Dhamendra Smriti : फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र का साहनेवाल नहीं बल्कि यह असल पैतृक गांव
धर्मेंद्र के पैतृक गांव में आज भी रहता है चाचा जगीर सिंह का परिवार
धर्मेंद्र पूरे देश के लिए सुपरस्टार थे, पर लुधियाना के लिए वह धरम 'भा'जी रहे। वो बेटा जो दुनिया जीतकर भी अपनी मिट्टी को कभी छोड़ न सका। सोमवार को 89 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद लुधियाना के छोटे से गांव डांगो और कस्बा साहनेवाल में भी लोगों की आंखें भीगी रहीं। ये दोनों गांव सिर्फ धर्मेंद्र की यादें नहीं, बल्कि उनका बचपन, रिश्ते और जड़ें खुद में समेटे हुए हैं।
गांव डांगो धर्मेंद्र का असली पैतृक गांव था। यहीं उनके पिता की जायदाद थी, यहीं उनका बड़ा संयुक्त परिवार रहता आया, और यहीं आज भी उनके चाचा जगीर सिंह का परिवार रहता है। घर आज भी पुरानी मिट्टी की खुशबू लिए खड़ा है। दीवारों पर वर्षों पुरानी तस्वीरों की छाप आज भी वहीं की वहीं है। स्कूल से कुछ ही कदम पर साधु राम की मिठाई की दुकान है।
यहीं की दूध की मिठाई और गाजर का हलवा धर्मेंद्र के बचपन का स्वाद था। सतीश बताते हैं। "धर्मेंद्र रात को बाहर रहते थे, तो कई बार साधू राम की दुकान पर ही सो जाते थे। जब कोई उनसे मिलने बंबई जाता था तो हमेशा साधु राम की मिठाई लेकर जाता वो उसकी खुशबू नहीं भूल पाए थे।"
मैं-धरम व उनकी बहन सुदर्शन एक साथ खेतों में खेलते थे। धरम जी की मुंह बोली बहन साहनेवाल की माया रानी, जिन्हें वह 'मुंह बोली बहन' कहते थे, उन्हें याद करके रो पड़ीं। बोलीं- "मैं, धर्मेंद्र और उसकी बहन सुदर्शन तीनों खेतों में इकट्ठा खेलते थे। धर्मेंद्र कहते थे तू मेरी असली बहन है।"
मुंबई से लौटे मित्र घनश्याम बोले, चला गया पंजाब का शेर
40 साल से धर्मेंद्र के दोस्त घनश्याम मुंबई से लौटकर रोते हुए बोले-पंजाबने अपना शेर हमेशा के लिए खो दिया। बीआरएस नगर निवासी घनश्याम की आखिरी बात रात 12 बजे उनके सेक्रेटरी जयराज से हुई। तबतक तक उम्मीद थी कि सब ठीक होगा। सुबह वह हमें छोड़ गए। हर बार जब वह लुधियाना आते, सीधे उनके घर आते, उनके कमरे में, उनके बिस्तर पर ही सोते। इतना अपनापन शायद ही उन्हें कहीं मिलता हो।
छोटा पड़ा पांडे ऑडिटोरियम, दिया नूर-ए साहिर सम्मान
7 मार्च 2020 को धर्मेंद्र को देखने की इतनी भारी भीड़ उमड़ी कि पांडे ऑडिटोरियम में कदम रखना मुश्किल हो गया। लोग दूर-दूर से सिर्फ उनकी एक झलक पाने पहुंचे। धर्मेंद्र ने भी मंच पर बचपन की लुधियाना से जुड़ी यादें बताई। कैसे ललतो से शहर आए, बदोवाल, तांगा, अंबे वाला बाग, जगराओं पुल और फिर घंटाघर पर खाए परांठे। लुधियाना ने उन्हें नूर-ए साहिर सम्मान से नवाजा।

