जनरंजन : डूडी बिना कैसे रौनक आयेगी पंचायत राज चुनाव में, 30 साल से किसान केसरी रामेश्वर डूडी की तूती बोलती रही है, जिला प्रमुख वही बना, जिसे डूडी ने चाहा, भाजपा तरस रही!
राज्य में पंचायत राज चुनाव का बिगुल बज चुका है। इन चुनावों में सदा से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है, जिसे इस बार भेदने की कोशिश भाजपा करेगी। बीकानेर के पंचायत राज में तो सदा से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। यहां भाजपा तो बहुमत के बाद भी एक बार अपना जिला प्रमुख नहीं बना सकी थी। बीकानेर की ग्रामीण राजनीति की धुरी पूरी तरह से किसान केसरी व दिग्गज जाट नेता स्व रामेश्वर डूडी पर ही टिकी हुई थी। 30 साल तक उन्होंने जिसे चाहा जिला प्रमुख बनाया। कांग्रेस ने भी उनको फ्री हैंड दिया। इस बार पंचायत राज के चुनाव बिना डूडी के होंगे।
मधु आचार्य ' आशावादी '
बीकानेर में जैसे ही पंचायत चुनाव की गतिविधियां आरम्भ हुई, वैसे ही सबके चेहरों पर एक उदासी की लकीर खिंच गई। सबकी गर्दन झुक गई। कुछ लोग तो कातर निगाहों से आसमान को निहारने लगे। इन सबके चेहरों पर स्थिर भाव इस बात को दर्शा रहे हैं कि वे किन्हीं सुखद पुरानी यादों में खो गए, जो अब उनकी आंखों के सामने नहीं है। इस कारण ही भाव स्थिर हो गए। तहसील, गांव, ढाणी तक में बैठा किसान, गरीब चुनाव आते ही गुमसुम सा हो गया है। इन सबकी आंखें सिर्फ एक चेहरे को शून्य में तलाश रही है और वो चेहरा है उनके प्यारे नेता, किसान केसरी स्व रामेश्वर डूडी का।

पिछले पंचायत राज चुनाव में वे सशरीर थे, मगर इस बार के चुनाव में वे नहीं दिखेंगे, यह सोचकर ही किसान और ग्रामीण एक अंधेरी गुफा में डूब जाता है। बिजली, पानी, बैंक से ऋण, फसल मुआवजा जैसी उनकी हर समस्याओं के लिए लड़ने वाला वो एक ही तो लड़ाका था किसान हितैषी रामेश्वर डूडी । जिसने नोखा की प्रधानी से अपनी राजनीति शुरू की और वहां से सीधे देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में पहुंचा।
फिर विधानसभा चुनाव नोखा से जीता और पहली बार जीतने के वावजूद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना। किसानों की, गांव की आवाज को विधानसभा में गुंजाया। दो बार जिला प्रमुख रखा किसानों और ग्रामीणों को लाडला नेता डूडी। 4 बार उसने जिसे चाहा प्रमुख बनाया। ऐसा व्यक्ति जो बीकानेर के हर गांव, ढाणी में बैठे व्यक्ति, किसान से सीधा संबंध रखता था। शायद ही कोई दूसरा नेता होगा जिसकी पहुंच व पहचान जिले के हर गांव, ढाणी तक हो। इस बार के पंचायत राज चुनाव में उस नेता की अनुपस्थिति सभी को अभी से खलने लगी है।
कैसे आयेगी इस बार चुनाव में रौनक ????
रामेश्वर डूडी की उपस्थिति में जब भी चुनाव होते थे तो पूरे ग्रामीण अंचल में एक रौनक रहती थी। गरीब किसान या ग्रामीण भी सरपंच, प्रधान या प्रमुख बनने का सपना पाल सकता था। कईयों के सपने डूडी ने साकार भी किये। कभी अपने परिवार के सदस्यों को पदों पर नहीं लाये वे, अपने साथियों , सच्चे सेवकों को पदों पर लाये।
उठापटक हर चुनाव की एक प्रक्रिया है। जोड़ तोड़ से चुनाव को जीता जाता है। इसके डूडी माहिर थे। वे अपनी राजनीतिक गतिविधियों से पूरे बीकानेर में चुनावी रौनक रखते थे। किसी भी सही व्यक्ति की वकालत करते हुए वे पार्टी तक से लड़ पड़ते थे और वाजिब आदमी को टिकट दिलवाकर, जीताकर छोड़ते थे। उनकी इस आदत से चुनाव में रौनक रहती थी।
30 साल से इन चुनावों में उनकी तूती बोलती रही है
30 साल का समय कोई छोटा नहीं होता, इस अवधि में पंचायत राज चुनाव में दिवंगत किसान नेता रामेश्वर डूडी की तूती बोलती रही है। उन्होंने चाहा उसे टिकट मिला और जीता। पूरे ग्रामीण क्षेत्र में पोस्टर या बैनर पर यदि डूडी की फोटो लगी होती तो वह स्वाभाविक रूप से मजबूत उम्मीदवार बन जाता।

डूडी के वर्चस्व का एक और बड़ा उदाहरण है। एक बार देहात भाजपा के अध्यक्ष दिग्गज नेता मानिक चंद सुराणा थे और जिला परिषद का चुनाव उनके पुत्र जितेंद्र सुराणा भी लड़े थे। भाजपा को जिला परिषद में पूर्ण बहुमत मिला। उनकी जीत तय मानी जा रही थी। तब डूडी ने खुद को रिस्क में डाला और कांग्रेस से खड़े हो गए। आश्चर्यजनक तरीके से बिना बहुमत वे विपक्ष के वोट तोड़कर जीत भी गए।
भाजपा तरस रही प्रमुख बनाने को
स्व रामेश्वर डूडी के रहते भाजपा अपना जिला प्रमुख बनाने के लिए तरसती ही रही। तीन दशक तक डूडी ने जिसे चाहा वही प्रमुख बना। उनका यह रिकॉर्ड उनकी अनुपस्थिति में भी कायम रहेगा या नहीं, उसका पता इस चुनाव में चलेगा। कांग्रेस कैसे उस रिकॉर्ड को बरकरार रखती है यह देखने की बात होगी।
सुशीला जी, बिसनाराम कैसे करेंगे डूडी की कमी को पूरा
जब किसान केसरी रामेश्वर डूडी गम्भीर बीमार थे, तब कांग्रेस ने उनकी परम्परागत नोखा विधानसभा सीट से उनकी पत्नी सुशीला रामेश्वर डूडी को टिकट दिया, वे चुनाव भी जीती। डूडी ने अपनी सक्रियता के समय देहात कांग्रेस की कमान बिसनाराम सियाग को दी, जो अभी भी उनके पास ही है। उससे साबित होता है कि डूडी का चयन सही था।

अब सुशीला जी डूडी व बिसनाराम के सामने चुनोती है कि वे डूडी की विरासत को कैसे संरक्षित करके उनकी कमी को पूरा करेंगे। उनके साथ रहकर संघर्ष करने वालों को कैसे उनका वाजिब हक़ दिलवायेंगे। इस बार के पंचायत चुनाव में इस बात पर भी सबकी नजर रहेगी।

