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‘कळकत्ते’ जाकर यूं निखरी गवर कि अब बीकानेर उसे देखने जाता है

 

RNE Special.

ये कोलकाता के बड़े बाजार का इलाका है जिसे मिनी राजस्थान कह देना अतिश्योक्ति नहीं होगी। भीड़भरे इस इलाके में दौड़ने की रफ्तार तक चल रहे लोगों में कोई परिचित मिल जाएं तो होठ की हलकी-सी जुंबिश से अभिवादन करते हुए बिना ठहरे आगे बढ़ जाना आम बात हो सकती हैए लेकिन इस एक दृश्य से ही आप कोलकाता वालों को मशीनी मान बैठे तो गलत साबित हो सकते हैं। 

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इनके लिए कोई भी धारणा बनाने से पहले एक बार उन तंग गलियों के बीच बने बड़े से हॉल में झांक लीजिये जहां शाम होने से पहले ही लोग जुटना शुरू हो रहे हैं। कुछ ही मिनिटों में सौ से ज्यादा लोग जुट जाते हैं। इनमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं, युवतियां, युवक सब शामिल हैं।
 

हाथों मंे आ जाती हैं छोटी-छोटी बुकलेट। ढोलक, तबला, हारमोनियम, सिंथेसाइजर के साथ छमछमों की ताल मिलती है और गीतों के बोल फूटते हैं: 
 

‘ओ तो तीज्यो रो त्यौहार, 
घर-घर खुशियों रो त्यौहार
गवरल पूजण रो त्यौहार, 
बालो लागै जी...’

हालांकि इनमें से ज्यादातर लोग पेशेवर गायक नहीं है। कइयों का सुर नहीं लगता तो कोई ताल मिलाने में चुक जाता है। उस्ताद सरीखे एक शख्स बार-बार रीटेक करवाते हैं और संतुष्ट होने के बाद ही अगले अंतरे की ओर बढ़ते हैं। इन सबके बावजूद गाने वालों के चेहरों पर उत्साह और अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन देने की ललक स्पष्ट दिखाई देती है। इसके साथ ही झलकता है एक आस्था का भाव जो इन गीतों के बोलों में पिरो दिया गया है। यह आस्था गवर यानी गणगौर माता के लिए है।

जी हां, यहां बात हो रही है कोलकाता की गणगौर यानी गवरजा मंडलियों की। एक-दो नहीं, ऐसी नौ मंडलियां बड़ा बाजार और आस-पास के ही इलाके में गणगौर के गीतों की रिहर्सल मंे पिछले कई  दिनों से जुटी हैं। यहां गाने-बजाने वालों से लेकर टेर मिलाने वालों में कोई बड़े व्यापारी हैं तो कोई स्टूडेंट। किसी की कंपनी में नौकरी है तो कोई प्रोफेशनल। इन सबसे इतर सब एक जाजम पर ‘गोडा भिड़ा’ यूं बैठे हैं मानो घर मंे बेटी का ब्याह मंडा है और सबको मिलकर अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी है।

यहां हैरानी की बात यह है कि गणगौर मूल रूप से राजस्थान का त्यौहार है। कोलकाता में भी मारवाड़ी समाज ही इस त्यौहार को विशेष रूप से मनाता है लेकिन राजस्थान से जो ‘गवर’ उस वक्त के ‘कळकत्ते’ के लिए रवाना हुई थी वह आज जाकर इतनी बदल गई है कि खुद राजस्थान के लोग उसे देखने-सुनने हर साल जाते हैं। मसलन राजस्थान में गणगौर को विशुद्ध महिलाओं का त्यौहार माना गया था लेकिन कोलकाता में यह पुरुषों का प्रमुख त्यौहार हो गया। हालांकि अब बदलाव या रहा है और महिलाएं भी मंडलियों में बराबर भागीदारी निभाने लगी है। 

कोलकाता की ऐसी ही एक मंडली मंे हमें नरेन्द्र कुमार बागड़ी मिले। उन्होंने गवर के इस बदलते रूप और कोलकाता में पिछले लगभग सौ सालों में गणगौर मनाने की जो प्रतिबद्धता बताई, वह रोमांचित करने वाली  है। नरेन्द्र बागड़ी कहते हैं, मैं 60 साल से गणगौर के इस आयोजन से जुड़ा हूं। मुझसे पहले पिता और दादा इससे भी कहीं अधिक समर्पण से यह काम करते थे। यह भी बोले कि अकेले बागड़ी परिवार  नहीं वरन कोठारी, दम्माणी, मोहता, बिन्नाणी आदि परिवारों की कई पीढ़ियां इसी तरह अपनी इस मंडली की गणगौर के लिए जुटती रही हैं। 

वे आज भी नये गीतों के साथ ही घनश्यामजी आचार्य और बिठ्ठलशंकर दवे ‘गुरुजी’ के वो गीत गाते हैं जो सालों पहले रचे गये थे।  यहां एक सुखद आश्चर्य वाली बात यह है कि भी बिठ्ठलशंकर दवे बंगाल की गवरजा के इतिहास में अकेले ऐसे गीतकार रहे हैं जो राजस्थान के नहीं थे। यानी राजस्थानी भाषी नहीं थे लेकिन उन्होंने गवर के गीत मायड़ भाषा यानी राजस्थानी में रचे हैं जिन्हें आज भी पूरे भाव से गाया जाता है।

जहां तक गवरजा मंडलियों की बात करें तो मोटे तौर पर 09 मंडलियां इस समारोह में भागीदारी निभाती है। इनमें श्री श्री मनसापूर्ण गवरजा माता सेवा ट्रस्ट, श्री श्री गवरजा माता पारख कोठी, श्री बलदेवजी गवरजा माता सेवा ट्रस्ट, श्री निम्बुतल्ला पंचायत गवरजा सेवा ट्रस्ट, श्री श्री गवरजा माता गांगुली लेन, श्री श्री गवरजा माता कलाकार स्ट्रीट, श्री श्री गोवर्धन नाथजी मन्दिर गौरी माता, श्री श्री बांसतल्ला गवरजा माता कमेटी, श्री श्री गवरजा माता हंसपुकुर मंडल शामिल है। 

कई दिनों की कड़ी मेहनत, तैयारी और रिहर्सल के बाद गवर की तीज और चौथ को ये मंडलियां शोभायात्रा के रूप में बाहर आती है। सबकी परफॉर्मेंस होती है। सैकड़ों लोगों वाली इन मंडलियों की प्रस्तुतियां देखने हजारों लोग जुटते हैं। ऐसे में इस बार भी वह अवसर आ गया है जब मंडलियां अपनी प्रस्तुतियां देने पहुंची है। इन्हें देखने-सुनने जहां हजारों लोग जुटे हैं वहीं स्वागत-सत्कार करने वालों की भी कमी नहीं है। 

पश्चिम बंगाल में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त TMC नेता सपन बर्मन भी उन लोगों में से एक हैं जो मारवाड़ी समाज के इस उत्सव में पूरी तरह सहयोगी ही नहीं भागीदार भी बनते हैं। "सपन दा" सम्बोधन वाले बर्मन  के गणगौर के प्रति समर्पण का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उनके प्रयास में बड़ा बाजार इलाके में एक गणगौर गेट तक बना है। इस गेट के साथ सद्भाव की एक बड़ी मिसाल यह भी जुड़ी है कि इसे नगर निगम ने बनवाया और उदघाटन खुद मेयर फिरहाद हकीम ने किया। फिरहाद हकीम 2018 से कोलकाता के 38वें महापौर के रूप में कार्यरत हैं । वे पश्चिम बंगाल सरकार में शहरी विकास, नगर निगम और आवास मंत्री भी हैं ।

बहरहाल जब बात राजस्थानी गणगौर के कोलकाता संस्करण की हो रही है तो यह बताना लाजिमी होगा कि अब ये गणगौर इतनी फेमस हो गई है कि राजस्थान के लोग गवर सुनने-देखने बंगाल जाते हैं। ऐसे ही गणगौर के प्रशांशकों में से एक हैं प्रख्यात ज्योतिर्विद राजेन्द्र व्यास "ममू महाराज"। गवर के प्रति उनके क्रेज का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हाल ही बीकानेर के हल्दीराम हार्ट हॉस्पिटल में उनके हार्ट में ब्लोकेज का इलाज हुआ है। एक साथ तीन स्टेंट लगे हैं।

जाहिर है कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले बीकानेर या राजस्थान से जो गणगौर बंगाल गई थी उसके क्रेज अब इतना बढ़ गया है कि बीकानेर में भी जब युवतियाँ गवर पूजती है तो गाती है--
 

"कळकत्ते हालो.. गवर्यां री मौज्यां बीकानेर री...।"
 

कोलकाता से Rudra News Express के लिए अभिषेक पुरोहित की स्पेशल रिपोर्ट।

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