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जनरंजन : डूडी परिवार की पुत्र वधु निकिता उतरी चुनावी समर में, गोविंदराम मेघवाल ने लगाया बेटी सरिता मेघवाल पर दाव, डूडी गुट - मेघवाल की टकराहट का कितना होगा असर? 

RLP को कुछ सफलता मिली तो किधर होगा झुकाव!
 

 

 

जिले में पंचायत राज चुनाव चल रहे हैं। यूं तो सरपंच, प्रधान के चुनाव को लेकर भी हलचल है। मगर सबका ध्यान इस बार जिला प्रमुख के चुनाव पर है। जिला प्रमुख का पद इस बार सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। 60 साल से भाजपा इस पद को हासिल ही नहीं कर पाई है, वो भी पूरी ताकत लगाए हुए है। वहीं सबकी निगाहें डूडी परिवार से चुनाव लड़ रही निकिता डूडी व गोविंद मेघवाल की पुत्री सरिता चौहान पर टिकी हुई है।

मधु आचार्य ' आशावादी '

जिले का ग्रामीण क्षेत्र इन दिनों पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा हुआ है। पंचायत राज के चुनाव से गांव, ढाणी तक में माहौल गर्माया हुआ है। शहरी क्षेत्र में जब स्थानीय निकाय के चुनाव हुए तब जनता का इस तरह का इन्वोलमेंट नहीं था, जैसा कि पंचायत राज चुनावों में ग्रामीणों का है। वार्ड पंच, फिर सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और फिर प्रधान, जिला परिषद सदस्य और फिर जिला प्रमुख के चुनाव, इतने स्तर होने के कारण गांवों का हर घर चुनावी रंगत से गुलजार है।

किसी भी गांव में सबसे बड़ा पद सरपंच का होता है, उसके लिए काफी कशमकश होती है। कई जगह चुनाव हो गए और कई जगह बाकी है। साथ ही पंचायत समिति के सदस्यों व जिला परिषद के सदस्यों के भी चुनाव चल रहे हैं। पंचायत समितियों के प्रधान पर ही सभी राजनीतिक दलों की निगाहें टिकी हुई है। गांवों में इसके लिए कड़ी टक्कर दिखाई दे रही है।

मगर पूरे जिले की राजनीति की निगाहें इस बार जिला प्रमुख के चुनाव पर है। सामान्य महिला के लिए आरक्षित इस सीट को लेकर सब चर्चा कर रहे हैं। सबके मन में एक ही सवाल है कि क्या दिवंगत दिग्गज नेता, किसान केसरी स्व रामेश्वर डूडी परिवार का क्या इस बार भी इस पद पर दबदबा कायम रहेगा ? पिछले 30 सालों से जिला प्रमुख का पद या तो डूडी के पास रहा है या फिर डूडी समर्थक के पास। पंचायत राज चुनाव में कांग्रेस के वे एकमात्र सर्वमान्य नेता रहे हैं। पार्टी ने भी उसे ही सदा टिकट दिया, जिस पर डूडी ने हाथ रखा। डूडी की अनुपस्थिति में पहली बार पंचायत चुनाव हो रहे हैं, इस कारण ही यह सवाल है कि क्या डूडी परिवार का दबदबा इस बार भी कायम रहेगा ?

डूडी परिवार से इस बार जिला परिषद का चुनाव उनकी पुत्र वधु निकिता डूडी लड़ रही है और उनको जिला प्रमुख का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जा रहा है। हालांकि पिछली बार की तरह इस बार भी पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल की पुत्री सरिता चौहान भी जिला परिषद का चुनाव लड़ रही है, उनकी भी जिला प्रमुख के लिए दावेदारी मानी जा रही है। अब कांग्रेस नेतृत्त्व किसे टिकट देता है, बात तो उस समय तय होगी और उस समय ही राजनीतिक दावपेच शुरू होंगे।

भाजपा अब तक तरस रही इस पद के लिए

पंचायत राज में 60 साल से भाजपा कभी भी जिला प्रमुख नहीं बना पाई है। एक बार जब दिग्गज नेता स्व मानिक चंद सुराना देहात भाजपा अध्यक्ष थे, तब जिला परिषद के चुनावों में भाजपा को बहुमत मिला, फिर भी पार्टी का जिला प्रमुख नहीं बन सका। क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस के रामेश्वर डूडी जीत गए और भाजपा हार गई।

भाजपा का उस समय ही केवल जिला परिषद में अच्छा प्रदर्शन रहा, उसके अलावा वो कभी भी अपने अधिक या सम्मानजनक सदस्य नहीं जीता सकी। वहीं कांग्रेस का जिला परिषद चुनावों में एकछत्र राज रहता आया है। 

कांग्रेस के सामने इस बार कांग्रेस ही है

जिले की राजनीति में पिछले एक साल में काफी बदलाव आ गया है। रामेश्वर डूडी के असामयिक निधन के बाद राजनीति बदली है। हालांकि अभी भी नोखा से विधायक उनकी पत्नी सुशीला डूडी है और देहात कांग्रेस का नेतृत्त्व पूरी तरह से डूडी समर्थक व उनके निकटस्थ रहे बिसनाराम सियाग के पास है। मगर इस बार इनको चुनोती पार्टी के भीतर से ही मिल रही है। पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल जो पूर्व सीएम अशोक गहलोत के निकटस्थ है, वे जिला प्रमुख के लिए अपनी पुत्री सरिता चौहान को मैदान में उतारना चाहते हैं। डूडी व मेघवाल के बीच पहले भी एक ही पार्टी में रहते हुए टकराहट रही है।

कुछ महीनों पहले एक बार फिर डूडी समर्थक व गोविंद मेघवाल आमने - सामने हो गए थे। मेघवाल के एक कथित ऑडियो - वीडियो के कारण दोनों के बीच टकराहट बढ़ी। एक दूसरे की सोशल मीडिया पर व जुबान से जंग हुई। सार्वजनिक प्रदर्शन भी हुए। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्त्व ने काफी प्रयास समझौते के किये मगर टकराहट बरकरार है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। मेघवाल के साथ पूर्व सीएम गहलोत है और वे डूडी की पुत्रवधू के सामने अपनी पुत्री के लिए टिकट मांगकर सर्वमान्यता को चुनोती देंगे। इस कारण लगता है कि डूडी समर्थकों को पार्टी के भीतर से ही चुनोती मिलेगी। टिकट तो किसी एक को मिलना है, उसके बाद दोनों गुटों की क्या स्थिति रहेगी, यह देखने की बात होगी।

इस बार आरएलपी भी दमखम से मैदान में है

रामेश्वर डूडी के असामयिक निधन के बाद जिले की राजनीति में आरएलपी सुप्रीमो व नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाई। जाट राजनीति को लामबंद करने के लिए उन्होंने प्रयास किये। जिला परिषद के चुनाव में आरएलपी भी पूरे दमखम के साथ उतरी हुई है और खुद बेनीवाल पूरी शक्ति लगा रहे हैं।

हनुमान बेनीवाल व स्व रामेश्वर डूडी के निकट के सम्बंध रहे हैं, यह बात पूरा राजस्थान जानता है। आरएलपी यदि जिला परिषद की कुछ सीटें जीतती है तो उनकी बड़ी भूमिका रहेगी। इस बात को सभी स्वीकारते हैं। अब आरएलपी का क्या रुख रहता है, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा।

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