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बाजारवाद के दौर में भी सामाजिक बदलाव के प्रयास में जुटे हैं सुधीश शर्मा

आर्थिक विशेषज्ञ मगर अर्थ पहली प्राथमिकता नहीं
गुरु - शिष्य की सनातन परंपरा को जीना जिनका स्वभाव
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Network.


( बीकानेर में सेवा के सम्मान की एक बड़ी परम्परा है। यहां के रचनाकारों ने अपने साहित्य के जरिये शहर को देश भर में पहचान दी तो यहां के ज्योतिषियों ने दुनिया भर में बीकानेर का नाम किया। बीकानेर आज देश - दुनिया में पहचाना जाता है तो उसके पीछे कई लोगों की अथाह मेहनत है। उन्हीं लोगों में से एक है सीए सुधीश शर्मा। जिन्होंने अपने आर्थिक जगत के ज्ञान के साथ सेवा के भाव के कारण देश में खास पहचान बनाई। ' ऑवर फॉर नेशन ' को आज पूरा देश जानता है। इस तरह के लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस RNE अपने पाठकों को इनसे परिचित करा रहा है। साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी व ज्योतिषाचार्य राजेन्द्र व्यास ' मम्मू महाराज ' के बाद आज सुधीश शर्मा के बारे में जानकारी। अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें। - संपादक )
 

आजादी से पहले संयुक्त परिवार व्यवस्था मजबूत थी, इस मजबूती के परिणामस्वरूप ही समाज भी मजबूत था। सुख - दुःख का फर्क तब व्यक्ति को पता नहीं लगता था क्योंकि परिवार और समाज उस दर्द को बांटकर हल्का कर देता था। संयुक्त रहने के लाभ की एक कथा सभी ने बचपन में पढ़ी होगी। एक लकड़ी को तो हर कोई तोड़ देता है, मगर सभी लकड़ियों को संयुक्त रखकर गट्ठर बना दिया जाए तो बड़ी से बड़ी ताकत उसे तोड़ नहीं सकती। संगठन में शक्ति है - यह उक्ति इसी वजह से आज भी सुनाई जाती है। जो सार्थक भी है।

इस मूल मंत्र को जब हम अपने शहर में ढूंढने की कोशिश करते हैं, वो भी नई पीढ़ी में तो यकायक नजर एक युवा पर जाकर ठहरती है। जिसमें आधुनिक युग की सोच है, युवा की ऊर्जा है और अपनी धवल परंपरा को जिंदा रखने की ललक है। उस व्यक्ति का नाम है सुधीश शर्मा।
 

कोई उसे सीए के रूप में जानता है तो कोई उसे सार्वजनिक क्षेत्र में निः स्वार्थ भाव से काम करने वाले जुनूनी के रूप में पहचानता है। कुछ लोग इस युवा को अपना अभिन्न मित्र मानते हैं तो कुछ इसे शहर का एक जागरूक नागरिक। बुद्धिजीवी इस युवा को अपनी जमात का इंसान मानते हैं। हर व्यक्ति की एक जाति होती है, समाज होता है, वो सुधीश शर्मा का भी है। मगर इस युग की भ्रष्ट राजनीति की तरह समाज व जाति इनके लिए लाभ का जरिया नहीं, अपितु सम्मान का प्रतीक है। हर समाज की तरह सुधीश का समाज भी दूसरे समाज, दूसरी जाति का आदर व सम्मान सिखाता है, उसमें भी यह शख्स पीछे नहीं है। सामाजिक समरसता इस युवा के लिए कोई किताबी शब्द नहीं, जीवन शैली है। संकीर्ण होते मानव स्वभाव के मध्य इस भाव को जिंदा रखना इस दौर में बहुत मुश्किल है, मगर सुधीश ने जिंदा रखा हुआ है, इस वजह से ही वह अलीजा शहर बीकानेर की बड़ी प्रोफ़ाइल है। 
 

साहित्यकार व चिंतक डॉ अर्जुन देव चारण अक्सर कहा करते हैं कि इस युग में व्यक्ति इतना स्वार्थी हो गया है कि वह अपने से आगे सोचता ही नहीं। अपनों तक को उसने छोड़ दिया, केवल खुद तक अपने को सीमित कर लिया। जबकि जिंदा इंसान तो वो है जो दूसरे के गुण की भी खुलकर तारीफ करे। बड़ा है तो उसके गुणों का सम्मान कर उनका अवलम्बन करने की कोशिश करे और यदि गुण वाला छोटा है तो उसे प्रोत्साहित करें। डॉ चारण की भावना के अनुरूप ही सुधीश शर्मा का जीवन है। वे शहर के हर बुद्धिजीवी का सम्मान करते हैं और हर लेखक के प्रति आदर भाव रखते हैं। हर फील्ड में कुछ हटकर अच्छा करने वालों का पूर्ण विनम्रता के साथ आदर करते हैं। यदि कोई युवा इन सब दिशाओं की तरफ बढ़ता दिखता है तो उसे जबरदस्त प्रोत्साहित करते हैं। ये जज्बा इस दौर में किसी व्यक्ति में बमुश्किल ही मिलता है, इस जज्बे के कारण ही शहर सुधीश शर्मा का सम्मान करता है। 

दार्शनिक कहते हैं, सौ बीमारियों की एक दवा है - मुस्कुराहट। यही दवा सुधीश शर्मा का बड़ा गहना है। उनको जो 25 - 30 सालों से जानते हैं, उनका सबका यही कहना है कि सुधीश के चेहरे पर हमने सिवाय मुस्कुराहट के कुछ भी नहीं देखा। हर बात मुस्कुराकर करते हैं, हरेक का स्वागत ताजगी भरी हंसी से करते हैं। इस वजह से ही आदमियों की भीड़ में सुधीश शर्मा सदा अलग से नजर आ जाते हैं। पहचान लिए जाते हैं।

गुरु - शिष्य परंपरा के संवाहक:

सुधीश शर्मा अर्थ जगत का एक जाना पहचाना व बड़ा नाम है। वे सीए हैं। अपने बूते पर न केवल यह शिक्षा अर्जित की अपितु अपनी मेहनत से एक जानकर चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में अपनी पूरे देश में पहचान बनाई। अनेक सरकारी महकमे अपने काम की पारदर्शिता की परख के लिए सीए के रूप में सुधीश से ही सेवाएं लेते हैं। वे सरकारी महकमे इनकी हामी के बाद निश्चिन्त हो जाते हैं। उनको पता है कि सुधीश का होना बेहतर पड़ताल व ईमानदारी की गारंटी है। 

 

इस छवि के कारण ही बीकानेर ही नहीं अपितु अन्य स्थानों के व्यापारी व बड़े उद्यमी भी सीए के तौर पर इनकी ही सेवाएं लेना चाहते हैं। अनेक बड़े उद्यमी, बड़े व्यापारिक व व्यावसायिक प्रतिष्ठान के सीए सुधीश है। काम के प्रति उनकी लगन ने ही उनको इतना बड़ा फलक दिया है।
 

एक जिम्मेदार व जानकर सीए सुधीश शर्मा एक बेहतर सीए है इसका प्रमाण है कि देश के प्रमुख समाचार पत्र के साथ अनेक समाचार पत्र भी अपनी यूनिट की ऑडिट इनसे कराते हैं। यह बड़े भरोसे का काम होता है। इस अर्थ में यदि हम यह कहें कि एक सीए के रूप में भरोसे का दूसरा नाम सीए सुधीश शर्मा है। 

अपने सनातन व भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों में सुधीश की गहरी आस्था है। इसका प्रमाण उनका ' गुरु - शिष्य ' परंपरा में गहरा विश्वास है। इसका उदाहरण भी है। उन्होनें सीए बनकर अपना ज्ञान केवल खुद तक सीमित नहीं रखा, अपितु बीकानेर में सीए की एक बड़ी टीम भी तैयार की है। संयुक्त परिवार का सोच भी इसमें परिलक्षित होता है। उन्होंने अपने परिवार के लोगों को तो तैयार किया ही और उनको अपने पूरे गुण देने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा बीकानेर में सीए करने वाले युवा व युवतियों की पूरी टीम भी उन्होंने तैयार की है। उनके सीए के ऑफिस में भी एक बड़ी टीम है। सीए के संगठन को खड़ा किया ताकि इस फील्ड में नए आने वाले लोगों को भी पूरी गाइडेंस मिले। उनकी कठिनाइयों को दूर किया जा सके। उनकी समस्याओं के समाधान में मदद भी मिलती है। संगठन के सर्वोच्च पद पर रहकर उन्होंने अपने सेवा भाव व गुरु - शिष्य परम्परा के चलते अनेक नए लोगों का मार्गदर्शन किया है, उनका सहयोग किया और मदद की है। जिसके बारे में केवल वे शिष्य ही जानते है। इस भौतिकवादी युग में भी गुरु - शिष्य परंपरा को जीवित रखकर सुधीश ने भारतीय संस्कृति को जहां एक तरफ प्राण वायु दी है वहीं सांस्कृतिक मूल्यों को भी फिर से जिंदा करने का भागीरथी कार्य किया है। 

अर्थ जीवन की प्राथमिकता नहीं:

 

आमतौर पर यह धारणा बनी हुई है और जो काफी हद तक सच भी है कि एक सीए 24 घन्टे पैसे कमाने में ही जुटा रहता है। अपने दिन का हर मिनट वह काम में और उससे होने वाले आर्थिक लाभ में ही लगाता है। अपार धन कमाना ही सीए का ध्येय रहता है। मगर सुधीश इस धारण के विपरीत आचरण करते हैं। 
 

वे नियमित रूप से अपना यह काम तो करते ही है मगर अपने दिन का समय परिवार व समाज को भी देते हैं। इसके अलावा उनको शहर की हर साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में उपस्थित देखा जा सकता है। खासकर स्कूलों के सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजनों में चाव से पूरा समय देते हैं, केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं देते।

विद्वानों के उद्बोधन तन्मयता से सुनते हैं और बोलने का अवसर मिलता है तो बच्चों और युवाओं को मोटिवेट करते हैं। एक मायने में वे सच्चे मोटिवेटर भी है। कम शब्दों में अपने अनुभव की बातों से प्रेरित करते हैं, भाषण नहीं देते। जिस युवा की यह वृत्ति हो वो अर्थ के पीछे पागल नहीं होता, यह तो शाश्वत सत्य है।

समाज से भी गहरा जुड़ाव:

सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन कहते थे कि व्यक्ति समाज की एक इकाई होता है और वो जब तक समाज से जुड़ा रहता है तब तक ही उसका जीवन सार्थक होता है। इसको सरल शब्दों में कहा जाए तो यूँ कहना चाहिए कि व्यक्ति है तो उसे समाज से सरोकारित होना चाहिए। इस उसूल पर भी जीते हैं सुधीश शर्मा।

 

इसी बड़े ध्येय को फलीभूत करने के लिए इस युवा ने अपने को विप्र फाउंडेशन से जोड़ा। जिसका केनवास पूरा भारत व विदेश में रहने वाला विप्र समाज है। इस संगठन से जुड़ना कोई सामाजिक संकीर्णता नहीं है। क्योंकि इसके संस्थापक सुशील ओझा ने विप्र फाउंडेशन के जो आधारभूत सिद्धांत बनाये हैं, उसमें सामाजिक समरसता, सदभाव व समानता है। ये बड़े सिद्धांत कम ही सामाजिक संगठनों में देखने को मिलते हैं। इस संगठन के सुधीश शर्मा सक्रिय पदाधिकारी है। उसमें भी वो विंग संभाल रखी है जिसमें लोगों को आर्थिक विकास व उन्नति के लिए मार्गदर्शन करते हैं। प्लेटफॉर्म देते हैं। इस संगठन की तरफ से किये जाने वाले सामाजिक समरसता के भी सभी कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी रहती है।

कारवां बनता गया ....

 

सुधीश ऑडिट के लिए पूरे भारत में जाते हैं। उन्होंने चंडीगढ़, इंदौर, मुम्बई आदि साफ शहरों को देखा। जब वे अपने शहर बीकानेर को देखते तो झुंझला जाते। चारों तरफ गंदगी देखकर उनको भीतर ही भीतर बड़ा गुस्सा आता। खासकर बच्चों के खेल मैदान, ऐतिहासिक स्थल, पर्यटन स्थल, मंदिर परिसर, धार्मिक स्थल, पार्क, वे सरकारी दफ्तर जहां भारी भीड़ का आना जाना रहता, मुख्य मार्गों पर बने स्मारक, रेलवे स्टेशन आदि की गंदगी तो महीनों तक साफ नहीं होती।

इस युवा ने देखा कि न तो स्थानीय निकाय, न प्रशासन, न पर्यटन विभाग, न देवस्थान विभाग और न आम नागरिक, इस गंदगी को लेकर जरा भी चिंतित नहीं होते। उलटे गन्दगी बढ़ाते। कोई पहल करके सफाई का किसी से आग्रह भी नहीं करता। खुद के सफाई करने का तो सवाल ही नहीं। बाहर से आने वाले लोग शहर की गंदगी देखकर भद्दे कमेंट करते। पर्यटक नाक बंद करते। यह सब सुधीश को नागवार गुजरा। उन्होंने अपने चंद मित्रों को एकत्रित किया और उनके सामने हर रविवार को महत्त्वपूर्ण स्थलों पर जाकर सफाई करने का प्रस्ताव रखा।
 

कम ही सही, मगर उनकी भावना को समझ कुछ लोग सहमत हुए। ' ऑवर फ़ॉर नेशन ' नाम का संगठन बना उन्होनें सफाई करने का काम हर रविवार को आरम्भ किया। कहते हैं ना, मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल की ओर, लोग जुड़ते गए और कारवां बन गया, इस तर्ज पर इस पुनीत कार्य में उनके साथ लोग जुड़ते गए। एक बड़ी टीम बन गयी। जिसने महत्त्वपूर्ण स्थलों को साफ करना आरम्भ कर दिया। अब तो यह बीकानेर का एक बड़ा आंदोलन बन गया है। लोग पहल से इस टीम को बुलाते हैं, साथ जुटते है और सफाई करते हैं। इस बड़े काम में अब तो अधिकारी भी उनके साथ कई बार सफाई के लिए जुटते है। इस काम की गूंज पूरे प्रदेश तक हुई और देश भी इस संगठन की पहचान है। एक व्यक्ति का सपना अब साझा सपना बन गया, इसे इस युवा की बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए।

मदद देने में पीछे नहीं:

जटिल आर्थिक नियमों को लेकर जब कोई छोटा कर्मचारी, छोटा व्यापारी उलझता है तो उसे मदद के लिए सुधीश ही याद आते हैं। जीएसटी जब लागू हुआ तो यह पेचीदा आर्थिक नियम थे, लोग डर रहे थे और उलझ रहे थे। उस समय बड़े व्यवसायियों व कम्पनियों वालों ने तो इनको सीए रख मदद ले ली। मगर कोई छोटा दुकानदार, व्यापारी या कर्मचारी कहां जाता, उस समय इन लोगों की मदद सेवा के रूप में सुधीश शर्मा ने अपनी सीए की टीम के साथ की। 

मेरा कुछ नहीं, सबका है ये काम:

सार्वजनिक जीवन में अनेक मोर्चों पर काम करने के बाद भी वे ये मानते हैं कि कुछ नहीं किया। उनको जब इसके लिए बधाई दी जाती है तो वे कहते हैं, मेरा कुछ भी नहीं किया हुआ है। यह सब तो लोगों ने मिलकर किया है। जितना उनका काम, उतना ही मेरा काम। मेरी तो बस यही ईच्छा है कि हम अपने जीवन का समय घर, परिवार, समाज, व्यवसाय को तो देते ही है, उसमें से कुछ समय बचाकर देश को भी देना चाहिए। यदि हर व्यक्ति ये समय देने लगेगा तो हमारा देश भारत फिर से विश्व गुरु बन जायेगा।

 

( आप अपनी प्रतिक्रिया मोबाइल नम्बर 9672994671 पर भी दे सकते हैं। -- संपादक )

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