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जनरंजन : टिकटों के वितरण में तो नेता सक्रिय हो गए, अब जिम्मेदारी भी तो ले, संगठन के भरोसे काम छोड़ने की नीयत, केवल दखल की चाह, दोनों तरफ ही इस सवाल को लेक मौन

 

मधु आचार्य ' आशावादी '

नगर निगम के लिए मतदान की उलटी गिनती शुरू हो गयी है। गुरुवार को नाम वापसी का समय निकलने के बाद कमोबेश हर वार्ड में मुकाबले की तस्वीर भी अब साफ हो गयी है। अब तक का चुनावी समय तो केवल उम्मीदवार चयन और उनके नामांकन कराने में बीता। फिर चुनाव कार्यालयों के खुलने का सिलसिला चला। फीता काटने की रस्म भी दोनों दलों, निर्दलीयों में अब पूरी हो गयी। अब उम्मीदवार भी अपने वार्ड में जनसंपर्क करने व वोट मांगने में जुट गए। छोटी छोटी रैलियां भी वार्डो में निकलने लग गई।
टिकट वितरण का पूरा समय कसैला रहा। कांग्रेस में कहा गया कि टिकट संगठन के माध्यम से ही  वितरित किये जायेंगे। शहर व देहात अध्यक्ष ने मिलकर सर्वे भी कराया और अपनी तरफ से तैयारी भी की। मगर टिकट में अधिक दखल बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के वार्डों में चुनाव लड़ चुके डॉ बी डी कल्ला का रहा। ठीक इसी तरह पूर्व विधानसभा क्षेत्र के वार्डों में दखल चुनाव लड़ चुके यशपाल गहलोत का रहा। संगठन पर तो भूंड का ठीकरा ही अधिक फूटा। जिसके कई चितराम इस शहर ने भी देखे। कहीं विद्रोह, कहीं हाथापाई, कहीं नारेबाजी, कहीं बगावत, कहीं आरोपों की झड़ी लगी। इन सबसे गुजरते हुए अब उम्मीदवार तो फाइनल है।
भाजपा ने बहुत ही सिस्टेमिक तरीके से टिकट वितरण की प्रणाली अपनाई। सर्वे, विधायकों की सूची, अधिकारियों की रिपोर्ट, ऑब्जर्वर की बात और फिर जयपुर में मीटिंग और टिकट का निर्धारण। मगर यह प्रक्रिया भी इतनी जटिल रही कि विद्रोह यहां भी हुआ। बाहरी को टिकट देने के मामले सामने आये। सबसे बड़ी घटना महावीर रांका को टिकट मिलना व काफी कुछ बुरी गत में टिकट कटना रहा, उससे वैश्य समाज नाराज है। इस टिकट के कटने में दिल्ली दरबार के दखल की बात सामने आई। वहीं विद्यार्थी परिषद से शुरू होकर अब तक भाजपा में सक्रिय अशोक भाटी का टिकट कटना भी बड़ी घटना रहा। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि उसका एक उम्मीदवार निर्विरोध जीत गया। भाजपा में सबसे बड़ी समस्या अंदरखाने की गुटीय राजनीति है, जिसका असर चुनाव पर साफ दिख रहा है।

अब कमान कौन संभालेगा चुनाव की ???

अब सबसे महत्त्वपूर्ण काम है निगम में बोर्ड बनाने का, मतलब मेयर अपना बनाने का। यह काम सबसे कठिन होता है। पार्टी को भले ही जनता बहुमत दे दे, मगर निगम में दलबदल कानून तो लागू होता नहीं, इस सूरत में महापौर व उप महापौर के चुनाव तक पार्टी के सभी पार्षदों को संभालना होता है। एकजुट रखना होता है। यदि संख्या बल कम हो तो निर्दलीय व अन्य पार्षदों को तोड़कर लाना होता है। यह काम आसान नहीं। इसमें धन बल और बाहु बल की भी जरूरत होती है। संगठन की जरूरत है। यह सब करने के लिए बड़ी रणनीति भी आवश्यक है। जिसकी किसी न किसी को जिम्मेवारी तो देनी पड़ती है। ताकि वो अगुवाई करे और पार्टी का बोर्ड बनाये।
इसके लिए सबसे पहले पार्टी के उस नेता का चयन जरूरी है जो महापौर व उप महापौर चुनाव की कमान संभाले। सारी व्यवस्थाएं करे। रणनीति बनाये। संगठन व बाकी नेता उसके सहयोग को खड़े रहें। बाहर से आये पर्यवेक्षक या पार्टी के नेता नीति बनाने में सहयोगी हो सकते हैं, साधन उपलब्ध करा सकते हैं मगर फील्ड में तो यहीं के नेता काम आयेंगे, वही पार्षदों को जानते हैं। बात भाजपा की करें तो उसके पास तो सांसद व केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल हैं। जिन्होंने पिछली बार निगम में भाजपा का बहुमत न होने के बाद भी भाजपा का बोर्ड बनवाया जो पूरे पांच साल चला।

अब बात कांग्रेस की

पिछली बार निगम चुनाव में कांग्रेस की स्थिति बेहतर रही थी और राज्य में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। बीकानेर से दिग्गज नेता डॉ बी डी कल्ला, गोविंद मेघवाल व भंवर सिंह भाटी राज्य सरकार में मंत्री थे। स्व रामेश्वर डूडी को कैबिनेट का दर्जा हासिल था। इसके अलावा महेंद्र गहलोत, लक्ष्मण कड़वासरा को मंत्री स्तर का दर्जा था, फिर कांग्रेस कमजोर रणनीति के कारण अपना बोर्ड नहीं बना सकी। मेयर नहीं बना सकी। उस समय की गुटबाजी व कमजोर रणनीति की चर्चा अब बेमानी है।
मगर सवाल वही है। यदि इस भी कांग्रेस को बहुमत मिला या बहुमत के करीब पहुंचे तो कौन कमान संभालेगा, यह बड़ा सवाल है। जिसका जवाब अभी तय नहीं किया तो आगे मुश्किल खड़ी होनी तय है। संगठन की जिस तरह से टिकट वितरण में स्थिति बनी, उससे तो ज्यादा उम्मीद बंधती नहीं। कांग्रेस को भी यदि सफल होना है तो किसी एक बड़े नेता को अभी से कमान देनी होगी और मेयर का उम्मीदवार भी अभी से तय करना होगा। परिणाम के बाद पार्षदों को एकजुट रखना, कम पड़े तो व्यवस्था करना आदि कई काम करने होंगे। इन सबका निर्धारण अभी करना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि पिछली बार की तरह हाथ में आई बाजी निकल न जाये। क्योंकि इस समय राज्य में भाजपा की सरकार है। 

दोनों तरफ के दावेदार

यूँ तो दोनों पार्टियों की तरफ से कौन मेयर का दावेदार है, यह तो पार्टी नेतृत्त्व को ही पता होगा। कोई फेरबदल तभी होगा जब कोई दावेदार पार्षद का ही चुनाव हार जाये। अभी तो लोग ही अपनी तरफ से दावेदार तय कर रहे हैं, जिनको कयास ही कहा जाना चाहिए।
भाजपा को लेकर ये कयास :: भाजपा को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार मेयर के लिए अशोक प्रजापत, सुरेंद्र सिंह शेखावत, किशोर आचार्य, श्याम सिंह हाडला, मधु सुराणा, भगवान सिंह मेड़तिया, सुशीला कंवर, रवि पारीक दावेदार हो सकते हैं।
कांग्रेस को लेकर कयास :: कांग्रेस को लेकर भी लोग कयास लगा रहे हैं जिनमें यह नाम आ रहे हैं -- अनिल कल्ला, धर्मवीर नाहटा, मकसूद अहमद, संजय आचार्य, दुर्गादास छंगाणी।

दोनों तरफ है मौन

मेयर का उम्मीदवार कौन होगा और चुनाव की कमान किसके हाथ में रहेगी, इस बात को लेकर दोनों ही तरफ से अभी सन्नाटा छाया हुआ है।

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