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Rail Minister Ashwini Vaishnav को कल्ला का फरियादियों की तरह ज्ञापन,  रेलमंत्री की ओर से अनदेखी!

बीकानेर : ..पूर्व मंत्री को भीड़ में लगानी पड़ी गुहार! बीकानेर के अंडरपास पर राजनीति या जनहित?

 

 

RNE Bikaner. 

बीकानेर में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का दौरा। भारी भीड़ के बीच ज्ञापनों की बौछार। जनसुनवाई जैसा माहौल जिसमें लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे । इसी भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था, जिसने सबका ध्यान खींचा। ये कोई आम नागरिक या स्थानीय कार्यकर्ता नहीं बल्कि राजस्थान की राजनीति का बड़ा नाम-डॉ. बी.डी. कल्ला।

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छह बार विधायक, पूर्व कैबिनेट मंत्री, राजस्थान कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके कल्ला। वे उसी भीड़ में खड़े होकर रेल मंत्री को ज्ञापन सौंप रहे थे। मुद्दा था बीकानेर के दो महत्वपूर्ण रेलवे फाटक- कोटगेट और सांखला फाटक।

कल्ला ने रेल मंत्री को दिए ज्ञापन में कहा कि कोटगेट पर बन रहा अंडरब्रिज केवल चार मीटर चौड़ा है, जिससे एकतरफा यातायात ही संभव होगा। यानी रेलवे फाटक की मूल समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। उन्होंने तर्क दिया कि देश में शायद ही कहीं एकतरफा अंडरब्रिज का मॉडल अपनाया गया हो और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इसे दोतरफा बनाया जाना चाहिए।

दूसरा मुद्दा था सांखला रेलवे फाटक। रेलवे की योजना के अनुसार यहां फाटक बंद कर दीवार बनाई जानी है। कल्ला का कहना है कि इससे पैदल यात्रियों और दोपहिया वाहन चालकों को भारी परेशानी होगी। फड़ बाजार और आसपास के इलाकों तक पहुंचने के लिए लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा।उन्होंने मांग की कि सांखला फाटक को पूरी तरह बंद करने के बजाय पैदल और दोपहिया यातायात के लिए रास्ता खुला रखा जाए।

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ज्ञापन में एक और बड़ा सुझाव भी दिया गया। कहा, बीकानेर-लालगढ़ के बीच डबल लाइन और विद्युतीकरण परियोजना के लिए भारी भूमि अधिग्रहण और मुआवजे की जरूरत पड़ेगी। कल्ला ने इसके विकल्प के तौर पर नाल स्टेशन को उदयरामसर के रास्ते बीकानेर कैंट स्टेशन से जोड़ने का प्रस्ताव रखा। उनका दावा है कि इससे कम लागत में और कम विवाद के साथ परियोजना पूरी हो सकती है।

इससे इतर खबर का सबसे दिलचस्प हिस्सा तकनीकी नहीं, राजनीतिक है। सवाल यह है कि क्या राजस्थान की राजनीति के इतने वरिष्ठ नेता को अपनी बात रखने के लिए भीड़ में एक सामान्य फरियादी की तरह खड़ा होना चाहिए?  यह लोकतंत्र की खूबसूरती है, जहां हर व्यक्ति बराबर है? या फिर यह विपक्ष की उस स्थिति का प्रतीक है, जहां सत्ता में बैठे लोग विपक्ष के अनुभवी नेताओं को वह महत्व नहीं दे रहे, जिसके वे हकदार हैं?

फोटो-वीडियो में साफ दिख रहा है कि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ज्ञापन लिया, मुस्कुराते हुए आश्वासन दिया। साथ खड़े केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने भी "विचार करने" जैसी गर्दन हिलाई और दोनों दूसरे फरियादियों से मुखातिब हो गए।  कल्ला के साथ ज्ञापन देने गए देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशनराम सियाग केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल और उनके नेता की इस तरह की जा रही अनदेखी से असहज दिखे।

सवाल यह भी है कि क्या बीकानेर के इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर रेलमंत्री के यही प्रतिक्रिया पर्याप्त है? क्या दो केंद्रीय मंत्रियों को तत्काल अधिकारियों के साथ बैठक बुलाकर तकनीकी बिंदुओं पर चर्चा नहीं करनी चाहिए थी? क्या यह "ज्ञापन सौंपन" केवल एक औपचारिक मुलाकात बनकर रह गई?

राजनीति के अनुभवी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि राजनीति में पद आते-जाते रहते हैं लेकिन जनप्रतिनिधि का कद और अनुभव बना रहता है। इसलिए यह घटना सिर्फ अंडरब्रिज की डिजाइन का विवाद नहीं है। यह उस सवाल को भी जन्म देती है कि क्या हमारे लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को पर्याप्त सम्मान और गंभीरता मिल रही है? 

और सबसे बड़ा सवाल? क्या बीकानेर की जनता की चिंताओं पर वास्तव में विचार होगा या यह ज्ञापन भी फाइलों के ढेर में कहीं दब जाएगा?

क्या डॉ. बी.डी. कल्ला का इस तरह भीड़ में ज्ञापन देना लोकतांत्रिक सादगी का उदाहरण है, या यह एक वरिष्ठ नेता की राजनीतिक उपेक्षा?

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