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सरेराह वाहन चालक कान से मोबाईल लगाये रहते है, ट्रैफिक पुलिस को सख्त होना ही पड़ेगा

दुर्घटना के बाद भी लोग सचेत नहीं तो, अब सख्ती ही रास्ता
सघन अभियान चलाकर ही इस बीमारी को रोका जा सकेगा
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

दृश्य 1:: चौधरी भीमसेन सर्किल। बस स्टैंड की तरफ से आता हुआ एक बाइक सवार। एक दूसरा बुजुर्ग स्कूटी पर। वो गजनेर रोड की तरफ से आता हुआ और आकाशवाणी की तरफ जाता हुआ। अचानक से चौराहे पर स्कूटी के टक्कर लगती है और बुजुर्ग गिर जाता है। बस स्टैंड की तरफ से जो बाइक सवार आ रहा था वो मोबाइल को कान से लगाये बात कर रहा था और स्कूटी के टक्कर दे मारी। बुजुर्ग चोटिल हुआ। लोग उसे अस्पताल की तरफ ले गए। बाइक सवार गायब। गनीमत है उस वक्त वहां कोई भारी वाहन नहीं गुजर रहा था। नहीं तो...। थोड़ी दूर ट्रैफिक पाइंट। मगर बाइक सवार गायब।
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दृश्य 2:: अंबेडकर सर्किल। एक कार कचहरी की तरफ से आ रही थी। पीबीएम की तरफ जा रही थी। एक बाइक पुलिया की तरफ से आ रही थी और कचहरी की तरफ जा रही थी। कार की टक्कर बाइक को लगी। सवार गिरा। लोग एकत्रित हुए। कार  चालक भी मोबाइल पर बात करते हुए कार चला रहा था तो बाइक सवार के कान पर भी मोबाइल लगा था। 
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इस तरह के दृश्य दिन में अनेक बार गोगा गेट, कोटगेट, रेलवे स्टेशन, बड़ा बाजार, म्यूजियम सर्किल आदि पर रोज देखने को मिल जाएंगे। न तो लोग सचेत हो रहे है और न ट्रैफिक पुलिस सख्त हो रही है। नुकसान आम आदमी का हो रहा है।

हो गई पीर पर्वत सी ....


' हो गई है पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए '।  दिवंगत शायर दुष्यंत का यह शेर जब जब पीड़ा हद को पार करती है, तब तब बरबस ही जुबान पर आ जाता है। पीड़ा केवल उसकी नहीं होती जो भुगतता है, पीड़ा उसकी भी होती है जो संवेदनशील होता है। 
 

उस संवेदनशील इंसान को इस बात की तकलीफ होती है कि आदमी धीरे धीरे एक नुकसान की खाई के मुहाने तक पहुंच रहा है। उसे चिंता इस बात की रहती है कि कहीं वो खाई में गिर न जाये। उसका अहित न हो जाये। इस तरह के संवेदनशील इंसानों की वजह से ही तो आज इंसानियत जिंदा है। उनकी संवेदना को यदि सम्मान नहीं मिला तो बहुत बड़ा नुकसान होगा। सरेआम संवेदना की हत्या होगी और इंसान इंसानियत विहीन होकर पत्थर की मूरत बन जायेगा। इंसानियत को जिंदा रखना समाज, सत्ता व व्यवस्था, तीनों की बड़ी जिम्मेदारी है। इन तीनों को जिम्मेदार बनना ही होगा, तभी तो समाज बचेगा, आदमी बचेगा।

ट्रैफिक पुलिस सख्त हो:

इन दुर्घटनाओं को रोकने का काम केवल ट्रैफिक पुलिस ही कर सकती है। उसकी सख्ती के बिना ये बदतमीज सुधरेंगे नही। इनको न अपनी जान की परवाह है और न किसी दूसरे की जान की चिंता है। वाहन चलाते समय मोबाइल न चलाने के लिए लोगों को जागरूक करने का प्रचार प्रचूर मात्रा में पुलिस विभाग करता है। मगर लोगों पर असर ही नहीं हो रहा।

 

अब उपाय सख्ती का ही शेष रह गया है। ट्रैफिक पुलिस को न केवल बड़ा जुर्माना मोबाइल चलाने वाले वाहन चालकों पर करना होगा अपितु उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही भी करनी होगी।
 

मुझे उदयपुर का एक वाकिया याद है। जहां मोबाइल से बात करते हुए एक कार चालक को ट्रैफिक के सिपाही ने रोका। उसने रुतबे का रौब दिखाने की कोशिश की। मगर उस सिपाही ने उस सूटेड बुटेड को कार से नीचे उतरने को मजबूर किया और चेतक सर्किल का पैदल एक चक्कर लगाकर आने को कहा। ये बड़ा अपमान था। लोग उसे देख मुस्कुरा रहे थे।
 

इसी तरह बीकानेर में भी नियम तोड़ने वालों के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए ताकि वे जिल्लत के कारण फिर कभी गलती न करे। ट्रैफिक पुलिस को सख्त तो होना पड़ेगा।

सिफारिशों को नजरअंदाज करें:

बीकानेर में अक्सर देखा जाता है कि बिना हेलमेट वाहन चलाने, रोंग साइड वाहन चलाने, मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाने पर जैसे ही ट्रैफिक पुलिस रोकती है और कार्यवाही की कोशिश करती है। किसी नेता का फोन आ जाता है। या अन्य किसी प्रभावशाली व्यक्ति का फोन आ जाता है। मजबूर होकर उस गलती करने वाले वाहन चालक को छोड़ना पड़ता है।

 

ट्रैफिक पुलिस को इस तरह की सिफारिशों को नजरअंदाज करना होगा। तभी वो लोगों की रक्षा कर सकेगी। नेताओं व प्रभावशाली लोगों को भी अपने परिचितों की जान की रक्षा करने के लिए इस तरह की सिफारिशें करने से परहेज करनी होगी। 

सघन अभियान जरूरी:

मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाने वालों के खिलाफ पुलिस व ट्रैफिक पुलिस को सघन अभियान चलाना चाहिए। जिसमें सख्त तो रहें, साथ मे यह भी सुनिश्चित करे कि कोई सिफारिश नहीं मानी जायेगी। कड़ी कार्यवाही करे। बीकानेर की जनता के हित की, जान माल की रक्षा करने में तभी पुलिस सफल हो सकेगी।

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