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शायरी, वतन और इंसानियत: शाद जामी के कलाम का अदबी मुताला

 

RNE 

Nadeem

- इमरोज़ नदीम 

बात उर्दू अदब की :
उर्दू अदब की तारीख़ पर नज़र डाली जाए तो एक बात वाज़ेह होकर सामने आती है कि यह ज़बान महज़ इश्क़-ओ-मुहब्बत की तरन्नुमी ज़बान नहीं रही, बल्कि इसने हर दौर में समाजी शऊर, क़ौमी बेदारी और वतन-दोस्ती के जज़्बे को भी अपने दामन में जगह दी है। उर्दू शायरी की रूह में जहाँ रक़्स-ए-मुहब्बत है, वहीं उसकी धड़कनों में वतन की महक भी बसी हुई है।
उर्दू के इब्तिदाई दौर में शायर ज़्यादा तर इश्क़िया और सूफ़ियाना मज़ामीन तक महदूद नज़र आते हैं । 1857 के बाद का दौर उर्दू अदब में क़ौमी एहसास की बुनियाद रखता है। शायर ने पहली बार अपने वतन को एक मफ़हूम, एक तसव्वुर और एक मुक़द्दस अमानत के तौर पर पेश किया। यह एहसास महज़ जज़्बाती नहीं था, बल्कि इसमें तहज़ीबी वजूद की हिफ़ाज़त का पैग़ाम भी शामिल था।
उर्दू शायरी में वतन का तसव्वुर सिर्फ़ ज़मीन के टुकड़े का नाम नहीं है। यह तहज़ीब, रवायत, इंसानियत और इत्तिहाद की तस्वीर है। जब शायर “हिंद” या “वतन” कहता है तो वह दरअस्ल एक ऐसी सरज़मीं का ज़िक्र करता है जहाँ मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब, क़ौमें और ज़बानें मिलकर एक रंगीन गुलदस्ता बनाती हैं। यही वह तसव्वुर है जो उर्दू को “गंगा-जमुनी तहज़ीब” का अक्स बनाता है।
उर्दू के क़ौमी शायरों ने वतन को कभी माँ की तरह पुकारा, कभी महबूब की तरह चाहा और कभी अमानत समझकर उसकी हिफ़ाज़त का अहद किया। यह रवायत हमें बताती है कि शायरी महज़ अल्फ़ाज़ की बाज़ीगरी नहीं, बल्कि ज़मीर की आवाज़ भी होती है। वतन के लिए क़ुर्बानी देने वालों को याद करना, उनकी शुजाअत को सलाम पेश करना और आने वाली नस्लों में वही जज़्बा पैदा करना यह सब उर्दू शायरी के फ़र्ज़ में शामिल रहा है।
मगर यहाँ एक नुक्ता-ए-नज़र की वज़ाहत भी ज़रूरी है। उर्दू अदब में वतन-दोस्ती तअस्सुब से पाक रही है। यह किसी और की नफ़ी पर क़ायम नहीं, बल्कि अपने वजूद की इस्बात पर मबनी है। उर्दू का शायर इंसानियत का पैग़ाम देता है। उसकी नज़्मों में जोश है, मगर साथ ही अम्न की दुआ भी है; उसके अल्फ़ाज़ में गैरत है, मगर साथ ही मोहब्बत की शमअ भी रौशन है।
आज के दौर में जब दुनिया फिर से तअस्सुब और तफरक़े की गिरफ़्त में आती दिखाई देती है, उर्दू अदब की यह रवायत और भी अहम हो जाती है। हमें ज़रूरत है कि हम उर्दू शायरी के उस रौशन पहलू को उभारें जो इत्तिहाद, हमआहंगी और इंसानी बिरादरी का पैग़ाम देता है। वतन से मुहब्बत का मतलब यह है कि हम उसकी तरक़्क़ी, उसके अम्न और उसकी तहज़ीबी विरासत की हिफ़ाज़त करें।
उर्दू अदब की यही ख़ूबी है कि वह हर दौर में ज़माने के सवालात का जवाब अपने अंदाज़ में देता है। वतन-दोस्ती की यह रवायत भी दरअस्ल उसी जवाब का हिस्सा है। अगर हम इस रवायत को समझ लें और अपनी तहरीरों में उसे सलीक़े से जगह दें, तो उर्दू अदब न सिर्फ़ माज़ी की यादगार रहेगा, उर्दू शायरी में वतन महज़ एक मौज़ू नहीं, बल्कि एक अकीदा है ऐसा अकीदा जो मोहब्बत, कुर्बानी और इंसानियत की बुनियाद पर क़ायम है। यही वह जज़्बा है जो उर्दू अदब को आज भी ज़िंदा और मुतहर्रिक रखे हुए है।
उर्दू अदब की रवायत में वतन-दोस्ती कोई नया मौज़ू नहीं, बल्कि एक पुरअसरार और पुरशऊर सिलसिला है, जो हर दौर में अपने अंदाज़ और अपने लहजे के साथ सामने आता रहा है। इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी में बीकानेर के हाफ़िज़ गुलाम रसूल ‘शाद’ जामी साहब की शायरी है, जिनकी किताब “वतन के रतन” इस जज़्बे की तर्जुमान बनकर उभरती है।

वतन के रतन

शाद साहब की शायरी में वतन महज़ एक जज़्बाती नारा नहीं, बल्कि एक मुक़द्दस अमानत है। उनकी नज़्म “शहीदे वतन को सलाम” में जो अंदाज़-ए-ख़िताब है, वह महज़ रस्मी एहतराम नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों से निकला हुआ एहसास है— 
“सुकूने दिल के लिए जिनके जान दी तूने
उन्हीं दिलों की दुआएँ सलाम कहती हैं”
यहाँ शायर शहादत को महज़ जंग का वाक़िआ नहीं मानता, बल्कि उसे क़ौम के सुकून और इज़्ज़त की बुनियाद क़रार देता है। दुआओं का सलाम कहना, शहादत को रूहानी दर्ज़ा अता करता है।
इसी तरह नज़्म “वतन के सिपाही से ख़िताब” में शाद साहब का लहजा जोशीला होते हुए भी संयमित है। वे सिपाही को जंग के मैदान में हिम्मत और सब्र की तल्क़ीन करते हैं, मगर साथ ही उसकी कुर्बानी को इन्सानी एहतराम के दायरे में रखते हैं। वे कहते हैं -
“जो वतन के वास्ते मरने से भी डरता नहीं
मौत उसकी ज़िन्दगी है, वो कभी मरता नहीं।”
 यह शे'र उर्दू शायरी की उस रवायत का हिस्सा है जहाँ शहादत को फ़ना नहीं, बल्कि बक़ा का दर्ज़ा दिया गया है। यहाँ मौत हार नहीं, बल्कि अमरता का इस्तिआरा बन जाती है।
शाद जामी साहब की नज़्म “हमारा मुल्क” में वतन का तसव्वुर और भी वसीअ हो जाता है। वे अपने मुल्क को “अम्मा की सरज़मीं” कहते हैं, जहाँ मोहब्बत के चश्मे हर क़दम पर बहते हैं। इस नज़्म में हिंदुस्तान की तहज़ीबी रवानगी, मज़हबी हमआहंगी और इंसानी उख़ुव्वत का जिक्र जिस सादगी और ख़ुलूस से आया है, वह उर्दू अदब की गंगा-जमुनी रवायत की खुली मिसाल है। शाद साहब यहाँ एक ऐसे मुल्क की तस्वीर पेश करते हैं जहाँ “चार जानिब प्यार के धारे” बहते हैं।
नज़्म “क्रान्ति” और “पन्द्रह अगस्त” में शाद साहब का शऊर-ए-आज़ादी पूरी शिद्दत के साथ सामने आता है। “पन्द्रह अगस्त” में वह आज़ादी को महज़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि याददाश्त की ताज़गी और ज़िम्मेदारी की याद दिलाने वाला दिन बताते हैं। उनका इशारा साफ़ है कि आज़ादी का जश्न मनाना काफ़ी नहीं, उसकी हिफ़ाज़त और उसके तक़ाज़ों को समझना भी ज़रूरी है।
शाद साहब की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उसमें जोश और होश का तवाज़ुन मौजूद है। वह वतन से मुहब्बत का पैग़ाम देते हैं, मगर किसी और की नफ़रत के बग़ैर। उनके यहाँ दुश्मन से मुक़ाबला है, मगर इंसानियत का दामन हाथ से नहीं छूटता। यह वही रवायत है जो उर्दू अदब को तअस्सुब से पाक और मोहब्बत से मआमूर बनाती है।
अगर हम अदबी नुक्ता-ए-नज़र से देखें तो शाद जामी की नज़्मों में सादगी-ए-बयान और रवानी ख़ास तौर पर क़ाबिले-ग़ौर है। वह पेचीदा इस्तिआरों या मुश्किल तराकीब के बजाय सीधी और असरदार ज़बान का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनका पैग़ाम अवाम तक ब-आसानी पहुँचता है। यही वजह है कि उनकी शायरी महज़ किताब के सफ़्हों तक महदूद नहीं रहती, बल्कि मुशायरों और तक़रीबात में भी पूरे एहतिराम के साथ पढ़ी और सुनी जाती है।
उर्दू अदब की तारीख़ में ऐसे शायरों की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि यह ज़बान आज भी अपने तहज़ीबी और क़ौमी फ़र्ज़ को निभा रही है। शाद जामी साहब की शायरी हमें यह एहसास दिलाती है कि वतन-दोस्ती महज़ नारों का शोर नहीं, बल्कि अमल, कुर्बानी और मोहब्बत का मुकम्मल निज़ाम है।
यही वह पैग़ाम है जिसे उर्दू अदब ने हमेशा अपने सीने से लगाए रखा है और यही वह रोशनी है जो आने वाली नस्लों के लिए भी रहनुमा बन सकती है।
शाद जामी साहब की ग़ज़लगोई : फ़न, बहर और लफ़्ज़ की सादगी
उर्दू शायरी में ग़ज़ल को बुनियादी और सबसे नाज़ुक सिन्फ़-ए-सुख़न का दर्ज़ा हासिल है। यह महज़ अशआर का सिलसिला नहीं, बल्कि लफ़्ज़ और मआनी के दरमियान एक महीन रक़्स है। शाद जामी साहब की शायरी पर ग़ौर किया जाए तो महसूस होता है कि उन्होंने इस रक़्स की नज़ाकत को समझते हुए अपने अंदाज़ को सादगी और असरअंदाज़ी के संगम पर क़ायम किया है।
1. बहर की पाबंदी और रवानी
शाद साहब की ग़ज़लों और नज़्मों में बहर की पाबंदी साफ़ दिखाई देती है। वह अरूज़ी उसूलों से वाक़िफ़ मालूम होते हैं और अशआर में वज़्न की गिरह कहीं ढीली नहीं पड़ती। उनकी बह्रें ज़्यादातर रवां क़िस्म की हैं, जिनमें तकल्लुफ़ नहीं, बल्कि तरन्नुम का सहज बहाव है।
मिसाल के तौर पर यह मिसरा
"जो वतन के वास्ते मरने से भी डरता नहीं"
वज़्न की एतिबार से मुतवाज़िन है । इसी रवानी की वजह से उनका कलाम अवामी महफ़िलों में आसानी से क़बूल किया जाता है।
उनकी नज़्मों में भी बहर का एहतेमाम मिलता है। चाहे “शहीदे वतन को सलाम” हो या “हमारा मुल्क”, हर जगह वज़्न की पुख़्तगी बयान की सादगी के साथ जुड़ी हुई है। यह ख़ूबी बताती है कि शाद साहब के यहाँ जज़्बा, फ़न की सरहद से बाहर नहीं जाता।
2. क़ाफ़िया और रदीफ़ का एहतिराम
ग़ज़ल की जान क़ाफ़िया और रदीफ़ होते हैं। शाद जामी साहब इन दोनों की पाबंदी में ग़फलत नहीं बरतते। उनके यहाँ रदीफ़ अक्सर सादा और असरदार होती है—मसलन “सलाम कहती हैं” जैसी तकरार नज़्म में एक तरन्नुम पैदा करती है और मआनी को मजबूती देती है।
क़ाफ़िये के इंतिख़ाब में भी वह आसान और मफ़हूम अल्फ़ाज़ को तरजीह देते हैं। पेचीदा या ग़ैर-मामूली क़ाफ़िये गढ़ने के बजाय वह मआनी की वज़ाहत को अहमियत देते हैं। यही वजह है कि उनके अशआर में बनावटीपन नहीं, बल्कि सच्चाई की महक आती है।
3 लफ़्ज़ियाती बनावट और ज़बान का मिज़ाज
शाद साहब की ज़बान न तो बहुत ज़्यादा फ़ारसी-आमेज़ है और न ही महज़ रोज़मर्रा की सादा गुफ़्तगू। उन्होंने उर्दू के उस दरमियानी लहजे को अपनाया है जो अवाम और ख़ास दोनों के लिए क़ाबिले-फ़हम है।
उनकी शायरी में “वतन”, “हिंद”, “मोहब्बत”, “कुर्बानी”, “आज़ादी”, “दुआ” जैसे अल्फ़ाज़ बार-बार आते हैं, मगर हर बार एक नए रूप में। यह तकरार इत्तिफ़ाक़ी नहीं, बल्कि फ़िक्री इस्तिक़ामत की दलील है। वे अपने मौज़ू से वफ़ादार रहते हैं और उसी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को उजागर करते हैं।
4. इस्तिआरा और तश्बीह का इस्तिमाल
शाद जामी साहब के यहाँ इस्तिआरा सादा मगर असरदार है। वह वतन को कभी “अम्मा की सरज़मीं” कहते हैं, कभी “मोहब्बत के धारे” बहने वाली ज़मीन बताते हैं। यह तश्बीहात पेचीदा नहीं, मगर दिल में उतर जाने वाली हैं।
उनके यहाँ जंग का ज़िक्र भी आता है, मगर वह उसे ख़ून-रेज़ी के मंजर के तौर पर नहीं, बल्कि ग़ैरत और हिफ़ाज़त के इस्तिआरे के रूप में पेश करते हैं। इस एहतियात से उनका कलाम जोशीला होने के बावजूद मुतवाज़िन रहता है।
5. फ़िक्र और पैग़ाम की यकसानी
शाद जामी साहब की ग़ज़लगोई का एक अहम पहलू उनकी फ़िक्र की यकसानी है। वह बिखरते नहीं, बल्कि एक मुक़र्रर मर्कज़ वतन-दोस्ती और इंसानियत—के इर्द-गिर्द अपनी तख़्लीक़ी दुनिया बसाते हैं।
उनके यहाँ वतन से मुहब्बत, इंसानी उख़ुव्वत और अम्न का पैग़ाम एक-दूसरे से जुदा नहीं, बल्कि एक ही ज़ंजीर की कड़ियाँ हैं। यही यकसानी उन्हे एक फ़िक्री शायर के तौर पर पहचान देती है।

Urdu

अदबी एतिबार से देखा जाए तो शाद जामी साहब की शायरी में फ़न और जज़्बा एक-दूसरे के मुक़ाबिल नहीं, बल्कि हमराह हैं। बहर की पाबंदी, क़ाफ़िया-रदीफ़ का एहतिराम, सादा मगर असरदार लफ़्ज़ियात और वतन-दोस्ती की पुख़्ता फ़िक्र ये तमाम अनासिर मिलकर उनके कलाम को एक मुकम्मल पहचान अता करते हैं।
शाद जामी साहब - अदब, तालीम और रूहानी ख़िदमत की मुसलसल रवायत
उर्दू अदब की दुनिया में कुछ घराने ऐसे भी होते हैं जहाँ शायरी महज़ एक शौक़ नहीं, बल्कि एक विरासत की सूरत इख़्तियार कर लेती है। हाफ़िज़ गुलाम रसूल ‘शाद’ जामी का घराना भी इसी सिलसिले की एक रौशन कड़ी है। यह वह खानदान है जहाँ अदब, दीनी शऊर और तालीमी ख़िदमत एक साथ नज़र आते हैं।
शाद साहब के भाई मुंशी हुसैनुद्दीन फ़ौक़ जामी साहब खुद एक अहम अदीब और शायर थे। उनकी अदबी हैसियत महज़ इलाक़ाई सतह तक महदूद नहीं रही, बल्कि उनके कलाम को वसीअ पज़ीराई हासिल हुई। उनकी एक किताब का इजरा मशहूर फ़नकार दिलीप कुमार के हाथों होना इस बात की दलील है कि उनके फ़न को क़ौमी सतह पर एतिराफ़ हासिल था। यह वाक़िआ महज़ रस्मी तक़रीब नहीं, बल्कि अदब और फ़न की उस क़द्रदानी का इज़हार है जो इस घराने की पहचान रही है।
शाद जामी साहब की अपनी शायरी जहाँ वतन-दोस्ती और इंसानियत की तर्जुमान है, वहीं उनकी ज़िंदगी का एक और पहलू और भी ज़्यादा क़ाबिले-तारीफ़ है और वह है तालीम के मैदान में उनकी बेमिसाल ख़िदमत। बीकानेर की सरज़मीं पर उन्होंने तालीम को महज़ एक पेशा नहीं, बल्कि इबादत का दर्ज़ा दिया।
उन्होंने न सिर्फ़ उर्दू अदब की तालीम दी, बल्कि दीनी तालीम के मैदान में भी एक ऐसी मिसाल पेश की जिसे भुलाया नहीं जा सकता। तीन सौ से ज़्यादा अफ़राद को “हाफ़िज़-ए-क़ुरआन” बनाना कोई मामूली कारनामा नहीं। यह काम सब्र, इस्तिक़ामत और रूहानी लगन का तलबगार होता है। शाद साहब ने यह साबित किया कि असल उस्ताद वही है जो इल्म को अपने तक महदूद न रखे, बल्कि उसे नस्ल दर नस्ल मुन्तक़िल करे।
उनकी शख़्सियत में अदब और मज़हबी शऊर का जो इत्तिहाद नज़र आता है, वह उर्दू तहज़ीब की अस्ल रूह है। वह न तो महज़ दीनी आलिम हैं और न सिर्फ़ शायर; बल्कि दोनों जहानों के दरमियान एक पुल की तरह हैं। उनकी नज़्मों में जहाँ “शहीदे वतन” का सलाम है, वहीं अम्न, मोहब्बत और इत्तिहाद की दुआ भी शामिल है।
यह भी क़ाबिले-ग़ौर है कि शाद जामी साहब ने बीकानेर में तालीम को एक तहरीक की शक्ल दी। उनके यहाँ तालीम महज़ किताबों तक महदूद नहीं रही, बल्कि किरदार-साज़ी का ज़रिया बनी। यही वजह है कि उनके तैयार किए हुए तलबा महज़ क़ारी या हाफ़िज़ नहीं, बल्कि समाजी शऊर रखने वाले अफ़राद बने।
मुंशी हुसैनुद्दीन फ़ौक़ जामी साहब और शाद जामी साहब दोनों भाइयों की अदबी और तालीमी जद्दोजहद दरअस्ल एक ही शजर की दो शाख़ें हैं। एक ने कलम के ज़रिये फ़िक्र को रौशन किया, दूसरे ने तालीम और तरबियत के ज़रिये दिलों को मुनव्वर किया। यह विरासत उर्दू अदब के लिए फ़ख़्र का बाइस है।
आज जब हम उर्दू अदब की बात करते हैं तो हमें ऐसे ही नामों को सामने लाना चाहिए जिन्होंने किताबें लिखीं भी, और इंसान भी तराशे। शाद जामी साहब की ज़िंदगी हमें यह सबक़ देती है कि असल कामयाबी सिर्फ़ अशआर कह देने में नहीं, बल्कि इल्म और किरदार की शमअ रौशन करने में है।
उर्दू अदब की तारीख़ में ऐसे लोग ही दरअस्ल “वतन के रतन” साबित होते हैं जो अपनी ज़ात से बढ़कर समाज को कुछ दे जाते हैं।

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