जनरंजन : भाजपा में बाहरी को तरजीह, मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा का आरोप, कांग्रेस टिकट वितरण ही उसके लिए समस्या बन गया,भाजपा व कांग्रेस के संगठन बेअसर साबित हुए,बागियों की दोनों तरफ रहेगी बहार
मधु आचार्य 'आशावादी'
बीकानेर नगर निगम चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने का आज अंतिम दिन है। आज कलेक्ट्री पर नये नेताओं और स्वंयम्भू जन नेताओं का जमावड़ा लगेगा। वहीं भाजपा और कांग्रेस की तरफ से मिले टिकटों के नेता भी आज अपने पर्चे दाखिल करेंगे। आज अंतिम दिन नामांकनों का आंकड़ा हजार की श्रेणी में पहुंचने की प्रबल संभावना नजर आ रही है।

नगर निगम के 80 वार्ड है। पहली बार ऐसा हुआ है कि अपने को बड़ी पार्टियों के रूप में संबोधित करने वाली भाजपा और कांग्रेस इस बार अंतिम समय तक भी हौसले से अपने 80 उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं कर सकी है। दोनों ही पार्टियां अधिकृत उम्मीदवारों को केवल फोन से सूचना भर दे पा रही है ताकि वे नामांकन दाखिल कर सके, आज उनको सिंबल भी चुपचाप दिए जायेंगे।
इस प्रक्रिया से ही स्पष्ट है कि दोनों ही पार्टियां बगावत से डरी हुई है। बगावत के प्रति दोनों पार्टियों के नेता जैसे पूरी तरह आश्वस्त लगते हैं। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि उनको मालूम है हमने कुछ टिकट मनमर्जी से मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा करके दिए हैं। आज की राजनीति में एक व्यक्ति निर्णय करता है, तभी खेल बिगड़ता नहीं। जहां ज्यादा निर्णयकर्ता वहां ज्यादा बगावत होनी तय।
यह थी टिकट प्रक्रिया दोनों तरफ
कांग्रेस की थी ये कहानी
कांग्रेस ने बाहरी तौर पर यह जाहिर किया कि इस बार संगठन स्तर पर टिकट का निर्णय होगा। सर्वे रिपोर्ट जो आएगी उसके आधार पर पैनल बनेगा और फिर उस पर विधानसभा चुनाव लड़े नेता से चर्चा होकर टिकट तय किया जाएगा और सूची प्रदेश कांग्रेस को भेज दी जाएगी। वहां से ही सूचियां जारी होगी।

दिखने में यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगती है, सही का भी आभाष होता है। मगर यथार्थ में ऐसा नहीं हुआ। जिन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा वे हावी हो गए और संगठन बौना होकर रह गया। नेताओं ने संगठन को खुद ही दबाकर कमजोर कर दिया। वहीं शहर अध्यक्ष भी संगठन व नेताओं को पूरी तरह संभालने में विफल रहे। कमजोर नेतृत्त्व साबित हुआ। दूसरे, जब विधानसभा चुनाव लड़े उम्मीदवार टिकट बांटेंगे तो उनकी नजर अभी के चुनाव पर नहीं होती, अपने अगले विधानसभा चुनाव पर थी। जाहिर है, गलतियां इसी कारण भरपूर हुई है। पूर्व व पश्चिम क्षेत्र में भीतर की बगावत इस बात का प्रमाण है कि संगठन की पकड़ कमजोर है और नेताओं का संगठन के मुखिया से कोई तालमेल नहीं। अब खमियाजा परिणामों में भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।
भाजपा की भी अलग नहीं कहानी
भाजपा में भी यह तय किया गया कि सर्वे होगा और उसके आधार पर संभावित उम्मीदवारों की सूची बनेगी। बीकानेर पूर्व व पश्चिम के विधायक अपनी तरफ से पैनल देंगे। उसके आधार पर प्रदेश अध्यक्ष, प्रभारी, सांसद, विधायक मिलकर टिकट पर चर्चा करेंगे और प्रदेश से सूची जारी करेंगे। यह प्रक्रिया भी लोकतांत्रिक थी, मगर क्रियान्वित दूसरी ही प्रणाली हुई।

टिकट में सांसद, विधायक का दखल पहले नम्बर पर रहा, दूसरे नम्बर पर प्रभारी व प्रदेश भाजपा के ऑब्जर्वर रहे, संगठन यहां भी गौण हो गया। संगठन का नेतृत्त्व जब कमजोर होता है तभी नेता हावी होते हैं। टिकट की सूचना के बाद जिस तरह से शहर भाजपा अध्यक्ष, प्रभारी व पश्चिम विधायक के सामने प्रदर्शन हो रहे हैं उससे लगता है कि कार्यकर्ता नाराज हैं। बगावत की तैयारी में है।
यहां यह बात भी उभरी हुई है कि विधायकों के क्षेत्र में कुछ बातें उनकी भी खारिज कर दी गयी, जबकि जमीन पर वे ही रहते हैं। विधायकों की राय की उपेक्षा कमजोर संगठन की परिचायक है। मजबूरी में भाजपा को अपने सभी मेयर दावेदारों को टिकट देना पड़ा है, मगर फिर भी बागियों की बहार रहेगी, यह तय है।

भाजपा पर कार्यकर्ताओ के लगे हैं यह आरोप
टिकट वितरण से नाराज भाजपा के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अनेक वार्डों में बाहरी उम्मीदवार को उतारा गया है। जिसका विरोध किया जाएगा। दूसरा आरोप मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा करने का लगा है। अनेक वार्डों में पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर नेताओं के नियमित प्रभात फेरी करने वालों को टिकट थमा दिया गया है। अब वहां बागी ताल ठोकने की तैयारी में है। तीसरा आरोप कार्यकर्ताओं का यह है कि विधायक की उपेक्षा हुई, उनकी बात को तरजीह नहीं मिली, यह सब कमजोर संगठन नेतृत्त्व के कारण हुआ है।
कांग्रेस में भी टिकट वितरण से उपजी समस्या
कांग्रेस का कार्यकर्ता भी टिकट वितरण से ज्यादा नाराज हैं। पहला आरोप यह है कि नेताओं ने अपने चहेतों को टिकट से उपकृत किया है और मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा की है। पूर्व विधानसभा में भी मनमर्जी से टिकट वितरण हुआ है, जिसकी बड़ी वजह संगठन का कमजोर नेतृत्त्व है। पश्चिम में भी ऐसा आरोप है, मगर पूर्व की तुलना में कम। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संगठन के कमजोर होने के कारण ही कार्यकर्ता अपनी बात पार्टी तक नहीं पहुंचा पाया। संगठन अध्यक्ष के निर्णयों से नाराज मंडल अध्यक्षों के इस्तीफे इस बात का प्रमाण है कि संगठन टिकट वितरण में फिस्सडी साबित हुआ है। अब खमियाजा उसका भुगतना पड़ेगा।
बागियों की दोनों तरफ बहार
संगठन की कमजोरी दोनों पार्टियों में साफ नजर आयी है, इस वजह से दोनों तरफ बागियों की बहार रहेगी। बागी पूरे चुनाव का समीकरण बिगाड़ेंगे।

