36 दिन बाद सरकार से ' 36 ' का आंकड़ा खत्म हुआ है, गृह मंत्री, संघ और भाजपा की रिपोर्टों ने बढ़ाई थी चिंता
RNE Special.
कॉकरोच जनता पार्टी बनाकर छात्रों ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर अपना आंदोलन आरम्भ किया था। छात्रों की पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी। आंदोलन अलग अलग चरण तय करने के बाद दिल्ली के जंतर मंतर तक पहुंचा और यहां धरना आरम्भ हो गया।
छात्रों के आंदोलन को शिक्षाविद, पर्यावरणविद सोनम वांगचुक का समर्थन मिला। वांगचुक छात्रों की मांगों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठ गए। उस स्थिति तक भी आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। कयास ये लगाया जा रहा था कि थोड़े दिनों में छात्र थक जायेंगे। यहीं पर सरकार से पहली चूक हुई।

चूक होनी शुरू हो गयी:
सरकार व सत्ताधारी दल से दूसरी चूक उनके बयानों से हुई। भाजपा नेताओं ने वांगचुक व छात्रों पर अनर्गल आरोपों की झड़ी लगा दी। भाजपा के केयी नेताओं ने तो पार्टी लाइन की परवाह किये बिना छात्रों को एक तरह से असामाजिक तत्त्व व वांगचुक को विदेशी एजेंट तक कहना आरम्भ कर दिया। उससे बात बिगड़ती गयी। सरकार ने पुलिस तैनात कर दी जंतर मंतर पर। सोचा छात्र डरेंगे। छात्र व पुलिस आमने - सामने होने शुरू हो गये।
सरकार ने तीसरी चूक संवाद को लेकर की। छात्रों के बढ़ते आंदोलन के बावजूद पुलिस से उसे दबाने की कोशिश हुई और सरकार ने बातचीत की पहल तक नहीं की। यह बहुत बड़ी चूक थी। छात्रों का समर्थन बढ़ता गया।

सभी विपक्षी दल छात्रों के समर्थन में उतर आए। जबकि भाजपा के कुछ नेता इसे आम आदमी पार्टी की टीम बताने में लगे थे। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मैदान में उतर के आंदोलन को गर्मा दिया। सदन को ठप किया तब तक भी सरकार नहीं चेती। चूक करती गयी। देश के किसान, बॉलीवुड एक्टर, सेलिब्रिटी आदि भी समर्थन में आये और आंदोलन पूरे देश मे फैल गया। मामला कोर्ट तक पहुंच गया।
अब सरकार थोड़ी चिंतित हुई। मगर फिर भी बात करने के स्थान पर सरकार ने वांगचुक को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया। इस स्टेप से छात्र देशभर में भड़क गए। अपने अपने राज्यों से दिल्ली पहुंचने लगे।
संसद मार्च के दिन बदला सोच:
छात्रों ने संसद के मानसून सत्र के पहले दिन 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा की। उसके लिए पूरे देश से छात्र जंतर मंतर पहुंचे। पुलिस, अर्द्ध सैनिक बल व छात्र आमने सामने हुए। छात्र चोटिल हुए, पुलिसकर्मी भी घायल हुए और एक अजीब सी स्थिति बन गयी। छात्रों के समर्थन का दायरा बढ़ गया।

सरकार की चिंता तब बढ़ी जब छात्र पुलिस के लाख रोड़ों के बाद भी संसद के निकट पहुंच गए। सरकार की तब चिंता बढ़ी। वहीं राहुल गांधी भी अपने सांसदों को लेकर पीएम आवास तक प्रदर्शन के लिए पहुंच गए। सरकार को अहसास हो गया कि छात्रों के आंदोलन को हल्के में लेना सही नहीं था।
फिर सरकार तेजी से सक्रिय हुई:
अब सरकार को तेजी से सक्रिय होना पड़ा। मंत्री जे पी नड्डा व जितेंद्र सिंह के पास जिम्मा आया। वांगचुक से बात हुई। छात्रों से वार्ता हुई, उनकी मांगें जानी गयी। इधर छात्र व विपक्षी दल उग्र हो रहे थे। सरकार ने पूरा जोर आंदोलन को खत्म कराने के लिए लगा दिया। पीएम मोदी ने भी अपील के वीडियो जारी किए।
4 दिन पहले से हुई सक्रियता:
आंदोलन समाप्ति के 4 दिन पहले तक केंद्र सरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी बचाने के लिए पूरी तरह जुटी थी। लेकिन इस्तीफे के 24 घन्टे पहले आईबी, गृह मंत्री अमित शाह और संघ - भाजपा की अलग - अलग रिपोर्टों ने नीट पेपर लीक आंदोलन को लेकर सरकार की चिंता बढा दी थी।
तीनों रिपोर्टों में साफ कहा गया था कि हालात संभालने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमो का आंदोलन पर खास असर नहीं पड़ रहा है। इनमें सबसे अहम आईबी की रिपोर्ट थी। जिसमें अंदेशा जताया गया कि यदि अगले 48 घन्टे के भीतर कोई समाधान नहीं निकाला गया तो आंदोलन सरकार के हाथ से निकल सकता है। इसी दौरान गृह मंत्री अमित शाह की रिपोर्ट में चेतावनी दी गयी थी कि यदि समाधान नहीं निकला तो विपक्षी एकता फिर से मजबूत हो सकती है।
36 दिन बाद 36 का आंकड़ा समाप्त:
इस तरह चली प्रक्रिया के बाद आंदोलन अंतिम मकाम तक पहुंचा। 36 दिन बाद छात्रों का सरकार से 36 का आंकड़ा समाप्त हुआ। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ और छात्रों ने जश्न मनाया। घर लौटना आरम्भ किया।

