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लक्ष्मीनारायण रंगा की स्मृति को रख रहे अक्षुण, दिवंगत रंगा के नाम से तीन राज्य स्तरीय प्रज्ञा सम्मान तीसरे साल भी

नगर की प्रज्ञा ऊर्जा रही समारोह में उपस्थित
विमला डुकवाल, डॉ सत्यनारायण सोनी व विजय सिंह का सम्मान
 

RNE Special.

' कोई बेहतरीन इंसान अपने परिजनों को विरासत में क्या सौंपकर जाता है। जमीन, जायदाद, पैसा, वैभव आदि, मगर ये सब तो स्थायी नहीं है। आते - जाते रहते है।
स्थायी विरासत होती है सृजन, समाज और संस्कृति, यदि लेखक हो तो इसके साथ ' शब्द ' भी जुड़ जाता है। ये विरासत अक्षुण रहती है। स्व लक्ष्मीनारायण रंगा ने अपने पुत्रों कमल रंगा व राजेश रंगा को यही विरासत सौंपी। वे भी यही विरासत अपने पुत्रों पुनीत, अंकित, आशीष आदि को सौंपते जा रहे है। इनके संस्कार देते जा रहे है। '
यह कहानी थी कल के नरेन्द्रसिंह ऑडिटोरियम में आयोजित कमला देवी रंगा - लक्ष्मीनारायण रंगा ट्रस्ट व प्रज्ञालय संस्थान के आयोजन की। इस राज्य स्तरीय समारोह में दोनों संस्थाओं ने शिक्षा, साहित्य व रंगकर्म के क्षेत्र में तीन विभूतियों को प्रज्ञा सम्मान अर्पित किया। कीर्ति शेष कवि, कथाकार, नाटककार, शैक्षिक चिंतक लक्ष्मीनारायण रंगा का पूरा परिवार तो आयोजन में उपस्थित थे ही, साथ ही बीकानेर का प्रज्ञा परिवार भी बतौर दर्शक उपस्थित था।


शिक्षा प्रज्ञा सम्मान:

यह सम्मान बीकानेर की लाडली और कृषि विश्वविद्यालय, कोटा की कुलगुरु डॉ विमला डुकवाल को दिया गया। उनकी उपलब्धियों से पूरा राज्य परिचित है। अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में डुकवाल ने कहा कि मुझे प्रज्ञा शब्द की गहराई पता है, उस दिशा में चलूँगी। इस सम्मान से मेरा दायित्त्व बढ़ गया है।

उनके बारे में बोलते हुए मुख्य अतिथि राजुवास के कुलगुरु डॉ सुमंत व्यास ने कहा कि डॉ डुकवाल ने कृषि के क्षेत्र में अनेक नवाचार करती रही है। विशिष्ट अतिथि कवि, कथाकार मालचंद तिवारी ने डॉ डुकवाल के सामाजिक सरोकारों पर बोलते हुए कहा कि उनका समाज से जीवंत जुड़ाव रहा है। इस कारण वे एक सफल प्रशासक भी थी। अध्यक्षीय संबोधन में मधु आचार्य ' आशावादी ' ने कहा कि विमला जी छोटी बहन है और बेहद संवेदनशील है। अपने छात्रों व काम से बेहद लगाव है। गर्व है कि अहंकार रहित रहकर वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई है।

साहित्य प्रज्ञा सम्मान:

स्व लक्ष्मीनारायण रंगा स्मृति साहित्य सम्मान उन्हीं की परंपरा के परलीका के राजस्थानी रचनाकार, संपादक, भाषाविद, आलोचक डॉ सत्यनारायण सोनी को अर्पित किया गया। सोनी राजस्थानी भाषा की चलती फिरती स्कूल है। उन्होंने अनेक लेखक, शिक्षक तैयार किये। कथेसर पत्रिका के संपादक के रूप में लेखकों की नई पौध को खड़ा किया। उनका कथा साहित्य विरल है। अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में बोलते हुए डॉ सोनी ने कहा कि रंगा जी की स्मृति में सम्मान मिलना मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है। वो तोला थे, मैं तो मासा हूँ। उनके नाम के मिले इस सम्मान के बाद जिम्मेवारी बढ़ी है। उसे निभाने का पूरा प्रयास करूंगा।

मुख्य अतिथि डॉ सुमंत व्यास ने कहा कि डॉ सोनी का राजस्थानी साहित्य में एक प्रतिष्ठित नाम है। विशिष्ट अतिथि मालचंद तिवारी ने कहा कि डॉ सोनी ने राजस्थानी साहित्य व मान्यता आंदोलन के लिए बड़ा काम किया है। अध्यक्ष मधु आचार्य ' आशावादी ' ने कहा कि डॉ सोनी ने राजस्थानी भाषा और इसके साहित्य को बचाने का बड़ा काम किया है।

प्रज्ञा रंग सम्मान:

स्व लक्ष्मीनारायण रंगा स्मृति रंगकर्म प्रज्ञा सम्मान वरिष्ठ अभिनेता, निर्देशक, फिल्म कलाकार विजय सिंह राठौड़ को दिया गया। अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में राठौड़ ने कहा कि बहुत सम्मान मिले, मगर मेरे लिए इससे बड़ा सम्मान कोई नहीं। रंगा जी से मैने बहुत सीखा है। वे नाटक देखने के बाद मुझसे उस पर खुलकर बात करते।
मुख्य अतिथि सुमंत व्यास ने राठौड़ को प्रतिभावान रंगकर्मी बताया और उनकी उपलब्धियों को रेखांकित किया। विशिष्ठ अतिथि मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि राठौड़ एक विनम्र भाव के कलाकार है और रंगकर्म को पूरी तरह समर्पित है। अध्यक्ष मधु आचार्य ' आशावादी ' ने कहा कि विजय सिंह मुक्कमिल रंगकर्मी है। अभिनय, निर्देशन, मंच पार्श्व, हॉल प्रबंधन से लेकर कोई भी जिम्मेवारी दे दो, शिद्दत से पूरा करते है।


उद्बोधन सभी वक्ताओं के:

आरम्भ में स्व लक्ष्मीनारायण रंगा के व्यक्तित्त्व पर बोलते हुए बुलाकी शर्मा ने कहा कि वे सबके ' बाऊजी ' थे। उनके जीवन का मूल मंत्र यही था कि जब तक लिखूंगा, तब तक बचूंगा। इस बात को उन्होंने अपने विपुल लेखन से प्रमाणित भी किया। वे जिससे मिलते, उससे यही पूछते कि क्या लिख रहे हो।

 

आयोजन के बारे में विस्तार से बताते हुए स्व रंगा के सुपुत्र कमल रंगा ने कहा कि उन्होंने जीवन के 92 वर्षों में अपने अंतिम 12 दिनों में नहीं लिखा, शायद इसी कारण नहीं बचे। उन्होंने सम्मानित होने वाले प्रज्ञा पुरुषों के काम के बारे में पूरी जानकारी दी।
 

मुख्य अतिथि डॉ सुमंत व्यास ने कहा कि रंगा परिवार यूं तो फिजिकल साइड में सक्रिय था, मगर 90 फीसदी। 10 फीसदी लेखन, शिक्षा व वकालत में भी थे। स्व लक्ष्मीनारायण रंगा के व्यक्तित्त्व को विलक्षण बताते हुए उन्होने कहा कि वे साहित्य व शिक्षा को समर्पित थे।
 

अपने उद्बोधन में देश के प्रतिष्ठित कवि, कथाकार , आलोचक मालचंद तिवारी ने कहा कि मुझे उन्होंने हमेशा पुत्रवत प्रेम दिया। मेरे लिए तो वे सच्चे अर्थों में बाऊजी थे। वैसे तो वे पूरे साहित्य जगत के बाऊजी थे। मुझे जब भी संकट, परेशानी होती तो वे मार्गदर्शक, सहयोगी होते। तिवारी ने बताया कि साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली में कई विधाओं को पुरस्कार मिले, मगर डॉ अर्जुन देव चारण को धर्मजुद्ध पर पुरस्कार मिलने के बाद स्व लक्ष्मीनारायण रंगा को नाटक पूर्णमिदम पर मिला। 

अध्यक्षीय उद्बोधन में मधु आचार्य ' आशावादी ' ने कहा कि यूं ही कोई इंसान हर किसी का बाऊजी नहीं बन जाता। वो व्यक्तित्त्व चाहिए, जो स्व रंगा जी का था। उन्होंने कहा कि रंगा जी ने शब्द की जो विरासत कमल रंगा व राजेश रंगा को सौंपी, उसे सही से उन्होंने संभाला है और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित भी कर रहे है। सम्मानित होने वाले तीनों प्रज्ञा प्रतिभाओं को उन्होंने लक्ष्मीनारायण रंगा का सही कर्म का प्रतिनिधि बताया। 
 

आरम्भ में स्वागत भाषण राजेश रंगा ने दिया। संचालन ज्योति प्रकाश रंगा ने किया। सम्मान पत्रों का वाचन कासिम बीकानेरी, ज्योति रंगा व गौरीशंकर प्रजापत ने किया। धन्यवाद गिरिराज पारीक ने ज्ञापित किया।

इनकी रही उल्लेखनीय उपस्थिति:

कार्यक्रम में बसंती हर्ष, इंदिरा व्यास, चंचला पाठक, शिव बोधि, नामामीशंकर आचार्य, प्रमोद शर्मा, वली गौरी, जाकिर अदीब, अजय जोशी, राजाराम स्वर्णकार, राजेन्द्र जोशी, रवि पुरोहित, मुनीन्द्र अग्निहोत्री, जीतसिंह, रमेश शर्मा, रामसहाय हर्ष, सागर सिद्दकी, मुकेश व्यास, योगेंद्र पुरोहित आदि उपस्थित थे। दर्शकों से ऑडिटोरियम खचाखच भरा था।

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