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B.D. Kalla के जन्मदिन पर कांग्रेस नेता की पोस्ट में कल्ला परिवार के राजनीतिक उत्तराधिकार की कहानी!

कांग्रेस नेता, पूर्व संगठन महासचिव एवं प्रवक्ता रहे नितिन वत्सस की पोस्ट हो रही वायरल
 

Rudra News Express Bikaner. 

राजस्थान कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री डॉक्टर बी डी कल्ला का आज जन्मदिन है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक वे 77 वर्ष के हो चुके हैं। बीकानेर शहर से अब तक 06 बार विधायक और राजस्थान सरकार में कई विभागों के मंत्री रह चुके बी डी कल्ला  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं। मतलब यह कि राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में कल्ला एक बड़ा नाम है। 

जन्मदिन के मौके पर जहां कल्ला को प्रदेश-देशभर से बधाइयां मिल रही है वहीं एक ऐसी पोस्ट या टिप्पणी भी वायरल हो रही है जिसने कल्ला परिवार में राजनीतिक उत्तराधिकार की 46 साल पुरानी कहानी को आज के प्रसंग से जोड़ दिया है। हालांकि यह पोस्ट पूरी तरह बी डी कल्ला-जनार्दन कल्ला और उनके परिवार के राजनीतिक योगदान को लेकर की गई है। 

इसमें राजनीति में भाइयों के त्याग का उल्लेख है। इसी त्याग का प्रत्युत्तर 46 साल बाद मिलने का भी जिक्र है। इसके बावजूद इसमें उल्लेख किये गए तथ्य सही है तो यह राजनीतिक उत्तराधिकार के आदान-प्रदान की कहानी भी कहती है। बीकानेर नगर निगम में अनिल कल्ला के मेयर बनने को इसी कहानी से जोड़ा गया है। दरअसल यहाँ बात हो रही है कांग्रेस के संगठन महासचिव और प्रवक्ता रहने के साथ ही कल्ला के परिवार के नजदीकी समर्थकों में शामिल नितिन वत्सस की भावनात्मक टिप्पणी या पोस्ट की। 

क्या उस्मान आरिफ ने जनार्दन कल्ला को टिकट ऑफर किया : 
नितिन ने लिखा है वर्ष 1980 में जब बी डी कल्ला पहला चुनाव लड़े थे तब तत्कालीन दिग्गज नेता और केन्द्रीय मंत्री व राज्यपाल रहे मोहम्मद उस्मान आरिफ ने जनार्दन कल्ला को चुनाव लड़ने के लिये ऑफर किया था। जनार्दन कल्ला उस वक्त कांग्रेस की राजनीति में बी डी कल्ला से बड़ा नाम था। इसके बावजूद जनार्दन कल्ला ने खुद को पीछे करते हुए बी डी कल्ला का नाम आगे बढ़ाया। आरिफ सकुचाए तो चुनाव लड़वाकर जिताने का वादा किया। 

नितिन की बात का महत्व क्यों! 
नितिन वत्सस की बात में इसलिये बल हो सकता है क्योंकि वे कांग्रेस के संगठन महासचिव और प्रवक्ता रहने के साथ ही कल्ला परिवार के नजदीकी राजनीतिक समर्थकों में शामिल है। जनार्दन कल्ला को राजनीतिक गुरु मानने वाले नितिन कितने बड़े समर्थक है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि गोविंद डोटासरा बीकानेर आने के बावजूद जब कल्ला के घर शोक जताने नहीं गए तो नितिन ने सार्वजनिक तौर पर इस्तीफा दे दिया था। जिन उस्मान आरिफ का जिक्र किया है वे उस दौर में इंदिरा गांधी के नजदीकी लोगों में शामिल थे। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल भी रहे। उनके पोते जिया उर रहमान आरिफ प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं। 

... तो भाई के त्याग से शुरू हुआ बी डी कल्ला का सफर : 
ऐसे में कहा जा सकता है कि बड़े भाई के त्याग या छोटे में ज्यादा दूरी तक चल पाने की क्षमता देखते हुए लिये गए निर्णय पर बी डी कल्ला का चुनावी सफर शुरू हुआ। कल्ला के लिये पहला चुनाव कड़े मुकाबले वाला था। वे भाजपा के एडवोकेट ओम आचार्य से 1855 वोट से जीते। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1985 और 1990 के चुनाव जीतकर जीत की हैट्रिक बनाई।

नंदू महाराज ने रोका सफर, वापस हराया : 

वर्ष 1993 के चुनाव में भाजपा के नंदलाल व्यास "नंदू महाराज" ने पहली बार कल्ला का विजय रथ रोका। इस चुनाव में व्यास ने कल्ला को 15 हजार से अधिक वोटों से हराकर जाहिर किया कि वे अजेय नहीं है। इसके बावजूद कल्ला ने अगले दो चुनावों में लगातार नंदू महाराज को हराकर हार का बदल लिया। वर्ष 1998 के चुनाव में नंदलाल व्यास भाजपा के बागी थे इसके बावजूद रेस में रहे। कल्ला ने उन्हें 19675 वोटों के बड़े मार्जिन से हराया। इसके अगले चुनाव यानी 2003 में भी सामने नंदू महाराज थे। यह बड़ा कांटे का चुनाव था जिसमें बी डी कल्ला मात्र 1651 वोट से जीते। 

गोपाल जोशी से लगातार दो हार, फिर जीत : 

वर्ष 2008 में गोपाल जोशी भाजपा में शामिल होकर सामने आ गए। रिश्तेदारी के साथ ही कांग्रेस में पुरानी प्रतिद्वंद्विता रही थी। गोपाल जोशी हमेशा बीकानेर से कांग्रेस के टिकट के दावेदार होते लेकिन नहीं मिल। ऐसे में भाजपा थाम मैदान में आए और 2008 और 2013 के दो चुनावों में लगातार हरया। तीसरे चुनाव में फिर ये हो प्रतिद्वंद्वी मैदान में उतरे लेकिन इस बार कल्ला ने जोशी की हैट्रिक रोकी और 2018 में जीत दर्ज की। 

जेठानन्द व्यास से बदला ले पाएंगे?

वर्ष 2023 के चुनाव में भाजपा ने नए चेहरे जेठानन्द व्यास को मैदान में उतार। व्यास ने अपने पहले ही चुनाव में इस धुरंधर नेता को 20 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया। ऐसे में फिलहाल कल्ला पूर्व मंत्री और विधायक होने के बावजूद 77 वर्ष की उम्र में पूरी तरह सक्रिय राजनेता हैं। वे शांति धारीवाल के इस उम्र में चुनाव लड़ने का उदाहरण देते हुए खुद एक बार फिर चुनाव लड़ने की बात कहते हैं। मंशा साफ है अब तक जिसने भी हराया उन्हें वापस हरा चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जेठानन्द व्यास के सामने यह जलवा दोहराने का मौका मिल सकेगा?

अब बात फिर भाई के कर्ज या राजनीतिक उत्तराधिकार की : 
बी डी कल्ला इन दिनों एक बार फिर राजस्थान की राजनीति में चर्चित नाम है। चर्चा इसलिये है क्योंकि बीकानेर में कांग्रेस का मेयर बना है और चुनाव की बागडोर कल्ला के हाथ में थी। मेयर बनने से बड़ी बात यह है कि राजस्थान के 20 निगमों में अकेला बीकानेर ऐसा है जहां कांग्रेस ने मेयर के रूप में जीत दर्ज की है। कल्ला के भतीजे और वरिष्ठ नेता जनार्दन कल्ला के पुत्र अनिल कल्ला मेयर चुने गए हैं। 

अनिल कल्ला मेयर होना मतलब भाई को "रिटर्न गिफ्ट" : 

ऐसे में कहा जा सकता है अब तक का चुनावी सफर बड़े भाई के त्याग से जुड़ा है। अब 46 साल बाद तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भतीजे अनिल कल्ला को पार्षद का चुनाव लड़वाया। पूरे चुनाव की बागडोर हाथ में ली। जब समूचे राजस्थान में पार्टी मेयर चुनाव में हारी तब भी बीकानेर में बहुमत के साथ जीत दर्ज की। परिवरवाद के आरोपों के दरकिनार करते हुए भतीजे अनिल कल्ला को मेयर बनवाया। उस भाई को ले जाकर मेयर सौंप दिया जिसने कभी विधसभा का टिकट सौंपा और राजनीति में इस मुकाम पर पहुंचाया। लगभग 46 साल बाद एक "रिटर्न गिफ्ट" की तरह। अब अनिल कल्ला के लिये यह राजनीतिक पारी की शुरूआत है। आगे वे क्या कर पाते हैं, यह भविष्य के गर्भ में हैं। 

टिकट को लेकर दीपचन्द एक तथ्य यह भी : 
बी डी कल्ला के पहले चुनाव में मिले टिकट को लेकर शहर में यह बात प्रचलित है उन्हें पहला टिकट रामपुरिया कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य के प्रयास से मिला। बताया जाता है कि तत्कालीन प्राचार्य के इंदिरा गांधी परिवार में निकट संबंध थे। बी डी कल्ला उस वक्त रामपुरिया कॉलेज में प्रोफेसर थे। वरिष्ठ पत्रकार दीपचन्द संखला भी अपने लेख में इस बात का संकेत देते हैं। दीपचन्द सांखला की बात को इसलिये ज्यादा वजनी माना जा सकता है क्योंकि उस पहले चुनाव या टिकट के वक्त वे रामपुरिया कॉलेज में पढे थे और कल्ला के स्टूडेंट थे। इतना ही नहीं टिकट मिलने पर पहले शख्स थे जो उनके घर पहुंचे। स्कूटर पर साथ बि
ठाकर पोस्टर बनवाने के लिये इंडिया स्टूडियो ले गए जहां फोटो खिंचवाई। 

कुल मिलकर 77 की उम्र में राजनीतिक तौर पर सक्रिय बी डी कल्ला अब तक सफल राजनीतिक पारी खेले हैं। उनके दामन पर दाग नहीं है और अभी भी भविष्य की राजनीति के लिये तैयार हैं।

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