कृष्ण कुमार चतुर्वेदी ‘सोज़’ बदायूँनी : रवायत की पाकीज़गी और एहसास की शिद्दत
इमरोज़ नदीम

RNE Special.
उर्दू अदब की ख़ूबसूरती इसी में है कि यह ज़बान किसी एक क़ौम, मज़हब या तबक़े तक महदूद नहीं रही। इसके दामन में हर वह शख़्स समाया जिसने लफ़्ज़ों से मुहब्बत की और एहसास को फ़न की शक्ल दी। कृष्ण कुमार चतुर्वेदी ‘सोज़’ बदायूँनी इसी रवायत के रौशन नामों में से एक हैं । ऐसे शायर जिनकी शख़्सियत उर्दू तहज़ीब की उस रूह की याद दिलाती है जिसमें इख़लास, इल्म और इश्क़ एक साथ बसते हैं।
15 दिसम्बर 1923 को बरेली ज़िले की आँवला तहसील में जन्म लेने वाले ‘सोज़’ एक ऐसे घराने से ताल्लुक़ रखते थे जहाँ उर्दू-फ़ारसी का इल्मी माहौल मौजूद था। उनके वालिद शिव शंकर प्रसाद चतुर्वेदी उर्दू-फ़ारसी के बड़े आलिम थे। यही वजह है कि ‘सोज़’ ने बचपन ही से ज़बान की लज़्ज़त, लफ़्ज़ की नफ़ासत और मआनी की तह तक पहुँचने का सलीक़ा सीखा।
तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्होंने कस्टम और एक्साइज़ विभाग में ख़िदमत अंजाम दी, मगर दफ़्तरी ज़िंदगी की मसरूफियत भी उनके अदबी ज़ौक़ को कम न कर सकी। 1940 के आसपास शायरी की तरफ़ उनका रुझान पुख़्ता हुआ और उन्होंने ‘सोज़’ तख़ल्लुस इख़्तियार किया एक ऐसा तख़ल्लुस जो उनके कलाम के दर्दमंद लहजे की सही तर्जुमानी करता है।
रवायती ग़ज़ल का वक़ार:
‘सोज़’ की ग़ज़लों को रवायती उर्दू ग़ज़ल की सफ़ में रखा जाना चाहिए। उनके यहाँ तग़ज्जुल अपनी तमाम नर्मी के साथ मौजूद है, मगर वह सतही रूमानियत में नहीं बदलता। इश्क़ उनके यहाँ तजुर्बा भी है और तज़किया भी।
उनकी ग़ज़लों में जो संजीदगी मिलती है, वह बनावटी नहीं बल्कि जिए हुए एहसास की देन है। विरह, इंतज़ार, रंज, और उम्मीद ये सब जज़्बात उनके यहाँ एक पाकीज़ा लहजे में ढलते हैं। यही वजह है कि उनके शेरों में शिकायत भी हो तो वह तहज़ीब से बाहर नहीं जाती।
मिसाल के तौर पर
“मुस्कुरा दीजिए ग़म बहल जाएँगे
देखिए प्यार से अश्क ढल जाएँगे।”
यह शेर महज़ दिलासा नहीं, बल्कि मुहब्बत की तासीर का बयान है। यहाँ मुस्कान इलाज है और नज़र मरहम। सादगी अपनी जगह, असर अपनी जगह।
तसव्वुफ़ और रूहानी रंग
‘सोज़’ की शायरी में तसव्वुफ़ की एक महीन रेखा साफ़ दिखाई देती है। उनके यहाँ इश्क़ सिर्फ़ महबूब तक महदूद नहीं रहता, बल्कि एक बुलंदी की तरफ़ इशारा करता है।
“ताव-ए-नज़र नहीं है कि तुझे देख सकूँ”
यहाँ ‘ताव-ए-नज़र’ की कमी इंसानी हदबंदी का इज़हार है। यह मिसरा रूहानी तड़प का आईना भी बन जाता है। इश्क़ की यह शिद्दत, जो निगाह को भी झुका दे, दरअसल उसी सूफ़ियाना एहसास की तरफ़ इशारा करती है जहाँ आशिक़ अपनी हैसियत पहचानता है।
उनके यहाँ सब्र की रवायत भी गहरी है:
“न अब शिकायत करेंगे, दर्द को चुपचाप सह लेंगे”
यह अंदाज़ उर्दू ग़ज़ल की उस पुरवक़ार परंपरा का हिस्सा है जहाँ शायर अपने जज़्बात को चीख़ में नहीं, शऊर में ढालता है।
फ़िक्र, फ़लसफ़ा और इंसानी तजुर्बा
‘सोज़’ की शायरी महज़ इश्क़ की दास्तान नहीं। उसमें ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव, आदमी की बेचैनी, वक़्त की बेरुख़ी और हालात की गर्द भी शामिल है।
उनके कुछ अशआर में एक फ़लसफ़ियाना रंग झलकता है जहाँ इंसान अपनी हालत का मुहासिब बन जाता है। वह यह समझते हैं कि दर्द भी तर्बियत देता है और जुदाई भी इरफ़ान का ज़रिया बन सकती है।
उनकी ज़बान में सादगी है, मगर मआनी में गहराई। यही बात उन्हें उन शायरों की क़तार में ला खड़ा करती है जो अल्फ़ाज़ की नुमाइश नहीं करते, बल्कि एहसास की तामीर करते हैं।
शिल्प और बयान की ख़ासियत
फ़नी एतिबार से देखें तो ‘सोज़’ की ग़ज़लें बहर की पाबंद, क़ाफ़िया-रदीफ़ की हिफ़ाज़त करने वाली और रवायती इमेजरी से आरास्ता हैं। मगर वह अलंकार की भरमार से बचते हैं।
उनकी शायरी में रवानी है। मिसरे एक-दूसरे में ऐसे ढलते हैं जैसे पानी की धारा। भाषा सरल उर्दू है न ज़रूरत से ज़्यादा फ़ारसीपन, न बेवजह की कठिनाई। यही सादगी उनके कलाम को आम क़ारी तक पहुँचाती है।
उनकी ग़ज़लों में जो रंग है, वह उन्हें अलग पहचान देता है। यह वह कैफ़ियत है जिसमें दर्द भी नर्म हो जाता है और शिकवा भी दुआ में बदल जाता है।
अदबी एतिबार और दस्तयाबी का मसला
यह एक अदबी विडंबना है कि ‘सोज़’ का मुकम्मल उर्दू दीवान किताब की शक्ल में दस्तयाब नहीं। नागरी लिपि में उनका ‘इंतिख़ाब’ ज़रूर सामने आया ।
यह हालत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कितने ऐसे शायर हैं जिनका कलाम महफ़िलों में सराहा गया, मगर दस्तावेज़ की शक्ल न पा सका। ‘सोज़’ का नाम भी उन्हीं में शामिल है।
कृष्ण कुमार चतुर्वेदी ‘सोज़’ बदायूँनी उर्दू अदब की उस रवायत के प्रतिनिधि शायर हैं जहाँ तहज़ीब, तग़ज्जुल और तसव्वुफ़ एक-दूसरे से जुदा नहीं। उनकी शायरी यह साबित करती है कि उर्दू ज़बान का दामन कितना वसीअ है—कि उसमें हर एहसास, हर तबक़ा और हर पहचान समा सकती है।
उनका कलाम शोर नहीं करता, मगर दिल में उतरता है। वह लफ़्ज़ों की बाज़ीगरी नहीं दिखाते, बल्कि एहसास की शफ़्फ़ाफ़ियत पर भरोसा करते हैं।
और शायद यही किसी भी सच्चे शायर की पहचान है।

