Movie prime

उर्दू साहित्य में श्रीकृष्ण: प्रेम, रूहानियत और इंसानियत का प्रतीक

 

इमरोज़ नदीम

RNE Special.

उर्दू अदब की तारीख़ इस हक़ीक़त की गवाही देती है कि यह ज़बान महज़ लफ़्ज़ों का निज़ाम नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब और रूहानी विरसे की मुकम्मल ताबीर है। इसकी परवरिश उन गलियों, बाज़ारों, चौपालों और ख़ानक़ाहों में हुई जहाँ मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब, अकीदों और रस्म-ओ-रिवाज के लोग आपस में घुलते-मिलते रहे। यही तहज़ीबी मेल-जोल उर्दू शायरी में श्री कृष्ण-भक्ति के रंग को शामिल करने का सबसे बड़ा सबब बना।
d

उर्दू शायरी में श्री कृष्ण का तसव्वुर महज़ एक पौराणिक किरदार नहीं, बल्कि इश्क़, हुस्न, रूहानियत और इंसानी जज़्बात की मुकम्मल अलामत बनकर सामने आता है। श्री कृष्ण की बाँसुरी, उनका बालपन, गोपियों का इश्क़, रास, विरह और उनकी मुस्कान ये तमाम तसव्वुरात उर्दू शायरी में इश्क़ और कैफ़ियत के इस्तिआरे बन गए।

चकबस्त के यहाँ इंसानी हमदर्दी और मोहब्बत का पैग़ाम मिलता है। उनके अशआर में यह जज़्बा साफ़ दिखाई देता है कि इंसानियत की राह मोहब्बत से होकर गुजरती है

“था जो दुखियों को रहे राहत पे लाना मंज़ूर
हक़ ने किया क़ालिबे-ख़ाकी में ज़हूर।”

राधेश्याम रस्तोगी के यहाँ श्री कृष्ण की बाँसुरी का असर गोपियों की बेख़ुदी, मुस्कराहट और दिलों की बेकली का ऐसा मंजर पेश करता है जिसमें पूरा ब्रज बोल उठता है

“रहस किया तो गोपियों में बेख़ुदी सी आ गई,
बाँसुरी की शान उतर गई, समा गई लबों की हँसी।”

उर्दू शायरी में श्री कृष्ण-भक्ति का सबसे मुकम्मल रंग नज़ीर अकबराबादी के यहाँ दिखाई देता है। उन्होंने श्री कृष्ण के बालपन, उनकी शरारतों, माखन-चोरी और खेल-कूद को बड़ी सादगी और असर के साथ बयान किया

“थे जो ग्वालों के लगे घर से जा-बजा,
माखन-मलाई, दूध जो पाया सो खा लिया।”

नज़ीर ने श्री कृष्ण को मुरलीधर, मनमोहन, कुंज बिहारी, घनश्याम और गिरिधारी जैसे नामों से याद किया और उनके बचपन से लेकर उनकी लीलाओं तक हर मंज़र को जिंदा कर दिया।
 

सलाम सन्देलवी ने श्री कृष्ण के बालपन को बेहद दिलकश अंदाज़ में पेश किया, जबकि मुंशी राम बहादुर जौहर ने श्री कृष्ण की बाँसुरी को रूहानी नग़्मा कहा एक ऐसा नग़्मा जो इंसान के अंदर सुकून और मोहब्बत की कैफ़ियत पैदा करता है।

नवाब वाजिद अली शाह ‘अख़्तर’ का मशहूर ड्रामा “राधा कन्हैया” इस सिलसिले की अहम कड़ी है। इसमें राधा और कन्हैया के मुक़ालमात मुहब्बत और अपनाइयत की ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जिसमें रूहानी तअल्लुक़ की पूरी कैफ़ियत समा जाती है

“सीस मुकुट कटि काछनी कर मुरली अरु माल,
यह बालक मोहन बसे सदा बिहारी लाल।”

ड्रामे में बाँसुरी का ज़िक्र महज़ एक साज़ नहीं, बल्कि मुहब्बत की अलामत बनकर सामने आता है।
 

इंशाअल्ला ख़ाँ ने हिंदुस्तानी ज़िंदगी और रिवाजों को अपने अंदाज़ में बयान किया और उनके मिसरे आज भी बच्चों की ज़बान पर मिलते हैं- 

“डोली, डंडा, पालकी, जय कन्हैया लाल की।”

हालांकि बचपन में सुनते थे हाथी ,घोड़ा पालकी ,जय कन्हैया लाल की । लेकिन इंशाल्लाह खां को पढ़ने के बाद मूल लफ़्ज़ समझ आते हैं ।

उर्दू के शायर जाफ़र अली ख़ाँ ‘असर’ श्री कृष्ण की शख़्सियत से गहरे मुतास्सिर थे। उन्होंने “गीता” का मनज़ूम तर्जुमा “नाम-ए-जावेद” के नाम से पेश किया और अपनी शायरी में श्री कृष्ण की बाँसुरी के नग़्मे को यूँ बयान किया:

“लाले मुर्ज़न जगाए बंसी, ऐ लो वह श्याम ने लगा दी,
अब इससे ज़्यादा कौन-सा साज़, हर एक तराना दिल रबा है।”

साधु राम ‘आरज़ू’ के यहाँ भी श्री कृष्ण की तारीफ़ क़सीदे की ज़बान में मिलती है और वही रंग पैदा होता है जो उर्दू के शायर इस्लामी हस्तियों के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं।
 

अगर गौर किया जाए तो उर्दू अदब और श्री कृष्ण-भक्ति का यह रिश्ता दरअसल इंसानी मुहब्बत और रूहानी एहसास का रिश्ता है। यह हमें याद दिलाता है कि अदब का असल मक़सद तफ़रीक़ नहीं बल्कि दिलों को जोड़ना है। यही वजह है कि उर्दू शायरी की यह रवायत गंगा-जमुनी तहज़ीब की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल बनकर सामने आती है।

FROM AROUND THE WEB