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निसार अहमद बेंस: फकीरी मिजाज और रूहानी शख्सियत का अनोखा सफर

 

इमरोज़ नदीम

RNE Special.

निसार अहमद बेंस “अनजान बीकानेरी” का नाम लेते ही एक ऐसे शख्स का तसव्वुर उभरता है जिसकी ज़िंदगी सिर्फ अल्फ़ाज़ की नहीं थी, बल्कि एक जिंदा एहसास, एक सादा फिक्र और एक रूहानी सफ़र का नाम थी। आप का जन्म 4 मई 1953 को कायमखानी खानदान में हुआ, लेकिन आपकी पहचान सिर्फ नस्ल या खानदान से नहीं, बल्कि इल्म, अदब और इंसानियत से बनी।

आपकी शख्सियत का सबसे रोशन पहलू यह था कि आपने इल्म को सरहदों में क़ैद नहीं किया। अरबी, फ़ारसी और उर्दू पर आपकी मजबूत पकड़ थी ही, मगर संस्कृत और हिंदी से भी आपकी गहरी वाबस्तगी थी। यह वुसअत ए नजर ही थी जिसने आपकी शायरी और सोच को एक अलग ही रंग अता किया। आपकी ग़ज़लों में सिर्फ लफ्ज़ों की नफ़ासत नहीं, बल्कि तहजीबों का संगम और रूहानी गहराई भी महसूस होती है।
 

ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली और बीकानेर से आपकी रचनाओं का प्रसारण होना इस बात की गवाही है कि आपकी आवाज़ सिर्फ महफ़िलों तक महदूद नहीं रही, बल्कि दूर तक फैली और दिलों में उतरती चली गई। “हादसाते  हयात” के उनवान से आपका जो ग़ज़लों का मजमूआ सामने आया, जिसमें 151 ग़ज़लें शामिल हैं, वह दरअसल आपकी जिंदगी के तजुर्बात, दर्द, मोहब्बत और फिक्र का आईना है। विस्मित करने वाली बात ये थी कि आपके घर की प्रिंटिंग प्रेस रोशन प्रिंटिंग प्रेस के नाम से है अगर आपको छपने का शौक़ होता तो रिकॉर्ड तादात में आपकी किताबें शाया हो सकती थी लेकिन सच्ची  फ़क़ीरी के कायल अनजान साहब ने अपने उपनाम को साबित किया । आप सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि समाजी और सांगठनिक सरगर्मियों में भी आपकी बराबर की शिरकत रही। मुशायरों और काव्य सम्मेलनों में आपकी मौजूदगी महज़ रस्म अदायगी नहीं होती थी, बल्कि हर बार आप अपने लफ्ज़ों से एक नई रूह फूंक देते थे। आपकी गुफ्तगू में नर्मी थी, अंदाज में सादगी और फिक्र में गहराई।
लेकिन अगर आपकी शख्सियत का सबसे दिलनशीन पहलू तलाश किया जाए, तो वह आपकी सूफियाना फितरत और फकीरी मिजाज था। आप सचमुच एक दरवेश इंसान थे। आपने फकीरी को सिर्फ कहा नहीं, बल्कि जिया। आपके लिए फकीरी महज फटे कपड़ों या तन्हाई का नाम नहीं था, बल्कि दिल की दौलत, इंसान से मोहब्बत और खुदा से गहरा रिश्ता था।

 

आपका लिबास भी आपकी सादगी की मिसाल था। सादा कमीज और पाजामा आपकी पहचान बन चुके थे। मगर इस सादगी के पीछे एक ऐसा दिल था जो हमेशा दूसरों के लिए धड़कता था। आपकी कमीज की जेब में अक्सर चॉकलेट या ड्राई फ्रूट्स हुआ करते, जिन्हें आप बड़े प्यार से छोटे बच्चों में बांट देते थे। यह छोटा सा अमल दरअसल आपके बड़े दिल का इजहार था।यही सादगी और यही दर्द उनकी शायरी में भी पूरी शिद्दत के साथ उतरता है। “हादसाते-हयात” के सफ्हों पर बिखरे उनके अशआर पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है जैसे हर लफ्ज़ किसी अंदरूनी टूटन की गवाही दे रहा हो, मगर उसी टूटन से एक नई ताकत भी जन्म ले रही हो।
वो कहते हैं

“पहले-पहल जो पाँव उठा राहबर हुआ,
थोड़ी जो दूर साथ चला हमसफ़र हुआ।”

यह शेर सिर्फ सफर का बयान नहीं, बल्कि रिश्तों की सच्चाई का खुलासा है। कौन कब तक साथ चलता है, और कब तन्हाई इंसान का मुकद्दर बन जाती है अनजान साहब इसे बहुत सादगी से बयान कर जाते हैं।

फिर उनके यहाँ समाज की खामोशी पर एक दर्द भरा सवाल भी मिलता है

“सन्नाटा मौत का सा क्यों पसरा है शहर में,
दरपेश ऐसा हादसा कब पेशतर हुआ?”

यह सवाल दरअसल हम सब से है। हमारी खामोशी, हमारी बेपरवाही और हमारे अंदर के मरते हुए एहसासात पर एक गहरी चोट है।
और फिर एक जगह उनका हौसला, उनका यकीन यूँ झलकता है

“मैं मुर्दों में इक ज़िंदगी फूँक दूँगा,
मैं कमजोर हाथों को बख्शूँगा ताक़त।”

यह महज़ अल्फाज़ नहीं, बल्कि एक रूहानी एतबार है एक फकीर का यकीन, जो खुद टूटकर भी दूसरों को सहारा देने का हौसला रखता है।
 

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उनके कुछ और अशआर जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद सादगी और गहराई के साथ बयान करते हैं। वो शहर और गाँव, भीड़ और तन्हाई, सज़ा और पनाह इन तमाम तजुर्बों के बीच इंसान की तलाश को यूँ बयान करते हैं

“महफ़ूज़ मंज़िलों से कई राहों में ज़िंदगी,
हो ही न बीत जाए पहाड़ों में ज़िंदगी।

हर-हर क़दम पे हादसे होते हैं शहर में,
महफ़ूज़ होगी शायद गाँवों में ज़िंदगी।”

यहाँ एक अजीब सी कशमकश है तरक्की के नाम पर बढ़ते शहर और उनमें खोती हुई ज़िंदगी, और दूसरी तरफ़ गाँवों की सादगी में छुपी हुई एक राहत की उम्मीद। अनजान साहब इस फर्क को सिर्फ बयान नहीं करते, बल्कि महसूस करवाते हैं।

“मैं चल पड़ा हूँ घर से किसी को तलाशने,
अब तक बिता रहे हैं ख़लाओं में ज़िंदगी।”

यह शेर सिर्फ किसी इंसान की तलाश नहीं, बल्कि अपने ही वजूद, अपनी ही पहचान की तलाश का इज़हार है एक ऐसा सफर जो खत्म नहीं होता।

“कल जो बुलंदियों के सतह आसमां में थे,
अब वो बिता रहे हैं गुफ़ाओं में ज़िंदगी।”

यह सिर्फ हालात का उलटफेर नहीं, बल्कि वक्त की बेवफाई और इंसान की बेबसी का सच्चा बयान है।

“सरज़द कोई गुनाह हुआ ही नहीं मगर,
क्यों बसर हो रही है सज़ाओं में ज़िंदगी?”

यहाँ शायर सिर्फ अपना दुख नहीं कह रहा, बल्कि पूरे समाज की उस हालत की तरफ इशारा कर रहा है जहाँ बेगुनाही भी सज़ा बन जाती है।

“तुम चाहो तो सुकून दिलों को जहाँ मिले,
ले जाऊँगा अपनी पनाहों में ज़िंदगी।”

यह शेर उनके सूफियाना मिजाज का आईना है जहाँ वह खुद को एक ऐसी पनाह के तौर पर पेश करते हैं जो थके हुए दिलों को सुकून दे सके।

“होंठों पे गीत है न तरन्नुम है साँसों में,
‘अनजान’ बीत जाए न आहों में ज़िंदगी।”

यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि एक डर भी है कि कहीं जिंदगी यूँ ही आहों में न गुजर जाए।
इसी एहसास की एक और परत उनके उन अशआर में खुलती है, जहाँ जिंदगी, मोहब्बत, जुदाई और वक्त की बेदर्दी एक साथ दस्तक देती है

“देर तक आज ज़िक्र-ए-यार चले,
तीर इस दिल के आर-पार चले।”

यह महज़ याद का बयान नहीं, बल्कि उस याद की शिद्दत है जो इंसान को अंदर तक जख्मी कर देती है।

“चार दिन उम्र के गुज़ार चले,
शोर बरपा हुआ ‘निसार’ चले।”

जिंदगी की यह चार दिन की हकीकत और उसमें उठता हुआ शोर इंसान की बेबसी का एक मुकम्मल मंज़र पेश करता है।

“उसका क्या दिल पे इख्तियार चले,
जिस पे शाम-ओ-सहर ऐतबार चले।”

यहाँ दिल की मजबूरी और यकीन की कशमकश दोनों साथ दिखाई देती हैं।

“पास जो कुछ था वक़्फ़ कर डाला,
है सफर लंबा, किससे यार चले।”

यह शेर उस तन्हाई का बयान है जो सब कुछ दे देने के बाद भी इंसान के साथ रह जाती है।

“तेरी रहमत को कब गवारा है,
सर झुकाये गुनहगार चले।”

यहाँ एक सूफियाना सच्चाई है इंसान अपनी खामियों के साथ भी उसी रहमत की तरफ बढ़ता है।

“उम्र-ए-रफ्ता की याद आती है,
सिर्फ धुन थी कि रोज़गार चले।”

यह गुजरे वक्त की कसक और जिंदगी की भागदौड़ का दर्द है।

“मेरे मरने पे जश्न मत रोको,
दुनिया, दुनिया है, कारोबार चले।”

यहाँ उनकी फकीराना बेनियाज़ी अपने पूरे रंग में नजर आती है।

“दावर-ए-हश्र ने पुकारा जब,
हम ही ‘अनजान’ खुशगवार चले।”

यह शेर एक मुकम्मल सफर का इख्तिताम भी है और एक रूहानी इत्मीनान का इजहार भी।
 

निसार अहमद बेंस “अनजान बीकानेरी” दरअसल उन लोगों में से थे जो अपने पीछे सिर्फ किताबें नहीं छोड़ते, बल्कि एक एहसास छोड़ जाते हैं एक ऐसा एहसास जो वक्त के साथ और गहरा होता जाता है। उनकी शायरी पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई खामोश आवाज़ हमें पुकार रही हो, हमें हमारी ही सच्चाई से रूबरू करा रही हो। आपकी बरसी पर बीकानेर से जयपुर  जा बसे खास दोस्त शायर रहमान रूहानी साहब फेसबुक पोस्ट के जरिए खिराजे अक़ीदत पेश करते है । 
 

आज जब हम उनके फन और शख्सियत को याद करते हैं, तो यह एहसास और भी मजबूत होता है कि ऐसे लोग अदब की दुनिया में सिर्फ नाम नहीं होते, बल्कि एक रोशनी होते हैं धीमी, मगर हमेशा रहने वाली।

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