संविधान से अधिकारों के साथ कर्त्तव्यों का भी बोध हो, अलग अलग क्षेत्र की 4 प्रतिभाओं का सम्मान हुआ
RNE Bikaner.
संवैधानिक मूल्यों की प्रासंगिकता और समकालीन सामाजिक यथार्थ पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से सोशल प्रोग्रेसिव सोसायटी, बीकानेर के तत्वावधान में आयोजित “सम्मान कार्यक्रम एवं संवैधानिक मूल्य और सामाजिक यथार्थ विषयक संगोष्ठी” रविवार, 25 जनवरी 2026 को अस्मत अमीन हॉल, अमरसिंहपुरा, बीकानेर में संपन्न हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात विचारक , वरिष्ठ पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने की। मुख्य अतिथि के रूप में सुधीश शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में नितिन गोयल एवं पूनम चौधरी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के मंचासीन होने एवं माल्यार्पण से हुआ। संस्था परिचय एवं स्वागत उद्बोधन अरमान नदीम ने प्रस्तुत किया। उद्देशिका वाचन श्री अब्दुल रऊफ राठौड़ द्वारा किया गया, जिसमें संविधान को स्वतंत्र भारत की सामूहिक चेतना और सामाजिक न्याय का आधार बताया गया।

संगोष्ठी सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए इमरोज नदीम ने कहा कि गणतंत्र दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है—यह देखने का क्षण कि हम संविधान के अनुरूप जीवन जी रहे हैं या नहीं। उन्होंने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को समाज की जीवंत धुरी बताया।
मुख्य अतिथि सुधीश शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि संविधान केवल शासन-प्रणाली का ढांचा नहीं, बल्कि नागरिक चेतना का नैतिक अनुशासन है। उन्होंने कहा कि आज का सबसे बड़ा संकट संवैधानिक मूल्यों का विस्मरण नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहार में न उतार पाना है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नागरिक प्रश्न करना, असहमति रखना और संवाद करना सीखेंगे।
विशिष्ट अतिथि नितिन गोयल ने कहा कि सामाजिक यथार्थ और संवैधानिक आदर्शों के बीच की दूरी चिंता का विषय है। उन्होंने समान अवसर, सामाजिक न्याय और वैचारिक सहिष्णुता को लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त बताते हुए कहा कि संविधान की आत्मा तभी जीवित रहती है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचती है।

विशिष्ट अतिथि श्रीमती पूनम चौधरी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि संवैधानिक मूल्य केवल पुस्तकों या भाषणों तक सीमित न रहकर सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनने चाहिए। उन्होंने महिलाओं, वंचित वर्गों और हाशिये के समाज के संदर्भ में संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम के सांस्कृतिक सत्र में वरिष्ठ शायर गुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ की ग़ज़ल प्रस्तुति ने वातावरण को संवेदनशील और विचारशील बना दिया। इसके पश्चात आयोजित सम्मान समारोह में समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को शॉल, श्रीफल, अभिनंदन-पत्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में
नवल किशोर व्यास (रंगकर्मी एवं फिल्म पत्रकारिता),
सुनील गज्जाणी (साहित्यकार हिंदी-राजस्थानी),
सुमित शर्मा (पत्रकार),
संजय जनागल (साहित्यकार),

शामिल रहे।अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि संविधान केवल स्मरण की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-आचरण का मार्गदर्शक है। उन्होंने जागरूक नागरिक को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए साहित्य और संवाद की भूमिका को रेखांकित किया।

कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन संजय श्रीमाली ने किया। अंत में वरिष्ठ साहित्यकार रवि पुरोहित द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में नगर के साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जागरूक नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इनमें प्रमुख रूप से नूरुल हसन, रवि शुक्ला, आत्माराम भाटी, विजय कुमार शर्मा, योगेंद्र कुमार पुरोहित, प्यारेलाल सागवान, गुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’, बुनियाद हुसैन जहीन, मीतू ढल्ला, सादिक अली, रवि पुरोहित, अजय सहगल, मोहम्मद शरीफ गौरी, गोविंद राम गोदारा, डॉक्टर मोहम्मद फारूक चौहान, अब्दुल रऊफ राठौर, जीत सिंह, घनश्याम गहलोत, अनीसुद्दीन सिद्दीकी, अमित गोस्वामी, मनीष कुमार जोशी, दीपचंद सांखला, मनिंदर सिंह भूई, आदित्य शर्मा, अजय कुमार शर्मा, मकसूद हसन कादरी, मनीष कुमार गहलोत, जितेंद्र भाटी, दर्शन सिंह आदि की गरिमामय उपस्थिति रही ।

