Movie prime

Bikaner की हर्षिता शर्मा ने दी मुखाग्नि, सामाजिक बदलाव की मजबूत मिसाल!

 
RNE Bikaner.
श्मशान घाट पर उठती लपटों के बीच एक बेटी की आँखों में आँसू थे, लेकिन कदमों में अडिग साहस। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि उस सोच की विदाई भी थी, जो बेटियों को कुछ जिम्मेदारियों से दूर रखती आई है।

Bikaner

हर्षिता शर्मा ने अपने पिता स्वर्गीय राजकुमार शर्मा की अर्थी को कंधा दिया—वह कंधा, जिस पर कभी पिता ने उसे बचपन में उठाया होगा। हर कदम के साथ जैसे यादें चल रही थीं—उँगली पकड़कर चलना सिखाने वाले पिता को आज बेटी खुद अंतिम यात्रा पर ले जा रही थी।

Bik

श्मशान घाट पर मौजूद लोग इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठे। जब हर्षिता ने मुखाग्नि दी, तो कई आँखें नम थीं—कुछ दुख से, तो कुछ उस बदलती तस्वीर को देखकर, जहाँ बेटी ने समाज की परंपराओं को चुपचाप चुनौती दी।
परंपराएं अक्सर कहती रही हैं कि अंतिम संस्कार का अधिकार और कर्तव्य बेटों का होता है। लेकिन आज के दिन बीकानेर में एक बेटी ने यह साबित कर दिया कि रिश्तों की गहराई का कोई लिंग नहीं होता। कर्तव्य का कोई बंधन नहीं होता।
परिवार ने भी हर्षिता के इस फैसले में पूरा साथ दिया। उनके लिए यह केवल एक रस्म नहीं थी, बल्कि अपने पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी का अंतिम रूप था।

Bi

अंतिम संस्कार के दौरान कल्याण भूमि प्रन्यास के उपाध्यक्ष युवराज बंशीवाला, वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी रामावतार शर्मा सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने हर्षिता के इस कदम की सराहना करते हुए इसे समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में अहम पहल बताया।
दरअसल हर्षिता शर्मा ने अपने पिता स्वर्गीय राजकुमार शर्मा (सेवानिवृत्त अधिकारी, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया) की अर्थी को कंधा दिया और पूरे विधि-विधान के साथ मुखाग्नि देकर यह साबित कर दिया कि बेटियाँ भी हर जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सक्षम हैं।

FROM AROUND THE WEB