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SIR पर Supreme कोर्ट का फैसला :  चुनाव आयोग को मतदाता सूची जांचने का अधिकार, SIR वैध और संवैधानिक

 

RNE New Delhi.

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को वैध और संवैधानिक करार देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा है। अदालत ने साफ कहा कि मतदाता सूची का अद्यतन (अपडेशन) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है, इसलिए केवल प्रक्रिया अलग होने के आधार पर इसे अवैध नहीं कहा जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने माना कि आयोग ने अपनी वैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कोई कार्य नहीं किया।


इन तीन अहम बिंदुओं पर विचार : 

1. क्या चुनाव आयोग के पास SIR जैसी कार्रवाई करने का अधिकार है?
2. क्या SIR का उद्देश्य वैध और सार्वजनिक हित में है?
3. क्या SIR की प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और उसके नियमों के अनुरूप है?

चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला : 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देता है। इसलिए यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि SIR केवल इसलिए अमान्य है क्योंकि इसकी प्रक्रिया सामान्य वोटर वेरिफिकेशन से अलग है। अदालत ने कहा कि SIR, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का विकल्प नहीं बल्कि उसी के दायरे में रहकर संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग है।

बिहार-बंगाल में हुआ था विवाद : 

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान शुरू हुई SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे। पश्चिम बंगाल में भी इसे लेकर राजनीतिक विवाद तेज हुआ था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया सामान्य मतदाता सत्यापन नियमों से अलग है और इससे मतदाताओं को परेशानी हो सकती है।हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को उचित ठहराते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और संवैधानिक उद्देश्य पर आधारित थी।

फैसले में अदालत ने कहा कि शुद्ध और अद्यतन मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करे ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकें।

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