मोहम्मद हनीफ 'शमीम' बीकानेरी: सादगी और एहसास के शायर की मुकम्मल पहचान
इमरोज़ नदीम

RNE Special.
उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो महज़ अपने कलाम की वजह से नहीं, बल्कि अपने रवैये, अपनी फ़िक्र और अपनी शायरी के मिज़ाज की वजह से एक मुकम्मल पहचान बनाते हैं। मोहम्मद हनीफ ‘शमीम’ बीकानेरी साहब भी उन्हीं साबित-कदम शायरों में शुमार होते थे, जिनकी शायरी में रवायत की जड़ें भी थीं और अस्र-ए-हाज़िर की आहट भी साफ़ तौर पर महसूस की जाती थी। वह उन शायरों में से थे जिन्होंने ग़ज़ल को महज़ इश्क़-ओ-आशिकी के दायरे तक महदूद नहीं रहने दिया, बल्कि उसे इंसानी ज़िंदगी, उसके दर्द, उसके तजुर्बे और उसके ज़मीर की आवाज़ बना दिया।

‘शमीम’ बीकानेरी की ग़ज़लियात का मुतालआ करते हुए यह एहसास बख़ूबी होता है कि वह शायरी को महज़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं समझते थे, बल्कि इसे एक ज़िम्मेदार फ़न के तौर पर बरतते थे। उनके यहाँ ग़ज़ल, खुद-शनासी का ज़रिया बनती थी । एक ऐसा आईना जिसमें इंसान अपने अंदर की दुनिया से रू-ब-रू होता था। यही वजह थी कि उनकी शायरी में तसव्वुराती उड़ान के बजाय एहसास की सच्चाई, जज़्बात की गहराई और तजुर्बे की तपिश ज़्यादा वाज़ेह तौर पर सामने आती है।
शमीम साहब की शायरी का एक अहम पहलू यह था कि वह रवायत से जुड़े रहकर भी जड़ता का शिकार नहीं होते थे। वह क्लासिकी उसूलों बहर, क़ाफ़िया, रदीफ़ और लफ़्ज़ियात की पासदारी करते हुए नए तजुर्बों को भी जगह देते थे। उनकी ग़ज़लों में जो “तुम” मौजूद था, वह महज़ एक माशूक़ नहीं बल्कि एक फ़िक्र, एक तलब, एक रूहानी कशिश और कभी-कभी एक इन्सानी आदर्श की शक्ल में उभरता था। इस तरह उनकी शायरी इश्क़ को महज़ जज़्बाती इज़हार से निकालकर एक वसीअ इन्सानी तजुर्बे में तब्दील कर देती थी।
अगर उनके अशआर पर गौर किया जाए तो यह बात साफ़ होती थी कि वह पेचीदा बयानी के क़ायल नहीं थे। उनका अंदाज़ सीधा, शाइस्ता और असरदार था मगर इस सादगी में भी एक गहरी तहदारी मौजूद थी। वह बात को घुमा-फिराकर कहने के बजाय सीधे दिल में उतारने का हुनर रखते थे। यही वजह थी कि उनके कलाम में एक तरफ़ रवानी थी तो दूसरी तरफ़ फ़िक्र की पुख़्तगी, और यही तवाज़ुन उनके फ़न को एक मुनफ़रिद पहचान देता था।
शमीम साहब का तअल्लुक़ बीकानेर की उस अदबी सरज़मीन से था जहाँ शायरी महज़ तफ़रीह का ज़रिया नहीं बल्कि ज़िंदगी को समझने और समझाने का वसीला रही थी। बीकानेर की तहज़ीबी रवायतें शराफ़त, सादगी, अदबी लहजा और इंसानी क़द्रों की पासदारी उनके मिज़ाज और उनकी शायरी में साफ़ झलकती थीं। वह अपने शहर की उसी तहज़ीबी रूह के अमीन थे, जिसने हमेशा अदब को इज़्ज़त और शायर को वक़ार अता किया।

शमीम साहब की शायरी का एक और अहम पहलू उनके अशआर में मौजूद ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों का बयान था। उनके यहाँ महज़ तसव्वुर नहीं, बल्कि ज़िंदगी के तपते हुए तजुर्बे बोलते थे। वह अपने दौर की बे-रुख़ी, इंसानी रिश्तों की कमज़ोरी, समाजी बे-हिसी और गिरते हुए अख़लाक़ी मयार को बड़े सलीके और सादगी के साथ पेश करते थे।
“माना कि मुझ से आप का रिश्ता कोई न था
पर इस तरह मिरे लिये तड़पा कोई न था”
इस शे’र में जज़्बात की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी। शमीम साहब इश्क़ को किसी बनावटी रंग में नहीं रंगते थे, बल्कि उसे उसकी अस्ल हालत में पेश करते थे जहाँ तकलीफ़ भी थी, सच्चाई भी और एक ख़ामोश एहतिजाज भी।
“सर पर ग़मों की धूप थी, साया कोई न था”
यह मिसरा दरअस्ल पूरी ज़िंदगी का इस्तिआरा
बन जाता है। “धूप” यहाँ महज़ ग़म नहीं बल्कि वो तमाम मुश्किलात थीं जो इंसान को अकेले झेलनी पड़ती थीं, और “साया” उस सहारे की तरफ़ इशारा था जो अक्सर नसीब नहीं होता था।
“बस्ती में साँस लेने को लेते थे सब मगर
जिसका ज़मीर ज़िंदा हो ऐसा कोई न था”

यह शे’र समाजी शऊर का आईना था। शमीम साहब यहाँ सिर्फ़ शिकायत नहीं करते थे, बल्कि इंसानी ज़मीर को झकझोरते थे कि ज़िंदगी महज़ साँस लेने का नाम नहीं, बल्कि एक ज़िंदा एहसास का नाम है।
“इस शहर में तो मेरा शनासा कोई न था”
यह मिसरा उस अजनबीयत का बयान था जो आज के दौर का सबसे बड़ा सच बन चुकी है—जहाँ इंसान भीड़ में रहकर भी तन्हा है।
“अब तो लगे हैं वहशत में हैवानों को भी शर्माने लोग”
यहाँ वह इंसान के गिरते हुए अख़लाक़ी मयार पर एक सख़्त और गहरा तंज़ करते थे।
“आप से दो दिन की यारी पर, कैसे मैं विश्वास करूँ
तोड़ लिया करते हैं पल में बरसों के याराने लोग”
यह शे’र रिश्तों की नापायदारी का सादा मगर बेहद असरदार बयान था एक ऐसा बयान जो हर दौर के इंसान को अपनी तरफ़ मुतवज्जह करता है।
शमीम साहब की शायरी का एक और बेहद दिलनशीं पहलू उनकी नज़ाकत-ए-अहसास था। उनके यहाँ जज़्बात की पेशकश में एक लतीफ़ नरमी, एक अंदरूनी कशिश और एक ख़ामोश दर्द मौजूद था। उनकी वह ग़ज़ल, जिसमें “कहीं” की रदीफ़ आती थी, दरअसल इंसानी दिल की नाज़ुकी और एहसास की हिफ़ाज़त का बयान थी।
“दिल का शीशा बहुत ही नाज़ुक है
रेज़ा-रेज़ा बिखर न जाये कहीं”
“डर है, अब तेरी याद का खंजर
मेरे दिल में उतर न जाये कहीं”
“इश्क़ तेरे दर्द के न होने से
मेरा एहसास मर न जाये कहीं”
“ज़िंदा रहने के शौक़ में साहब
आँख का पानी मर न जाये कहीं”
“ऐ ‘शमीम’ इक हवा के झोंके से
ज़ुल्फ़ उस की बिखर न जाये कहीं”
इन अशआर में एहसास की नर्मी, दर्द की शिद्दत और फ़िक्र की गहराई एक साथ दिखाई देती थी। यह वही शायरी थी जो दिल को छूती ही नहीं, बल्कि उसे सोचने पर भी मजबूर करती थी।
शमीम साहब की शख़्सियत को समझने के लिए उनके अदबी सिलसिले का ज़िक्र भी बेहद ज़रूरी था। उनके उस्ताद मरहूम मस्तान बीकानेरी साहब थे और शमीम साहब को उनके जां-नशीन के तौर पर जाना जाता था। यह जां-नशीनी महज़ एक अदबी रस्म नहीं थी, बल्कि एक तहज़ीबी और अख़लाक़ी विरासत की अमानत थी। मरहूम दीन मोहम्मद मस्तान बीकानेरी साहब बेहतरीन बा कमाल शायर थे और यही खूबी शमीम साहब की शख़्सियत में भी पूरी शिद्दत के साथ दिखाई देती थी।
शमीम साहब ने अपने उस्ताद की रवायत को महज़ बरक़रार नहीं रखा, बल्कि उसे अपने दौर के एहसास, अपने तजुर्बे और अपनी फ़िक्र के साथ वसीअ भी किया। यही वजह थी कि उनकी शायरी में क्लासिकी रंग भी था और जदीद एहसास की चमक भी।
उनकी किताब “गुलाब रेत पर” के इब्तिदाई बयानात से यह भी मालूम होता था कि उनकी शायरी एक तवील मश्क़, गहरे मुतालआ और ज़ाती तजुर्बों की पैदावार थी।
अगर शमीम साहब की शायरी का मुकम्मल जायज़ा लिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि वह उन शायरों में से थे जिन्होंने सादगी को अपनी ताक़त बनाया और एहसास को अपनी शायरी की रूह। उन्होंने न तो लफ़्ज़ों की नुमाइश की और न ही पेचीदा इस्तिआरों का सहारा लिया, बल्कि सीधे और सच्चे अल्फ़ाज़ में वह बात कह दी जो दिल से निकलकर सीधे दिल तक पहुँचती थी।
शमीम साहब की शायरी में इंसान, उसका दर्द, उसके रिश्ते, उसकी तन्हाई और उसका ज़मीर सब कुछ एक सच्चाई के साथ मौजूद था। यही वजह थी कि उनका कलाम महज़ पढ़ा नहीं जाता , बल्कि महसूस किया जाता है।
उर्दू अदब में शमीम साहब का मुकाम एक ऐसे शायर का है जो रवायत से जुड़ा हुआ भी और अपने दौर की नब्ज़ पर हाथ रखे हुए भी। उनकी शायरी आने वाले वक़्त में भी अपनी सादगी, सच्चाई और असर की वजह से ज़िंदा रहेगी और यही किसी भी सच्चे शायर की अस्ल कामयाबी होती है।

