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प्रेमसिंह कुमार की शायरी: सादगी, गहराई और इंसानियत की मिसाल

 

इमरोज़ नदीम 

RNE Special.
 

सुप्रसिद्ध शायर स्व. प्रेमसिंह कुमार ‘प्रेम’ की रचनाओं का मुतालिआ करते हुए सबसे पहले जो बात शिद्दत के साथ उभरकर सामने आती है, वह उनकी शायरी की सादगी, खालिसियत और गहराई है। वे उन फ़नकारों में से हैं जिन्होंने फ़ारसी और उर्दू अदब की रिवायतों से रौशनी हासिल की, लेकिन अपनी शायरी को महज़ तर्जुमानी  तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे अपने ज़ाती एहसासात और तजुर्बों की रौशनी में एक नई शक्ल अता की।

21 अक्टूबर 1913 को जन्मे प्रेमसिंह कुमार ‘प्रेम’ साहब ने न सिर्फ़ अदबी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई, बल्कि अपने पेशेवर जीवन में भी एक अहम मुकाम हासिल किया। 10 जुलाई 1979 को वह इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए, मगर अपनी शायरी और ख़िदमत के ज़रिये आज भी ज़िंदा हैं। शिक्षा विभाग राजस्थान में एक उच्च पदस्थ अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ देते हुए उन्होंने न सिर्फ़ तालीमी निज़ाम को मजबूती दी, बल्कि अदब की तरक्की में भी अहम किरदार अदा किया। उनके दौर में शिक्षा विभाग के प्रकाशनों के अंतर्गत अनेक कवियों और शायरों की रचनाओं को प्रकाशित करने में उनकी कोशिशें क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं यह उनकी अदबी सरपरस्ती और ज़ौक़-ए-अदब का जीता-जागता सबूत है।
 

‘प्रेम’ साहब  की शायरी में जहाँ एक तरफ़ सूफ़ियाना रंगत, रूहानियत और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की झलक मिलती है, वहीं दूसरी तरफ़ इंसानी रिश्तों की गर्माहट, ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयाँ और दौर-ए-हाज़िर की बेचैनियाँ भी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद हैं। यही वजह है कि उनकी ग़ज़लें और नज़्में किसी एक दायरे में क़ैद नहीं होतीं, बल्कि ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को अपने दामन में समेट लेती हैं।
 

उनकी शायरी का अंदाज़ बेहद सादा, लेकिन असरदार है। वह मुश्किल अल्फ़ाज़ या पेचीदा इस्तिआरों का सहारा लिए बग़ैर, सीधी और साफ़ ज़बान में दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाली बात कह देते हैं। यही सादगी उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।

‘प्रेम’ साहब का एक बड़ा इम्तियाज़ यह भी है कि उनकी शायरी में इंसानियत का दर्द, मजलूमों के लिए हमदर्दी और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का एहसास साफ़ दिखाई देता है। वह सिर्फ़ मोहब्बत के शायर नहीं, बल्कि एक सजग और जिम्मेदार इंसान के तौर पर भी नुमायां होते हैं 

प्रेम साहब के अशआर इस बात की गवाही देते हैं कि  ‘प्रेम’ साहब की शायरी महज़ जज़्बात की नुमाइश नहीं, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक आवाज़ भी है। उनकी शायरी में रोशनी की तलाश, उम्मीद की लौ और अँधेरे से लड़ने का हौसला भी बराबर मौजूद है 

रोशनी से हम नहीं महरूम रह सकते सदा
बढ़ रहा है साया-ए-तारीकी-ए-बातिल तो क्या

इसी तरह, उनकी शायरी में मोहब्बत एक पाक, सच्चा और रूहानी जज़्बा बनकर सामने आती है 

रौनक-ए-बज्म है अभी जिनके दम से
आदमियत के परिस्तार अभी बाकी हैं

‘प्रेम’ साहब की शायरी का एक अहम पहलू यह भी है कि वह ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों, तन्हाई, याद और दिल की कशमकश को बेहद सादगी से बयान करते हैं

बैठे बैठे ये किस की याद आ गई
बन गई बज्म मेरी तन्हाई
जज़्ब-ए-कामिल की थी कमी वरना
हुस्न बन जाता ख़ुद तमाशाई
रहना मुश्किल है छोड़ना मुश्किल
ज़िंदगी कैसे मोड़ पर लाई
याद है इब्तिदा-ए-दर्द मुझे
याद है तुझ से वो शनासाई
गुल हैं पर नम कली है पर-मुर्तब
सुन रहा हूँ मगर बहार आई
देने वाले तुझ पे न हरफ़ आए
मुझ को तो मुफ़लिसी भी रास आई
लाख समझाया दिल नहीं माना
होश में कब रहा ये सौदाई

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए

उन की जब बेरुख़ी सी लगती है
हर खुशी अजनबी सी लगती है
एक अफ़सुर्दगी सी लगती है
रोशनी तीरगी सी लगती है
हर जगह ख़ामोशी सी लगती है
ज़िंदगी थम गई सी लगती है
दिल की हरकत रुकी सी लगती है
हर घड़ी आख़िरी सी लगती है
वो निगाह जिससे दिल को दूर रखा
दिल में क्यूँ बस गई सी लगती है
हाल-ए-दिल जब ज़ुबाँ न कह पाये
आँसुओं की झड़ी सी लगती है

और जैसे खुद ‘प्रेम’ साहब अपने ही अंदाज़ में कहते हैं—

इस क़ुल्फ़त-ओ-रंज की धरती पर, क्यूँ ‘प्रेम’ परेशान होता है
सब अ़क़्दे हल हो सकते हैं, हर दर्द के दरमा होते हैं

दरअसल, ‘प्रेम’ साहब का असल कमाल यही है कि वह बड़े से बड़े फ़लसफ़े को भी आम ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों में ढाल देते हैं। उनकी शायरी में न बनावट है, न दिखावा बल्कि एक सच्चा और खालिस एहसास है, जो सीधे दिल तक पहुँचता है।

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