लोक कल्याणकारी राज्य में शिक्षा व कला हरेक के लिए होनी जरूरी, संस्कृति की रक्षा सभ्य समाज की जरूरत, उसे संरक्षण जरूरी
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को पूर्ण तभी माना जाता है जब वह अपने राज्य की जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कला व संस्कृति की माकूल व्यवस्था करे। इससे ही नागरिक का जहां विकास होता है वहीं वो स्वस्थ भी रहता है। स्वस्थ नागरिक ही अपने राष्ट्र का विकास करने की क्षमता रखता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति करने वाली सत्ता लोकतांत्रिक भी मानी जाती है।
स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिक के लिए समुचित कला, साहित्य व संस्कृति के सभी साधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सत्ता की होती है। हमारे आदि ग्रंथों में भी यह कहा गया है कि कला व संस्कृति के बिना मनुष्य पशु के समान होता है। इस वजह से हर लोकतांत्रिक देश में कला, साहित्य व संस्कृति को राज्याश्रय प्राप्त रहता है। समाज इस क्षेत्र में रहने वालों का आदर करता है और उनको प्रोत्साहित करता रहता है। इनकी उपस्थिति ही समाज के स्वस्थ होने का प्रमाण मानी जाती है और समाज को भी गौरवान्वित करती है।
राजतंत्र में भी कलाओं को राज्याश्रय था, लोकतंत्र में तो सरकारों ने इसके लिए अलग से संस्कृति मंत्रालय बनाया। बड़ा बजट रखा गया और राज्य के कलाकारों को पुरस्कार देने की भी व्यवस्था की गई। यह प्रक्रिया अब भी जारी है, मगर अब कला, साहित्य व संस्कृति को हाशिये पर डाल दिया गया है। यह चिंता की बड़ी बात है। इसी वजह से व्यक्ति और युवा के भीतर संस्कारों की कमी आयी है और वह अपनी उज्ज्वल परम्पराओं को भी विस्मृत करता जा रहा है। सरकारों को इस तरफ अब गम्भीरता से नजर डालना जरूरी है।
बीकानेर के कलाकारों की नहीं सुनी जा रही बात:
इस लोकतंत्रीय व्यवस्था में भी बीकानेर के रंगकर्मियों व साहित्यकारों की बात को नहीं सुना जा रहा है। बीकानेर में कलाओं के प्रदर्शन के लिए राज्य सरकार के केवल दो स्थल है, एक टाउन हॉल और दूसरा रवींद्र रंगमंच। रवींद्र रंगमंच एक लंबे आंदोलन के बाद यहां के रंगकर्मियों को मिला मगर उसकी व्यवस्था और किराया इतना अधिक व जटिल है कि कलाकार उसे किराए पर लेकर प्रदर्शन करने में भी असफल है। पहले तो इस रंगमंच का किराया घटाने की मांग की गई, मगर उसे नहीं माना गया।

इस हालत में रंगकर्मियों का सहारा बना टाउन हॉल। यह छोटा रंगमंच है, मगर इसके किराए को कलाकार वहन करने की स्थिति में है। क्योंकि कलाओं से अर्थोपार्जन तो होता नहीं।
इस वजह से टाउन हॉल ही शहर के रंगकर्मियों, गायकों, लोक कलाकारों आदि के लिए इकलौता रंगमंच रह गया। इसकी दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि कलाकार अपने बूते इसका किराया चुका देते और नाटक कर लेते। यहां यह भी उल्लेख जरूरी है कि बीकानेर को उत्तर भारत की नाट्य राजधानी कहलाने का भी गौरव मिला है। वह भी इसी टाउन हॉल के बलबूते पर ही हासिल किया गया था।

टाउन हॉल वो रंगमंच है जहां न केवल बीकानेर अपितु देश के अनेक प्रसिद्ध नाट्यकर्मियों ने भी नाटक मंचित किये हैं। छोटा रंगमंच होने के बाद भी रंगकर्मियों ने यहां बेहतर प्रस्तुतियां दी है। जिनकी चर्चा पूरे देश मे हुई। टाउन हॉल अपने में रंगमंच का एक लंबा इतिहास समेटे हुए है। पूर्व राजघराने की है यह बिल्डिंग। मजबूत, सुंदर और सहजता से पहचानी जाने वाली।
अब यही टाउन हॉल हुआ कलाकारों से दूर:
टाउन हॉल की व्यवस्था पहले नगर विकास न्यास के पास थी और यह कलाकारों को सहज में उपलब्ध था। न्यास अध्यक्ष रहे दिवंगत भवानी शंकर शर्मा ने तो यहां कलाकारों को बेहद राहत दी हुई थी। नाटक करने वालों से महज 100 रु किराया लिया जाता था। ठीक इसी तरह हाजी मकसूद अहमद और महावीर रांका जब न्यास अध्यक्ष थे तब भी किराया न्यूनतम था। मगर खास बात यह थी कि इन तीनों न्यास अध्यक्षों ने इस हॉल में नाट्यकर्मियों के लिए खूब सुविधाएं उपलब्ध कराई। हर वो साधन दिया, जिसकी मांग नाटक करने वालों ने की।
उस समय बेहतरीन नाटक इस मंच पर हुए। पूरे देश में बीकानेर की पहचान हुई। बीकानेर गौरवान्वित हुआ। वो स्वर्णिम दौर था। न्यास कलाकारों को लेकर बहुत संवेदनशील था और उनके लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर सक्रिय रहता था।
कुछ समय पहले बीकानेर के रंगकर्मी अपने प्रिय सांसद व देश के कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल से मिले और उनसे टाउन हॉल की दशा सुधरवाने का आग्रह किया। मंत्री जी ने अपने सांसद कोटे से रुपये दिए और टाउन हॉल को दुरस्त कराया। कलाकार खुश थे।
मगर उनकी खुशी अधिक दिन तक कायम नहीं रह सकी। क्योंकि प्राधिकरण ने सीधे ही इसके किराए में 1000 गुना वृद्धि कर दी। अब यह कलाकारों की पहुंच से दूर हो गया। जो टाउन हॉल महीने में 15 दिन बुक रहता था, अब महीनों से बुक ही नहीं हो रहा। बीकानेर की नाट्य, संगीत, नृत्य, लोक कला आदि की गतिविधियां ठप हो गयी है, जिसकी पूरी जिम्मेवारी नगर विकास प्राधिकरण की है।
दुखी हैं बीकानेर के कलाकार:
किराए की इस बेतहाशा वृद्धि से बीकानेर के कलाकार दुखी हैं। इससे भी बड़ा दुख यह है कि बारबार ज्ञापन देने और मिलकर आग्रह करने के बाद भी प्राधिकरण के अधिकारी कोई बात नहीं सुन रहे। किराए को लेकर कोई भी निर्णय नहीं कर रहे। उनकी प्राथमिकता में ही नहीं है कला व संस्कृतिकर्मियों का यह काम।
सांसद व देश के कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने जरूर इन कलाकारों की बात सुनी और अधिकारियों को कहा, मगर अब भी अधिकारियों की नींद नहीं खुली है। यह दुखद स्थिति है।

