अमित गोस्वामी की इस पुस्तक में उर्दू शायरी के कई रंग, देश भर में पुस्तक की चर्चा
रवि शुक्ल

RNE Special.
( शायर, रंगकर्मी रवि शुक्ल ने यह समीक्षा सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर लिखी है। अपने पाठकों के लिए आरएनई वहां से साभार इसका उपयोग कर रहा है। )
पिछले दिनों अज़ीज़म अमित गोस्वामी का एक शेरी मजमुआ मंज़र ए आम पर आया था उस पर अपने ख़याल का इजहार मैंने किया है, थोड़ी देर तो हुई है मगर आज वो आप सब की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ। पढ़ने के लायक है उनकी ये किताब आप इस मजमूआ को और भाई अमित को अपनी दुआओं से नवाज़े।
तस्वीर एक बच्ची ने धरम सज्जन ट्रस्ट के भवन में मित्र गोपाल के प्रोग्राम में ली थी उसे भी शुभाशीष।
अहसास ओ अफ़कार की इशाअत ......... “तुम्हारे बारे में कह रहा था ”
तुम्हारे बारे में कह रहा था ....इस उनवान से राजपाल एंड संज की जानिब से शाया इस किताब के हर वरक़ में मिसरों के दरमियान गोशानशीन उर्दू ज़बान से बेपनाह अक़ीदत और मुहब्बत करने वाला वो संजीदा शायर पोशीदा है जिसकी शिनाख़्त दुनिया-ए-अदब में अमित गोस्वामी के नाम से की जाती है।
मौसीक़ी की दुनिया में अपना जलवा पेश करने के बाद जनाब अमित गोस्वामी ने जिस भी वजह से अपने अहसास को शाइरी में ज़ाहिर करने का मंसूबा बनाया हो, वो अलग है मगर अच्छी शाइरी के चाहने वालों के लिये बहुत ही नेक काम किया है। आप शुरुआती दौर से ही अदबी शौक़ और ज़ौक रखते आए हैं और उस मुतालअ का ही नतीजा है कि आपका शाइरी की दुनिया में नक़्श-ए-अव्वल कमाल की सूरत और सीरत लेकर मंज़र-ए-आम पर आया था उसे अहले अदब ने अपनी दादो तहसीन से नवाज़ा था, और उसके साथ ही नक्शे सानी की भी तस्दीक हो गई थी कि जब भी इनका दूसरा शेरी मज्मूआ आयेगा उसमें भी आपकी शाइरी का वही मख़सूस रंग रंगे तलफ़्फ़ुज और अंदाजे बयां कारीं के सामने आयेगा । जब इस किताब जिसका उनवान तुम्हारे बारे में कह रहा था तरतीब हो रही थी तभी से मैं इसके साथ ज़ड़ा हूँ क्योंकि एक ही दफ़्तर में साथ काम करते हुए रोज़ाना ही मुलाक़ात होती रहती थी और उन मुलाकातों में ज़िक्र शाइरी का ही होता था चाहे वो हम दोनों की हो या दीगर शुअरा की बहरहाल जब ये किताब अपनी मुकम्मल शक्ल में आई तो इस की वरक गर्दानी करते हुए एक शाइर के जिन अहसास से मैं रू ब रू हुआ उनकी बात मैं आप से साझा कर रहा हूँ ।

शाइर ने दस्त कशी में लिखा हैः−
एक ख़ाम ख़याली थी कि तुम्हें भूल चुका हूँ और इसीउनवान से तकरीबन चार बरस पहले एक शेरी मज्मूआ मंजरे आम पर आया था मगर शाइर गायबाना उस जिसकी ला तादाद तस्वीर अशआर पढ़ने में ज़ह्न में उभरती है को भूलने मे नाकामयाब रहा है क्योंकि वो जो कुछ भी कह रहा है उसीके बारे में अब भी कह रहा है तो भूलने की बात बेमानी है तो दूसरे शेरी मज्मूए का उनवान शाइर पर सादिक आता है
नफ़ीस लहजे में नर्म अल्फ़ाज़ में इशारे में कह रहा था
मैं एहतियातन छुपा के सबसे बस इस्तिआरे में कह रहा था
तुम्हारी रुसवाइयों से डरता हूँ वरना ऐलान ए आम कर दूँ
मैं जो भी ग़ज़लों में कह रहा था तुम्हारे बारे में कह रहा था
शुरुआती सफ़हात से ही शाइर की पुरख़ुलूस हस्सास तबीयत और ज़िम्मेदारी का पता चलता है, कि वह अपने कलाम को लेकर संजीदा हैं। मज्मूए का उनवान महबूब के बारे में कहने की बात करता है और उन ख़यालात को अहसासात को अल्फ़ाज़ की शक्ल में ढाल कर कामयाब ग़ज़लें कहकर अदबी तारीख़ में अपनी जगह बना लेता है। मुझे यक़ीन है इस मज्मूए कि वरक़ गर्दानी करते हुए आप भी इस बात से मुतअस्सिर होंगे कि सरोद पर मौसिक़ी का जादू बिखेरने वाली उंगलियाँ जब क़लम थाम कर ग़ज़ल या नज़्म लिखती हैं तो उनके अल्फ़ाज़ का जादू भी कुछ कम नहीं होता।
अमित और मैं एक ही शह्र के हैं, एक की दफ़्तर में साथ काम करते थे तो अदब के मुतअल्लिक तवील गुफ़्तगू होती रहती है। इसलिए इनमें से बहुत सी ग़ज़लों के और उनके एक-एक शेर के होने का मैं गवाह रहा हूँ। जितनी नज़ाकत इन ग़ज़लों में अपने महबूब के लिए ख़यालों को बयाँ करने में पिन्हां है उस से कहीं ज़ियाद: संगदिली एक−एक शेर और एक−एक ग़ज़ल के इंतख़ाब में शाइर ने दिखाई है। बेहद सख़्ती से काम लेते हुए शेर और कहीं−कहीं तो पूरी ग़ज़ल ही ख़ारिज़ कर दी गई है, तब कही जाकर चार साल के वक्फ़े के बाद ये शेरी मज्मूआ मंज़र-ए-आम पर आया है।
जैसा कि मैनें पहले कहा था कि इंतिख़ाब में शाइर बहुत सख़्त है उसी मुश्किल ने मजमूए को तीन हिस्सों में बाँट दिया है। ग़ज़लें, नज़्म और क़तआत हैं। मैं ज़ाती तौर पर ग़ज़लों से दीवानगी की हद तक मुहब्बत करता हूँ, इसलिए मुझे ग़ज़लें ही ज़ियादः पसंद आती हैं। मगर ईमानदारी से कहूँ, तो अमित को मैं नज़्मों का शाइर मानता हूँ। ग़ज़लों से ज़ियादः ख़ूबसूरत वो नज़्म कहते हैं, और इस किताब में भी उन्होंने नज़्मों के साथ पूरा इंसाफ़ किया है। अमित के कलाम में सब जगह एक ज़ाहिराना अंदाज पोशीदा है, जो महबूब को और महबूब के बारे में सब कुछ बता देना चाहता है, मगर इशारों में। शाइरी इशारों का ही सिन्फ़ है, तो उनकी ये कोशिश कामयाब भी हुई है। तमाम नज़्में न केवल अपने मौज़ू को लेकर शानदार हुई हैं, बल्कि फ़न्नी एतबार से भी कोई कमी नज़र नहीं आती है। आप इस किताब में मुरत्तब की गई ब्लैक शर्ट, रस्मे इजरा, कुन फ़यकुन का मुतालअ कर सकते हैं ।
इस किताब के इंतिसाब अल्फ़ाज़ से ही एक रास्ता खुल जाता है, कि हम इस मज्मूए को पढ़ते हुए शाइर के साथ किस सफ़र पर गामज़न होंगे। आप जब अमित गोस्वामी की शाइरी से इस मज्मूए के मार्फ़त वाबस्ता होंगे तो आप महसूस करेंगे कि शाइर ने मुहब्बत की तर्जुमानी के लिए न सिर्फ़ बहुत ही नज़ाकत से अल्फ़ाज़ का इंतिख़ाब किया है बल्कि रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल को ख़ूबसूरती से निभाया भी है। यह एहसास मुसलसल आपके ज़ह्न-ओ-दिल को अपनी आगोश में लिये रहते हैं और शाइर की क़ुव्वत−ए−गोयाई की तस्दीक़ करते हैं। मिसाल के तौर पर चंद अशआर मुलाहिज़ा फरमाएँ
इक उधर तर्ज़े तग़ाफ़ुल और इधर अर्ज़े तलब
वो उधर इज़हार इधर इन्कार उधर था मैं इधर
ब ईं तजाहुल ए पैहम ब सद तग़ाफ़ुल ए अर्ज़
मुझे यक़ीं है कि वो बेवफ़ा नहीं हुए हैं
ख़ाक पहुँचेगा मुसव्विर का तसव्वुर आप तक
हैं परे शाइर की ख़्वाब आराई से, पैकर से आप
मैंने भी मैं ठीक हूँ कह कर निगाहें फेर लीं
उसने भी इस झूठ पररस्मन भरोसा कर लिया
ख़ुश्बू नफ़स में घुल के रगों में उतर गई
चेहरा किसी तिलिस्म सा आँखों में रह गया
लहजे की नज़ाकत और तस्वीरी सिफ़त वाले अशआर बहुत ही ख़ूबसूरती से बयाँ हुए हैं। इनकी मंज़रकशी शाइरी के मक़सद को पूरा करती है और शेर-ओ-सुख़न के चाहने वालों के सामने शायरी के पैकार से नजर आते हैं। चंद अशआर देखिये
ज़ाहिरन तस्वीर में लब पर तबस्सुम है मगर
ए मुसव्विर तुझको क्या मालूम अंदर का मलाल
तू नहीं है तो कोई रब्त नहीं दुनिया से
शाम तक सुब्ह के अख़बार पड़े रहते हैं
अमित गोस्वामी की शाइरी में जो एक ख़ास बात आप को देखने को मिलेगी वह है फ़न्नी ख़ुबसूरती। ग़ज़ल में कहीं भी भर्ती के अल्फ़ाज़ या शेर नज़र नहीं आते हैं इसीलिये शायद कुछ अशआर जो ग़जल होने से रह गये, क़तआत की शक्ल में इस किताब में शुमार किये गये हैं। एक-एक लफ़्ज़ बड़ी किफ़ायत से और सलीक़े से क़तआत में आपने इस्तेमाल किया है। इस लिहाज से आप एक कामयाब शाइर है और आपकी शाइरी में एहसास-ओ-अफ़्कार की तर्जुमानी बड़ी ख़ुबसूरती के साथ हुई है,
उसके भेजे हुए इन आरिज़ी गुलदानों में
गुल तो हैं उनमें मगर ख़ुश्बू नहीं आती है
मेरा महबूब वैसे तो मुकम्मल है मगर
इक कमी है कि उसे उर्दू नहीं आती है
अमित का कलाम पढ़ते हुए हम अपने आप से क़रीबतर होते जाते हैं, और हम अपने महबूब से गुफ़्तगू करते हुए से लगते हैं, और लगता है कि यह तो हमारी ही बात की जा रही है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि आम इंसान ख़याल तक महदूद रह जाता है और शाइर शेर की शक्ल में काग़ज़ पर उतार देता है। जनाब अमित गोस्वामी ने यही काम ईमानदारी के किया है
यूँ लगा चलते रहेंगे उम्र भर यूँ ही मगर
वो तो मुझे मोड़ तक ही छोड़ने आया था बस
तेरी फ़ुर्कत में ज़ौके शाइरी ही इक सहारा था
वगरना घर के पीछे रेल की पटरी गुज़रती है
उसकी आँखें कभी मैं पढ़ता था
अब वो मेरी किताब पढ़ती है
बहुत ही कम वक़्त में आपने शाइरी में आला मुकाम हासिल किया है। आप तख़्लीकी एतबार से रवाँ दवाँ और सरगर्म हैं, इसलिये इख़्तिसार से काम लेते हुए उन्हीं का दो शेर मिसाल के तौर पर आप के हवाले कर रहा हूँ
अश्क आँखों से गुरेजां हुए होंठो से हँसी
कैसी हैरानी है चेहरों पे ये सब के अबके
इसमें हम दोनों की आँखों में है क़ुर्बत की चमक
ये यक़ीनन कोई तस्वीर पुरानी होगी
उर्दू अदब में इस शेरी मज्मूए के साथ जनाब अमित गोस्वामी ने जो क़दम बढ़ाया है वह यक़ीनी तौर पर उनके अदबी ज़ौक के बरअक्स उनके मुस्तक़बिल के लिये मुत्मईन करती है। इस की किताबत, वरक़, लिखावट भी बहुत खूब है, छपाई पुरअसर और दीदाज़ेब है। राज पाल एंड संज मुल्क का एक मेआरी प्रकाशन समूह है जिसने अपनी साख के मुताबिक ही किताब को हर ज़विये से बेहतर बनाया है ।
अदब की पज़ीराई में इस शेरी मज्मूए के हवाले से मैं जनाब अमित गोस्वामी को तह-ए-दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ। अल्लाह उन के हौसले को दोबाला करे। मैं दुआगो हूँ कि आने वाले वक़्त में उनके ज़रीए ऐसे और बेशक़ीमती कलाम क़ारईन तक पहुँचे और मुसलसल पहुँचे ।इल्म−ओ−अदब में आप का मर्तबा और वसीअ हो शाइर एक शेर के साथ आपकी ज़हमतों को तमाम कर रहा हूँ कि
अश्क आँखों से दिल ए ज़ार से आहें निकली
तब कहीं जा के ये अशआर ये ग़ज़लें निकली।

