस बात का पता सरकार व प्रशासन, दोनों को ही है। मगर फिर भी हल नहीं निकाला जा रहा। बातचीत हो, सकारात्मक दृष्टिकोण हो तो हर समस्या का निदान सम्भव है, यह ध्रुव सत्य है। मगर इसमें पहल सरकार या प्रशासन की तरफ से होनी आवश्यक है। ये मसले जनता से जुड़े हैं, इस कारण इनको लम्बा करना लोकतंत्रीय व्यवस्था में उचित नहीं ठहराया जा सकता। दोनों मसले ऐसे भी नहीं कि इनका निदान न हो, बात सिर्फ पहल करने की है। यह पहल सरकार की तरफ से होनी जरूरी है। एक सांसद, 6 विधायक है सरकार के, फिर निदान न हो, यह सम्भव नहीं। लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि को ही तो इस तरह के मसले हल करने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस दिशा में प्रयास अब समय की जरूरत है, नहीं तो स्थिति सही नहीं रहेगी, नुकसान आम आदमी को होगा।

ये है दो आंदोलन .....

बीकानेर में जो दो आंदोलन चल रहे हैं, उन दोनों से ही पूरी जनता का सीधा संबंध है। पहला आंदोलन है कांग्रेस के संगठन का। पूरा संगठन, विधायक व पूर्व विधायक इस आंदोलन से जुड़े हुए हैं। यह आंदोलन पीबीएम की मेडिकल विंग को शुरू करने की मांग से शुरू हुआ और पीबीएम की अव्यवस्थाओं तक विस्तार ले गया। आंदोलन आगे भी नहीं बढ़ता, यदि शहर व देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिसनाराम सियाग व मदन मेघवाल के साथ युवक कांग्रेस अध्यक्ष के साथ सार्थक बात होती। उनको समस्याओं के निदान का भरोसा दिलाया जाता। मगर उस समय ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन विस्तार पा गया।

रही सही कसर प्रसूताओं की मौत व गम्भीर बीमारी की घटना ने पूरी कर दी। अचानक से कोटा की तरह बीकानेर में भी प्रसूताओं की स्थिति गम्भीर हो गयी। कांग्रेस हमलावर हो गयी। आंदोलन से बड़े नेता जुड़ गये। प्रदेश कांग्रेस का भी दखल हो गया। अचानक से आंदोलन विस्तार पा गया और पूरी कांग्रेस सड़क पर आ गयी। नोखा विधायक सुशीला डूडी, पूर्व मंत्री बी डी कल्ला, पयरव मंत्री भंवर सिंह भाटी, पूर्व मंत्री वीरेंद्र बेनीवाल, पूर्व विधायक मंगलाराम गोदारा, पूर्व महापौर मकसूद अहमद, राजेन्द्र मूंड, महिला कांग्रेस, एनएसयूआई सहित सभी मिलकर मैदान में आंदोलन के लिए उतर आये। स्थिति अस्पताल प्रशासन के हाथ से व जिला प्रशासन के हाथ से भी निकल गयी।

मंत्री के बयान से बिगड़ी स्थिति:

प्रसूताओं की बिगड़ी हालत पर प्रभारी मंत्री और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह बीकानेर आये। प्रेस के सामने जुबान फिसली और बोल गए कि प्रसूताएं नाचते हुए आई....! बस, बवाल बढ़ गया। कांग्रेस भड़क गई। 

उसमें भी बुरी स्थिति यह बनी कि दो प्रसूताओं की मौत हो गयी। अब कोटा व बीकानेर के बाद जोधपुर में भी यही हालत हुई है प्रसूताओं की। आंदोलन विस्तार खा गया। मंगलवार को कांग्रेस ने कलेक्ट्री पर प्रदर्शन किया। कल ही शासन सचिव गायत्री राठौड़ भी यहां पहुंची। सरकार को तो समस्या की मूल जड़ तक पहुंचना चाहिए, वो आंदोलनकारियों से उलझ गए। जो पहल अब की है वो पहले कर लेते। बात तो राहत की है, प्रसूताओं की मौत की वजह जानने की है और अव्यवस्थाओं को दुरस्त करने की है। ये जन हित में भी जरूरी है और सरकार का दायित्त्व भी। उस पर काम करके आंदोलन को रोका जा सकता था। विपक्ष सदा गलत नहीं होता, उसकी बात जो उचित है उस पर जनता के हित में काम भी करना चाहिए। मगर अब तो ये आंदोलन जी का जंजाल बन गया है। टकराहट ज्यादा हो गयी। 

दूसरा आंदोलन ये है....

दूसरा आंदोलन बिगड़ी बिजली व्यवस्था पर है। बारबार की कटौती व लम्बी बन्द बिजली के कारण युवा भाजपा नेता भगवान सिंह मेड़तिया ने ये आंदोलन जनता को साथ लेकर शुरू किया। इसे भी सही तरीके से टेकल नहीं किया गया और जन भावनाओं को तव्वजो नही दी गयी।

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गर्मी में बिजली की खपत बढ़ती है। बिजली तंत्र में भी तेज गर्मी से व्यवधान आता है और तंत्र भी पुराना है जो पूरा अभी तक दुरस्त कम्पनी नहीं कर सकी है। अपनी रफ्तार व योजना से तंत्र को ठीक करने का काम किया जा रहा है। राज्य के पास बिजली भी कम है। इन सब तथ्यों को करीने से रखा जाना चाहिए था। मेड़तिया खुद एक पढ़े लिखे राजनेता है। उनसे सार्थक वार्ता प्रशासन को करनी चाहिए थी।
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बिजली कम्पनी हो या विभाग, व्यापारिक संस्थान है। जितनी बिजली दी जाती है, उतने के दाम वसूले जाते हैं। कम्पनी कमाई तभी करेगी जब बिजली देगी, यह तो सार्वभौमिक बात है। जनता व भगवान सिंह मेड़तिया से यदि प्रशासन सार्थक व सकारात्मक रहकर बात करते तो आंदोलन इस स्थिति में नहीं पहुंचता कि मंगलवार को उन्हें प्रदर्शन करना पड़ता। 
 

रात को जब वे प्रदर्शन के लिए लोगों के साथ निकले तब उनसे वार्ता होनी चाहिए थी, मगर पुलिस प्रदर्शनकारियों से उलझ गए। वहां प्रशासन आता और तथ्यपरक विगत देता। मसला उलझता नही, मगर प्रशासन चूक गया। मेड़तिया खुद राज्य की सत्ताधारी पार्टी के नेता है, उनकी बात को प्रशासन को सुनना चाहिए था।

अब स्वास्थ्य सचिव ने मोर्चा संभाला:

मंगलवार रात स्वास्थ्य सचिव गायत्री राठौड़ खुद बीकानेर पहुंची। बैठकें की। क्योंकि कांग्रेस मुआवजे की मांग पर अड़ी हुई है। शासन सचिव पीबीएम भी पहुंची। ये सब प्रयास स्थानीय जन प्रतिनिधियों के सहयोग से पहले किये जाने चाहिए थे। पीबीएम व बिजली की इन समस्याओं पर आंदोलन को सकारात्मक लेते तो शायद विस्तार नहीं होता। 

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जब जागो तभी सवेरा ...   अब भी सार्थक व सकारात्मक कदम दोनों मसलों पर उठाए जाने चाहिए।

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