Movie prime

ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ : विरासत और अदबी सलीके के शायर 

 

इमरोज़ नदीम 

RNE Special.

( हमने साहित्य का ये नया कॉलम ' उर्दू अदब की बातें ' शुरु किया हुआ है। इस कॉलम को लिख रहे है युवा रचनाकार इमरोज नदीम। इस कॉलम में हम उर्दू अदब के अनछुए पहलुओं को पाठकों के सामने लाने की कोशिश करेंगे। ये कॉलम केवल उर्दू ही नहीं अपितु पूरी अदबी दुनिया के लिए नया और जानकारी परक होगा। इस साप्ताहिक कॉलम पर अपनी राय रुद्रा न्यूज एक्सप्रेस ( RNE ) को जरूर दें। अपनी राय व्हाट्सएप मैसेज कर 9672869385 पर दे सकते है। -- संपादक )

उर्दू अदब की तारीख़ उन नामों से मुकम्मल नहीं होती जो अपने दौर में शोहरत के मीनार बन गए, बल्कि उन सादगी-पसंद, ख़ामोश और ज़िम्मेदार क़लमकारों से बनती है, जिन्होंने बिना किसी इश्तिहार, बिना किसी तहरीकी नारे और बिना किसी अदबी सियासत के, अपने ज़मीर की रोशनी में लिखना जारी रखा। ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ उसी सिलसिले की एक ऐसी कड़ी हैं, जो न सिर्फ़ अपने काम से, बल्कि अपनी विरासत, तहज़ीब और अदबी सलीक़े से उर्दू की  नुमाइंदगी करते है।

‘माहिर’ साहब का नाम किसी अदबी गुट, किसी मंचीय शोर या किसी नारेबाज़ तहरीक से वाबस्ता नहीं रहा। उनकी पहचान  अख़बारी सुर्ख़ियाँ बल्कि उनकी असली पहचान उनकी तहरीर है संजीदा, सधी हुई । इनके यहाँ अदब तफ़रीह नहीं, ज़िम्मेदारी है, शौक़ नहीं, अमानत है; और ज़बान महज़ इज़हार नहीं, बल्कि तहज़ीबी विरसा है।
 

माहिर साहब की शख़्सियत को समझने के लिए उनकी नस्ल-दर-नस्ल चलती हुई अदबी रिवायत को समझना ज़रूरी है। वे  अचानक उभरे हुए शायर नहीं, बल्कि एक विरासतदार सिलसिले की आख़िरी मज़बूत आवाज़ हैं। उनके दादा मरहूम मोहम्मद अब्दुल्ला ‘बेदिल’, रियासत काल में सेशन जज रहे । एक ऐसी शख़्सियत जिनमें क़ानून की सख़्ती और अदब की नर्मी एक साथ मौजूद थी। ‘बेदिल’ बीकानेरी न सिर्फ़ अपने दौर के नामवर शायरों में शुमार किए जाते थे, बल्कि उनका कलाम उर्दू ग़ज़ल की उस रवायत का हिस्सा है, जिसमें फ़िक्र, एहसास और ज़बान एक-दूसरे से जुदा नहीं होते।
 

इस विरासत को आगे बढ़ाने वाले माहिर साहब के वालिद, मरहूम मोहम्मद अयूब ‘सालिक’ साहब एक बहु-आयामी इल्मी और तहज़ीबी शख़्सियत थे । उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी पर यकसाँ दस्तरस रखने वाले ऐसे इंसान, जिनके यहाँ शायरी सिर्फ़ कहने की चीज़ नहीं थी, बल्कि जीने की तहज़ीब थी। यही वजह है कि माहिर साहब को शायरी विरासत में सिर्फ़ लफ़्ज़ों की शक्ल में नहीं मिली, बल्कि एक अदबी अख़लाक़, एक तहज़ीबी ज़िम्मेदारी और एक ख़ामोश संजीदगी के साथ मिली।
 

माहिर साहब का कलाम पढ़ते हुए सबसे पहला एहसास जो क़ारी को घेर लेता है, वह है ठहराव। उनके लफ़्ज़ जल्दबाज़ नहीं, उनके ख़याल उतावले नहीं। यह वह कलाम है जो पढ़ने वाले से तवक़्क़ो करता है कि वह भी ठहर कर पढ़े, सोचे और महसूस करे। इनके यहाँ न ज़रूरत से ज़्यादा अलंकार हैं, न बयान की बनावटी चमक बल्कि एक ऐसी तहज़ीब है जो बोलने से पहले सोचती है और लिखने से पहले तौलती है।
उनका अदबी सरोकार किसी एक मुद्दे तक महदूद नहीं रहा। समाजी नाइंसाफ़ी, अख़लाक़ी ज़वाल, इंसानी रिश्तों की टूटन, और ज़बान की गिरती हुई क़द्र ये तमाम सवाल उनके कलाम में बग़ैर शोर-शराबे के मौजूद हैं। माहिर साहब का कमाल यह है कि वे सवाल उठाते हैं, फ़ैसले नहीं सुनाते। उनकी तहरीर क़ारी को जज नहीं बनाती, बल्कि इंसान बनाए रखती है। शायद यही वजह है कि इनका लेखन झिंझोड़ता ज़रूर है ।

 

शायरी में भी माहिर साहब उसी संजीदगी और सलीक़े के पाबंद नज़र आते हैं। उनके अशआर में न तो सस्ती शोहरत की दौड़ है और न ही बेवजह की इशारियत। वे कम कहते हैं, मगर पूरा कहते हैं। उनकी ग़ज़लें पहली पढ़त में सादा मालूम होती हैं, मगर दूसरी और तीसरी पढ़त में अपने अंदर छुपे हुए तजुर्बे, दर्द और तहज़ीबी फ़िक़्र को खोलती चली जाती हैं। यह उस शायर की पहचान है जो लफ़्ज़ों से नहीं, ज़िंदगी से बात करता है।
 

अख़िल भारतीय मुशायरों में इनकी शिरकत रही है, उनकी चार किताबें अब तक शाया हो चुकी हैं और आने वाले वक़्त में उनकी ग़ज़लों की और भी जिल्दें  आने की उम्मीद है। मगर इसके बावजूद माहिर साहब ने कभी अपने काम को बाज़ारू शोहरत की भेंट नहीं चढ़ाया। वे आज भी उसी सादगी से लिखते हैं, उसी वक़ार से कहते हैं और उसी तहज़ीबी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, जो उन्हें अपने बड़ों से विरासत में मिली।
आज के दौर में, जब उर्दू को या तो सिर्फ़ मुशायरों की तालियों में समेट दिया गया है या मज़हबी पहचान की तंग गलियों में क़ैद कर दिया गया है, माहिर साहब का कलाम याद दिलाता है कि उर्दू एक मुकम्मल तहज़ीबी ज़बान है जिसमें सोच भी है, दर्द भी, बसीरत भी और इंसानी वक़ार भी।

 

अफ़सोस यही है कि ऐसे अदीब अक्सर हाशिये पर रह जाते हैं। न उनके नाम पर बड़े इजलास होते हैं, न शोध के ढेर। मगर वक़्त का इंसाफ़ बड़ा गहरा होता है शोर मचाने वाले अक्सर थक जाते हैं, और ख़ामोशी से काम करने वाले देर तक सुने जाते हैं।
 

ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ कोई इश्तिहारी नाम नहीं, बल्कि वह तहज़ीबी आवाज़ हैं जो लोगों के शोर के बाद भी ज़हन में गूंजती रहती है

शख़्सियत, तालीम और अदबी सफ़र:

12 सितम्बर 1960 को बीकानेर में जन्मे ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ ने एम.ए., बी.एड. और अदीब ,कामिल जैसी तालीमी मंज़िलें तय कीं। 1980 से निरंतर शायरी में सक्रिय रहते हुए उन्होंने उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं पर समान पकड़ बनाई।
 

इनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से हुआ। ‘अजीत समाचार’, ‘अक्षर ख़बर’, ‘दैनिक युगपक्ष’ सहित अनेक पत्र–पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं। अखिल भारतीय मुशायरों में उनकी शिरकत रही।
 

सम्मानों की नज़र से भी उनका अदबी सफ़र गरिमापूर्ण रहा। यू.आई.टी., बीकानेर द्वारा पेश किया गया अन्य भाषा (उर्दू) पुरस्कार (2009), नगर निगम बीकानेर द्वारा दो बार सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’ (2023) और राजस्थान उर्दू अकादमी का ‘मोहम्मद अय्यूब फ़िज़ा अवार्ड’ ये सभी इस बात की तसदीक़ करते हैं कि माहिर साहब की तहरीरें सिर्फ़ अदबी ही नहीं, इदारों से भी हासिले सनद हैं।
 

इनकी प्रकाशित पुस्तकों में “ताबीरे ख़्वाब”, “आतशे कल्बो जिगर” , "लम्स" और “सातवें आसमान का मंज़र” शामिल हैं। उस्ताद-ए-उर्दू की हैसियत से इनकी ज़िंदगी नज़्म-ओ-ज़ब्त, एतिदाल और समाजी ज़िम्मेदारी से वाबस्ता रही है, और यही उसूल और रिवायतें इनकी शायरी में भी वाज़ेह तौर पर नुमायाँ होती हैं।

माहिर साहब की शायरी का मूल स्वर शिकायत नहीं, बदलाव है। उनके यहाँ दर्द रोने के लिए नहीं, ज़िंदगी को ठीक करने के लिए है।

हर दबी आह को अब दिल से निकलना होगा
ज़ीस्त के तौर-तरीकों को बदलना होगा ।

यहाँ “दबी आह” किसी फ़र्द की ज़ाती पीड़ा नहीं, बल्कि वह इज्तिमाई ख़ामोशी है जिसे समाज ने अपनी आदत बना लिया है। शायर वाज़ेह तौर पर कहता है कि अगर हालात को बदलना है, तो सबसे पहले सोच और रवैये को बदलना होगा।

याद रखना जो मेरे साथ रहोगे तो तुम्हें
दहकती आग के शोलों पे भी चलना होगा

सच और साथ यहाँ सहूलियत नहीं, इम्तिहान बन जाते हैं। माहिर साहब के यहाँ रास्ते की सख़्ती से बचने की कोई छूट नहीं।

फिर तअस्सुब की हवाएँ न कहीं डस जाएँ
जैसे भी हो हमें माहौल बदलना होगा

यह शेर तअस्सुब को किसी फ़र्द का ख़्याल नहीं, बल्कि एक ऐसी हवा क़रार देता है जो पूरे माहौल को ज़हरीला बना देती है। इसका हल भी फ़र्दी नहीं, बल्कि इज्तिमाई है।

जो अँधेरे ही मिटाने हैं हमें बस्ती के
फिर तो मानिंदे चराग़ों ही के जलना होगा

यह आम आदमी की नैतिक ताक़त का ऐलान है बड़े नारों के बिना।

कह दो तंगनज़री निगाहों से ये जाके ‘माहिर’
अब तुम्हें सोच का पैमाना बदलना होगा

जनाब ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ किसी तामझाम के मोहताज नहीं हैं। अगर यह कहा जाए कि उनका कलाम ही उनकी शख़्सियत को बयान करता है, तो इसमें कोई ग़लतबयानी नहीं होगी। ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ के रूप में मैं उस शायर को जानता हूँ जिसकी कथनी और करनी में फ़र्क़ नहीं। एक ऐसा शायर जिसे ज़माने की मक़बूलियत की परवाह नहीं, जो कलाम का बाज़ारू अर्थ नहीं जानता और न ही मासूमियत से सच को कहने में कोई गुरेज़ करता है।

कुछ ग़लत होते देख कुछ  समझदार मसलहत चुप्पी साध लेते हैं उस वक़्त इस शायर में छुपा बैठा एक मासूम बच्चा अपना हाथ खड़ा कर देता है और शायर को मुश्किल में डाल ही देता है । शायरी में ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ एक अलहदा नाम है। यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि इस हीरे की परख होनी अभी शेष है।
 

किसी भी इंसान को नज़दीक से जानना और तआरुफ़ होना दोनों अलग बातें हैं। माहिर साहब को उनके नाम और शायरी की बदौलत पहचानने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन हक़ीक़तन उन्हें जानने वाले बहुत कम लोग हैं। माहिर साहब कहते हैं—

कभी सुन मेरी भी ओ बेख़बर
तू करे तो अपनी ही फ़िक्र कर
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पे
कि मैं मस्त हूँ मेरे हाल में

दुनिया में बहुत कम इंसान ऐसे होते हैं जो कुछ दिल में रखते हैं और वही ज़ुबाँ पर रखते हैं। लबों पर नक़ली मुस्कान सजाकर लोगों की झूठी तारीफ़ करना माहिर साहब की फ़ितरत में शामिल नहीं। इसी वजह से उनकी शख़्सियत भीड़ से अलग नज़र आती है। तभी तो वे कहते हैं—

हम थे मुँहफट, थी यही हममें कमी इक माहिर
इसलिए लोग बुरा हमको कहा करते थे

अदबी विरासत 
 तीन पीढ़ियों का तहज़ीबी सिलसिला

माहिर साहब का हस्सास होना किसी एक पीढ़ी की देन नहीं। इसके पीछे एक लंबा अदबी और तहज़ीबी सिलसिला है।
 

इनके वालिद मरहूम मोहम्मद अय्यूब ‘सालिक’ बीकानेरी ख़ुद एक संजीदा शायर थे। उनकी शायरी जीवन की सख़्त सच्चाइयों से टकराकर निकली हुई शायरी थी न बनावटी शिकवा, न दिखावटी सब्र।

आँखों में अश्क देखे हैं दामन में आग भी
अब और क्या दिखाएगी ऐ ज़िन्दगी मुझे

यह शेर  पूरे जीवन-दर्शन को समेटे हुए है जहाँ आँसू भी हैं और आग भी, मगर शिकायत नहीं, सवाल है।
 

यह सिलसिला और पीछे जाता है माहिर साहब के दादा मरहूम मोहम्मद अब्दुल्ला ‘बेदिल’ तक। ‘बेदिल’ साहब महाराजा गंगा सिंह जी के वक़्त रियासत काल में सेशन जज रहे और राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख शायरों में उनका शुमार होता था। उनके यहाँ अदालत का इंसाफ़ और शायरी की सच्चाई एक साथ मौजूद थी। यह विरासत महज़ ख़ून की नहीं, बल्कि ज़ेहन और ज़मीर की विरासत थी।
 

यह कहना ग़लत न होगा कि ‘बेदिल’ साहब का इल्मी संतुलन ‘सालिक’ साहब की जीवन-दृष्टि में ढला और वही आगे चलकर माहिर साहब की शायरी में सामाजिक ज़िम्मेदारी, ख़ुद तनक़ीदी और नैतिक साहस बन गया। माहिर साहब इस तरह “बेदिल मंज़िल” के आख़िरी  शायर भी हैं जहाँ विरासत सहूलियत नहीं, ज़िम्मेदारी बन जाती है।
 

ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ महज आदमी का नाम नहीं वरन एक ऐसे ब्रांड नेम शायर का नाम है जो शायरी  के दीवानों को मुशायरों में रूकने पर मजबूर करता है ।

माहिर साहब की अदबी विरासत का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता। यह रवायत एक पीढ़ी पीछे और जाती है—उनके दादा मरहूम मोहम्मद अब्दुल्ला ‘बेदिल’ तक, जिनका ताल्लुक़ रियासत काल के उस इल्मी और न्यायिक माहौल से रहा, जहाँ ज़बान, इंसाफ़ और ज़िम्मेदारी एक-दूसरे से जुदा नहीं थे। ‘बेदिल’ साहब रियासत काल में सेशन जज के पद पर फ़ाएज़ रहे और अपने दौर में एक संजीदा, शरीफ़ और अदब-आश्ना शख़्सियत के तौर पर जाने गए।
 

यह महज़ एक सरकारी ओहदा नहीं था, बल्कि उस ज़ेहनी तर्बियत का सबूत था जिसमें फ़ैसला करने से पहले तौलना सिखाया जाता है और बोलने से पहले ज़बान की क़ीमत समझाई जाती है। यही वजह है कि ‘बेदिल’ साहब का नाम  मुल्क़ के नामचीन शायरों में शुमार होता रहा। उनकी ग़ज़लों में न तो सतही भावुकता थी और न ही लफ़्ज़ों की बनावटी चकाचौंध बल्कि एक ठहरी हुई समझ, इंसाफ़पसंदी और इंसानी दर्द की गहरी पहचान मिलती है।
 

यह कहना ग़लत न होगा कि ‘बेदिल’ साहब के यहाँ जो अदबी शऊर था, वही आगे चलकर ‘सालिक’ साहब की शायरी में ज़िंदगी की सख़्त सच्चाइयों से टकराने की हिम्मत बना, और फिर उसी सिलसिले ने माहिर साहब की शायरी में सामाजिक ज़िम्मेदारी और ख़ुद तनक़ीदी की शक्ल इख़्तियार की। इस तरह यह विरासत सिर्फ़ ख़ून की नहीं, ज़ेहन और ज़मीर की विरासत है—जिसमें अदालत का इंसाफ़, शायर की सच्चाई और इंसान की ईमानदारी एक साथ सांस लेती हैं।

माहिर साहब इस मायने में “बेदिल मंज़िल” के आख़िरी शायर भी ठहरते हैं—ऐसे आख़िरी वारिस, जिनके यहाँ शायरी विरासत की वजह से मिली सहूलियत नहीं, बल्कि विरासत की वजह से मिली ज़िम्मेदारी बन जाती है। यही कारण है कि उनकी शायरी में न तो आत्मप्रचार है और न ही जल्दबाज़ी वह एक लंबे तहज़ीबी सफ़र का निचोड़ बनकर सामने आता है
 

ग़ुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’ की शायरी को अगर महज़ व्यक्तिगत अनुभवों का नतीजा समझा जाए, तो यह अधूरा आकलन होगा। उनकी संवेदना, उनकी ज़बान की शालीनता और उनके कथ्य की ईमानदारी के पीछे एक गहरी अदबी और तहज़ीबी विरासत काम करती नज़र आती है—और इस विरासत की बुनियाद उनके वालिद मरहूम मोहम्मद अय्यूब ‘सालिक’ बीकानेरी की शख़्सियत और शायरी में मिलती है।
 

‘सालिक’ साहब उन शायरों में से थे जिनकी शायरी किसी तामझाम या शोर की मोहताज नहीं रही। उनकी नज़र ज़िंदगी पर थी—वैसी ज़िंदगी, जो बाहर से जितनी सादा दिखती है, भीतर उतनी ही जटिल और सख़्त होती है। उनके यहाँ न बनावटी शिकवा है, न दिखावटी सब्र बल्कि वह संतुलन है जो ज़िंदगी को उसकी पूरी सख़्ती के साथ स्वीकार करता है।
 

उनका यह शेर

आँखों में अश्क देखे हैं दामन में आग भी
अब और क्या दिखाएगी ऐ ज़िन्दगी मुझे

 यहाँ आँसू और आग दोनों मौजूद हैं, यानी रंज भी और इम्तिहान भी। यह शेर शिकायत नहीं करता, बल्कि ज़िंदगी से सवाल पूछते हुए भी उसे चुनौती देता है। यही रवैया आगे चलकर माहिर साहब की शायरी में एक नैतिक साहस की शक्ल में दिखाई देता है।
 

यह विरासत सिर्फ़ लहजे या विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि एक रवैये की विरासत है सच कहने का रवैया, बिना शोर मचाए खड़े रहने का का वसीह होना है।
 

यह कहना ग़लत न होगा कि ‘सालिक’ साहब ने माहिर साहब को सिर्फ़ शायरी नहीं दी, बल्कि शायरी की ज़िम्मेदारी दी यह एहसास कि कलाम महज़ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अमानत होता है। इसी वजह से माहिर साहब की शायरी न तो जल्दबाज़ है, न नारेबाज़  वह सोच-समझकर, तौलकर और जवाबदेही के साथ कही गई शायरी है।
 

इस तरह माहिर साहब की अदबी पहचान को समझने के लिए उनके वालिद की शायरी और शख़्सियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह विरासत किसी घोषणा की तरह सामने नहीं आती, बल्कि उनकी हर पंक्ति में ख़ामोशी से सांस लेती हुई महसूस होती है और यही ख़ामोशी उनकी सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है।

ad211

FROM AROUND THE WEB