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चुनावी खुरचन
पार्षद चुनाव में ही सक्रिय होते हैं सामाजिक संगठन !!

 

RNE Bikaner
स्थानीय सरकार के चुनाव में पार्टियां जहां एक तरफ जातिगत समीकरण देखकर उम्मीदवार तय करते हैं, वहीं दावेदार भी जाति का हवाला देकर टिकट की डिमांड करते हैं। जाति की गणित फीट नहीं बैठती तो फिर अगला पड़ाव समाज होता है। समाज के नाम पर न केवल कुछ दावेदार टिकट मांगते हैं, अपितु पार्टियों को अपरोक्ष रूप से धमकाते भी हैं। इस बार भी यही हुआ है, यह शहर के पाटों का आंकलन है।
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पाटेबाज
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भारतीय संविधान की बात इन दिनों शहर के पाटों पर भी खूब हो रही है। क्यूंकि जब से विपक्ष के नेताओं ने संविधान की लाल किताब लेकर हर सभा मे उसे दिखाना आरम्भ किया है, तब से हर व्यक्ति संविधान की बात भी करने लग गया है, फिर पाटा भला कैसे पीछे रहता।
जब पूर्व न्यास अध्यक्ष महावीर रांका का टिकट कटा तो सबसे पहले सोशल पर उनके त्याग की पोस्ट लोगों ने लगाई, उसे ज्यादा रिस्पॉन्स नहीं मिला। तब अचानक से वैश्य समाज की दुहाई के साथ कुछ पोस्ट लगी। जिसमें इसे समाज का अपमान बताया गया। पाटों की नजर उस पर भी पड़ी। उसे पता चल गया कि त्याग की जगह अब समाज सामने कर दिया गया है।
एक बैठक भी समाज की हुई, जिसमें जमकर रांका के प्रति सहानुभूति जताई गई और भाजपा के निर्णय की आलोचना की गई। बताते हैं, समाज की एक बड़ी बैठक भी आज - कल में हो रही है। जिसमे भाजपा को जमकर कोसा जायेगा और कुछ ' ठोस निर्णय ' भी लिया जाएगा। पाटों की उस बैठक पर भी नजर है। वे देखना चाहते हैं कि त्याग कहाँ तक सफर करता है। 
वैसे प्रायः देखने को मिलता है कि उम्मीदवार समाज को आगे रख टिकट मांगता है, वोट मांगता है, टिकट कटने पर विरोध करता है, बागी बनकर चुनाव लड़ता है। चुनाव के समय ही ये नेता आखिर क्यों अपने अपने समाजों को आगे रख देते हैं। पाटे इस पर मंथन करने में लगे हुए हैं।
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किसको - किसने - कैसे - क्यों बिठाया ?
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पाटों पर कल के बाद से एक सवाल बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है, वह सवाल है पर्चा वापस उठाने का। कल कई निर्दलीयों व बागियों ने अपने पर्चे वापस ले लिए। इनमें वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने पर्चा भरते हुए कसमें खाई थी कि मैदान में डटे रहेंगे, यह इज्जत का सवाल है। समाज की इज्जत का सवाल है। 
मगर कल उनके भी पर्चे उठ गए, तब पाटों पर उसकी चर्चा होना और पर्चा वापस लेने की वजह पर कयास लगने तो वाजिब ही है। पाटबाजों के अनुसार कुछ ने तो केवल मान - मनोव्वल के कारण ही अपना पर्चा उठा लिया। मगर कुछ ने तो ' अच्छी खासी सेवा ' के बाद ही पर्चा वापस उठाया है। 
कुछ ने परिवार के दबाव व रिश्तों की दुहाई के बाद मजबूरी में पर्चा वापस लिया है। कुछ ऐसे भी हैं, जिनको लगा कि पर्चा दाखिल कर बड़ी गलती कर ली। पर्चा वापस लेकर उन्होंने गलती सुधारी है। एक पाटेबाज का कहना था कि कुछ और प्रत्याशी पर्चा लेने को तैयार थे, मगर कोई मनुहार करने ही नहीं आया। किसी ने भी ' सेवा ' का ऑफर भी नहीं दिया। ऐसे लोग पर्चा नहीं उठा सके, खड़े रह गए। बेचारे ! अब करे तो करें क्या ?

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