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किसान के कहा, पत्रिका संपादन लेखन से कठिन काम, कुंजन की राय, प्राथमिक शिक्षा राजस्थानी में हो

डॉ व्यास बोले, संपादक का निर्मम होना जरूरी
 
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

बीकानेर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ' राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं ' में राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति में पहली बार इतनी गम्भीरता से गहन मंथन, चिंतन ही नहीं हुआ अपितु इनकी प्रतिस्थापना के लिए सार्थक व व्यावहारिक सुझाव भी सामने आये। यह संगोष्ठी राजस्थानी कवि, नाटककार, आलोचक व राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के कन्वीनर डॉ अर्जुन देव चारण के सानिध्य में हुई।

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली व डॉ भगवान दास किराडू नवीन समिति के इस संयुक्त आयोजन में प्रदेश के वरिष्ठ राजस्थानी रचनाकारों ने भागीदारी की। जिला उद्योग संघ में हुई इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में नगर के रचनाकारों, बुद्धिजीवियों, शोधार्थियों व साहित्य अनुरागियों की भागीदारी रही। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन व समापन सत्र के अलावा दो तकनीकी सत्र भी हुए।

संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र:

राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं विषयक इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोलते हुए डॉ अर्जुन देव चारण ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता भाषा को बनाने का बड़ा काम करती है। हर संपादक पर भाषा की संरचना और स्वायत्तता को बचाने की दोहरी जिम्मेदारी होती है। इस कारण उसे भाषा, साहित्य और व्याकरण की जानकारी होनी ही चाहिए। उनका कहना था कि वर्तमान साहित्यिक पत्रकारिता को सोशल मीडिया से खतरा है। क्योंकि सोशल मीडिया हिंसा की बात करता है, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता अहिंसा की साख भरता है।

उनका कहना था कि साहित्यिक पत्रकारिता भाषा को बनाने का बड़ा काम करती है। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि मधु आचार्य ' आशावादी ' ने कहा कि समाज मे युवा लेखकों को सामने लाने, प्रोत्साहित करने में साहित्यिक पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहता है। यदि साहित्यिक पत्रकारिता नहीं रहेगी तो नए लेखक सामने नहीं आएंगे, भाषा का विकास नहीं होगा और संस्कृति की रक्षा मुश्किल हो जायेगी। साहित्य अकादेमी के उप सचिव सुरेश बाबू ने कहा कि राजस्थानी एक समृद्ध भाषा है, इसे संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिये।

पहला सत्र : शानदार शुरुआत:

इस तकनीकी सत्र की अध्यक्षता सुखाड़िया विश्वविधालय, उदयपुर के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष, लेखक डॉ कुंजन आचार्य ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा को भूल रही है, इसलिए प्रदेश के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा राजस्थानी में देनी चाहिए। उनका सुझाव था कि नई व पुरानी, सभी राजस्थानी पत्रिकाओं को ऑनलाइन करना चाहिए, जिससे उनको पढ़ने का अवसर मिले। 
इस तकनीकी सत्र में युवा रचनाकार महेंद्र सिंह नरावत ने ' राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता री सामाजिक भूमिका ' विषयक शोध पत्र पढ़ा। इस पत्र में उन्होंने राजस्थानी पत्रिकाओं के इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज ने ही सदैव इन पत्रिकाओं को पोषित किया है और लेखकों से सीख ली है। समाज व साहित्य का सरोकार ही साहित्यिक पत्रिकाओं की आधार भूमि रहा है।


वैचारिक चिंतन का दूसरा सत्र:

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा सत्र कवि, आलोचक गजेसिंह राजपुरोहित की अध्यक्षता में हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता समाज मे वैचारिक चेतना का जबरदस्त काम करती है। उन्होंने कहा कि साहित्य का समाज से सरोकार होता है और समाज से आश्रित रहता है, तभी वह सामयिक बना रहता है। इस कारण हर रचनाकार का दायित्त्व है, वह समाज व व्यक्ति को केंद्र में रखकर उसकी चेतना का प्रयास करे। राजपुरोहित ने अनेक पत्रिकाओं के इतिहास की जानकारी भी दी।

इस सत्र में डॉ नमामि शंकर आचार्य ने ' राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकावां मांय संपादक री समस्यावां ' विषय पर शोध पत्र पढ़ा। अपने शोध पत्र में उन्होंने कहा कि अच्छी रचनाओं की कमी बहुत ही संकट पैदा करती है। लेखकों की तरफ से समय पर रचनाओं को न देना, सबसे बड़ी परेशानी का सबब है। इस सूरत में समझौते करके अपेक्षाकृत युवा लेखकों को प्रकाशित करना पड़ता है, उससे एक अच्छी पत्रिका भी कमजोर हो जाती है। लेखकीय अहंकार पर भी उन्होंने टिप्पणी की।
 

इस सत्र में दूसरा शोध पत्र साहित्यकार, पत्रकार धीरेंद्र आचार्य ने ' राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकावां अर बाजार ' विषय पर प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने पत्र में इस बात का खुलासा किया कि वर्तमान में बाजार राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति और लोक को पूरी तरह प्रभावित करता है। आचार्य का कहना था कि बाजार से अब कोई भी काम अछूता नहीं रहा है, सब कुछ बाजार की गिरफ्त में है। उसके बीच से ही साहित्यकार को और साहित्यिक पत्रकारिता को अपने लिए रास्ता बनाना है।

समापन सत्र में आये सुझाव:

इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि, संपादक रामस्वरूप किसान ने कहा कि सम्पादन का कार्य लेखन से ज्यादा कठिन है, क्योंकि वो कार्य एक लेखक को समाप्त कर देता है। उनका कहना था कि एक लेखक व पाठक के मध्य संपादक पुल का काम करता है। संपादक को किसी भी सूरत में अपनी सामग्री से समझौता नहीं करना चाहिए।

इस सत्र के मुख्य अतिथि कवि, आलोचक, कला समीक्षक डॉ राजेश कुमार व्यास ने कहा कि राजस्थानी में अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं सामने आई, मगर अलग - अलग तरह की समस्याओं के कारण वे बंद हो गयी। उन्होंने कहा कि संपादक निर्मम होता है, क्योंकि उसकी भी अच्छी सामग्री व आर्थिक पक्ष के कारण मजबूरी होती है। व्यास ने राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता की विगत बताते हुए कहा कि एक कुशल संपादक को भाषायी और सांस्कृतिक शब्दों की समझ होनी बहुत जरूरी है। संगोष्ठी समापन पर धन्यवाद देते हुए साहित्यकार नगेंद्र नारायण किराडू ने कहा कि यह राष्ट्रीय परिसंवाद साहित्यिक पत्रकारिता के लिए नई जमीन तलाशने का काम करेगा। एक नई शुरुआत इस आयोजन से होनी सम्भव है। पूरी संगोष्ठी के सभी सत्रों का संचालन कवि, कथाकार, अनुवादक संजय पुरोहित ने किया।

इन रचनाकारों की रही भागीदारी:

मालचंद तिवारी, कमल रंगा, प्रशांत बिस्सा, अनुराग हर्ष, अब्दुल शकूर सिसोदिया, इसरार हसन कादरी, असद अली असद, सुभांगी सुंथार, नंदनी श्रीमाली, जाग्रति भोजक, प्रियंका बिस्सा, सुशीला राठौड़, विनीता शर्मा, गौरीशंकर प्रजापत, डॉ अजय जोशी, डॉ नरसिंह बिन्नानी, प्रशान्त जैन, योगेंद्र पुरोहित, राजेश चौधरी, हिमांशु टाक, शिव दाधीच, उत्कर्ष किराडू, अरविंद भादाणी, उमा शर्मा आदि की इस परिसंवाद में भागीदारी रही।

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