पति के अंत्येष्टि स्थल पर ठिठकी.. फफकी.. फिर उसी के रास्ते चल पड़ी सुशीला
धीरेन्द्र आचार्य
RNE Special
दर्द को पल्लू में बांधा। पति की अंत्येष्टि स्थल पर पहुंची तो न जाने कैसे वह पल्लू से निकल आंखों के रास्ते बहने लगा। सिर उस दीवार पर झुक गया जो चितास्थल के इर्द-गिर्द बनी थी। कुछ देर आंसू बहे। फिर एक दृढ़ता उभरी पूरी ताकत से उसी कर्तव्य पथ पर चल पड़ी जिस पर पति आखरी दम तक चला।
कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है विधायक सुशीला रामेश्वर डूडी के शुक्रवार को एक बार फिर जनता के बीच जाने से पहले के हालात देखकर। दरअसल बीकानेर जिले कें नोखा विधानसभा क्षेत्र की विधायक सुशीला डूडी अपने पति दबंग कांग्रेस नेता रामेश्वर डूडी के निधन के तीन महीने बाद शुक्रवार को पहली बार अपने विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के बीच जाने के लिए निकली।

बीकानेर स्थित घर से निकली तो नोखा जाते वक्त रास्ते में वह स्थान आया जहां तीन महीने पहले यानी 04 अक्टूबर 2025 को पति के निधन के बाद अंत्येष्टि हुई थी। सुशीला डूडी ने यहां गाड़ी रुकवा दी। बोझिल कदमों से अंत्येष्टि स्थल की ओर बढ़ी और चितास्थल की चारदीवारी के पास जाकर ठिठक गई। विधानसभा, लोकसभा से लेकर आमसभा तक में दहाड़ने वाले दबंग पति रामेश्वर डूडी की जगह सामने पड़ी थी चिता की राख।
ये देख आंसू निकल पड़े और हाथों को दीवार पर रखकर उसमें चेहरा छिपाए फफकने लगी। देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशनाराम सियाग, पुत्र अतुल डूडी सहित परिजन, समर्थक भी भावुक हो गए। दिलासा दिया तो कुछ देर मंे संभली। पति को नमन किया। चेहरे पर दृढ़ता लाई और नोखा की तरफ चल पड़ी।
दरअसल सुशीला रामेश्वर डूडी पति के निधन के बाद पहली बार नोखा विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और आम लोगों से मिलने गई।
यूं देखा जाए तो भले ही वे दो साल से अधिक समय से विधायक है लेकिन राजनीति के दुर्गम रास्ते पर अपने बूते यह उनका पहला कदम भी है। वह इसलिए क्योंकि 27 अगस्त 2023 के दिन जब रामेश्वर डूडी को अचानक ब्रेन हेमरेज हुआ, ऑपरेशन हो गया तो लगा वे ठीक हो जाएंगे।
ऐसा नहीं हुआ तो उनकी जगहा नोखा से उनकी पत्नी सुशीला डूडी को चुनाव मैदान में उतारा। बीकानेर जिले की सात में से छह सीटें हारी कांग्रेस लेकिन यह इकलौती सीट जीती। इसके बावजूद सुशीला डूडी ने कभी खुद को एक राजनेता या विधायक के तौर पर नहीं देखा। वे दिन-रात पति की सेवा में लगी रही और कहती रही ‘साब ठीक हो जाएंगे। ये राजनीति वे ही संभालेंगे।’
ऐसा हो न सका और दो साल की लंबी अवधि बिस्तर पर गुजारने के बाद 04 अक्टूबर 2025 को रामेश्वर डूडी दुनिया को अलविदा कह गए। पक्ष-विपक्ष के देशभर के नेता, हजारों समर्थक अंतिम विदाई मंे जुटे। सुशीला मानो टूट चुकी थी लेकिन आज उसने एक बार फिर खुद को सहेजा, संभाला और पति के सपनों को पूरा करने उनके ही रास्ते पर चल पड़ी। कहां तक चलती है, मंजिल कौनसी है, यह समय ही बताएगा।
अभी तो पहली चुनौती सामने मौजूद पंचायत चुनाव है। पूरा प्रदेश के जानता है कि बीकानेर जिले मंे पंचायत चुनाव की चौधराहट लगभग 25 सालों से रामेश्वर डूडी ही करे आए हैं। खुद जिला प्रमख बने, प्रधान बने और जब जिसे चाहा उसे प्रमुख, प्रधान बनाया। उनके रहते भाजपा कभी अपना प्रमुख नहीं बना पाई। इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी में भी उनकी मर्जी से इतर कोई और इस पद पर नहीं पहुंच पाया।
ऐसे मंे चुनौती बाहर से ही नहीं भीतर से भी है। डूडी ने जिन्हें जमीन से उठाकर नेता बनाया उनमें से कई वक्त और अवसर देख पाला बदल बदल चुके हैं। कुछ ऐसे हैं जो अब भी उसी नाम पर अडिग है और सुशीला के पीछ चल पड़े हैं। ऐसे में लोगों को लामबंद करना। पूरे जोश से मैदान में लाना और डूडी की विरासत को संभाले रखना सुशीला डूडी के लिए पहली और बड़ी चुनौती है।

