अधिकतर दुपहिया व तिपहिया वाहनों के चालक बिना लाइसेंसधारी, तिपहिया वाहनों को चलाने वालों में अधिक है ऐसे लोग
परिवहन विभाग व पुलिस की सख्ती होना जरूरी
लापरवाही से हादसों को मिल रहा न्यौता
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
आनंद निकेतन में एक बार तत्कालीन आईजी पुलिस ने बीकानेर की ट्रैफिक व्यवस्था के सुधार पर मंथन के लिए बैठक बुलाई। वे ट्रैफिक की अव्यवस्था को लेकर चिंतित थे और उसमें सुधार चाहते थे। ये पुलिस अधिकारी थे लक्ष्मण मीणा।

अपनी पहल से उन्होंने बैठक बुलाई। जिसमें व्यापारी, सामाजिक संस्थाओ के लोग, टैक्सी यूनियन के लोग, कर्मचारी नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार आदि शामिल थे। इन सबसे ट्रैफिक में सुधार के सुझाव मांगे गये। उस बैठक का मैं भी साक्षी था।
जाहिर है, ट्रैफिक में सुधार तभी सम्भव है जब सड़कें चौड़ी हो। लोग या दुकानदार उस पर अतिक्रमण न करे। प्रशासन यदि सख्ती से अतिक्रमण हटाये तो राजनेता दखलंदाजी न करे। इस तरह की बातों के चलते वो अच्छे ध्येय के लिए बुलाई गई बैठक पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गई। हारकर पुलिस अधिकारी को यह कहते हुए बैठक को बीच में समाप्त करना पड़ा कि भगवान ही इस शहर के ट्रैफिक का मालिक है, वही इसे सुधार सकता है।
सड़क पिताजी की नहीं...
इस मामले में एक आंखों देखा दृश्य भी उल्लेखित करना उचित रहेगा। शहर का ह्रदय स्थल कोटगेट। गेट के बाहर ट्रैफिक की गुमटी। गुमटी पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का सिपाही। अपने हाथों से इशारे करते हुए ट्रैफिक को संचालित कर रहा था। वहां ट्रैफिक की लाइट्स तो लगी हुई नहीं थी।

शहर के भीतर से स्कूटर पर एक सवार व्यक्ति आये। सिपाही ने हाथ के इशारे से उधर ट्रैफिक रोका हुआ था। मगर वे सिपाही के हाथ के नीचे से स्कूटर निकाल कर ले गए। आगे जाते ही साईकिल से टकरा गए। साईकिल का नुकसान हुआ और चलाने वाले को मामूली चोट लगी। सिपाही दौड़कर गया और स्कूटर चालक को कहा कि मैने हाथ से रुकने का इशारा किया हुआ था, आप रुके ही नहीं।
वो सवार बोला -- क्यों रुकता, सड़क किसी के बाप की नहीं, हमारी है।
ये एक दृश्य ही ट्रैफिक की पूरी कहानी कह देता है।
कितनों के पास है लाइसेंस ?
बीकानेर में थोक के भाव में तिपहिया वाहन यानी टैक्सियां चलती है। कई लोग तो ऐसे है जो पहले हाथ गाड़ा चलाते थे और अब टैक्सियां चलाने लगे है।
इन टैक्सियों के चालकों के लाइसेंस की जांच न तो परिवहन विभाग करता है और न ट्रैफिक पुलिस। यदि एक सघन अभियान चलाकर टैक्सी चालकों के लाइसेंस की जांच की जाए तो चोंकाने वाला तथ्य सामने आयेगा। बीकानेर B -2 शहर है, शायद यह बात परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस को पता ही नहीं है। अगर पता होता तो टाइम बार्ड यानी अवधि पार टैक्सियां फर्राटे से सड़क पर दौड़ती और मौत को निमंत्रण देती नहीं दिखती। ये जांच भी प्रदूषण के खतरे से शहर को बचाने के लिए की जानी आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।

ट्रैफिक पुलिस तो केवल हेलमेट न लगाने वालों को पकड़ उनका चालान काटना ही अपनी ड्यूटी समझती है। यह काम वो करे, गलत नहीं है। मगर टैक्सियों के चालकों के लाइसेंस, टैक्सियों की अवधि पार सीमा भी चेक करे। जन हित मे यह किया जाना जरूरी है।
नाबालिग भी चला रहे वाहन:
शहर के मुख्य मार्गों पर दुपहिया, तिपहिया और कार तक नाबालिग चलाते हुए दिख जाएंगे। जब ये आम आदमी को दिखते है तो परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस को क्यों नही दिखते। अगर इस मामले में ट्रैफिक पुलिस व परिवहन विभाग ने सख्ती नहीं बरती तो किसी दिन बड़ा हादसा भी हो सकता है। उस समय प्रशासन के पास देने के लिए जवाब नहीं होगा। क्योंकि लोगों को मौत के सामने धकेलने का काम ये लापरवाही ही तो करेगी। ऐसे हादसे कई बार हुए भी है।

सख्ती बिना सुधार नहीं:
इस विकराल समस्या को दूर करने के लिए परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस को अतिरिक्त सख्त होना ही पड़ेगा। उनको कमजोर करने का काम राजनेता करते है। तुरंत फोन कर वे बिना लाइसेंस, बिना हेलमेट वाले को छोड़ने का कहते है। इसका एकमात्र उपाय यही है कि पकड़ते ही चालान काट दिया जाये। उसके बाद कोई सिफारिशी फोन सुना जाये। ये सख्ती करके वे बीकानेर की जनता का भला करेंगे। जन हित के सामने नेताओं के हित को तिलांजलि देनी ही होगी। नये पुलिस अधीक्षक से ये अपेक्षा जनता करती है तो अनुचित भी नहीं।

