पं. मेला राम ‘वफ़ा’ - सादगी और असर की शायरी के संग-ए-मील
इमरोज़ नदीम

RNE Special.
उर्दू अदब की रिवायत अपने भीतर तहज़ीब, जज़्बात और फिक्र की वह गहराई समेटे हुए है, जिसमें ज़बान महज़ इज़हार का ज़रिया नहीं रहती, बल्कि एक मुकम्मल ज़हनी और रूहानी तजुर्बा बन जाती है। यह अदब अपने आग़ाज़ से ही इंसानी एहसासात की नुमाइंदगी करता आया है, कभी इश्क़ की नर्मी में डूबा हुआ, तो कभी समाजी नाइंसाफ़ियों के खिलाफ आवाज़ उठाता हुआ।
इसी रिवायत में पं. मेला राम ‘वफ़ा’ का नाम एक ऐसे शायर के तौर पर सामने आता है, जिन्होंने उर्दू शायरी को अपनी सादगी, असरअंदाज़ी और लफ्ज़ों की रवानी से मालामाल किया। उनका शायरी का अंदाज़ बनावटी तकल्लुफ़ से दूर और दिल की सीधी बात कहने वाला था। यही वजह है कि उनके अशआर आम आदमी के दिल में उतर जाते हैं और देर तक अपनी गूंज बनाए रखते हैं।

वफ़ा साहब की ज़िंदगी अपने आप में एक मुकम्मल दास्तान है, एक ऐसी दास्तान जिसमें तालीम, अदब, सियासत और सहाफ़त सब एक साथ चलती नज़र आती हैं। सियालकोट की सरज़मीन से उठकर उन्होंने जिस तरह उर्दू अदब में अपनी पहचान कायम की, वह उनके इल्मी ज़ौक़ और शायरी के फितरी हुनर का सबूत है। उन्होंने महज़ शायरी तक अपने आपको महदूद नहीं रखा, बल्कि उर्दू अख़बारात से जुड़कर समाजी और सियासी हलचल में भी हिस्सा लिया।
उनकी शायरी में लफ़्ज़ों की सजावट से ज़्यादा एहसास की सच्चाई अहम है। वह इश्क़ को महज़ एक रूमानी जज़्बे के तौर पर पेश नहीं करते, बल्कि उसे इंसानी फितरत का एक जरूरी हिस्सा समझते हैं। उनके अशआर में दर्द भी है, मगर वह दर्द मायूसी नहीं पैदा करता, बल्कि एक तरह की समझ और सलीका अता करता है।
उनके कलाम का एक अहम पहलू यह है कि उसमें मुल्क की गुलामी के खिलाफ एक सुलगती हुई बेचैनी मौजूद है। वह दौर, जब हिंदुस्तान अंग्रेज़ी हुकूमत के शिकंजे में जकड़ा हुआ था, उस वक्त अदब ने ही लोगों के दिलों में आज़ादी का जज़्बा जिंदा रखा। वफ़ा साहब ने भी अपने अशआर के ज़रिये इसी जज़्बे को आवाज़ दी।
यह शायरी किसी तकल्लुफ़ या अलंकार की मोहताज नहीं, बल्कि सीधे दिल से निकलकर अवाम के दिलों तक पहुँचने वाली है।
वफ़ा साहब की अदबी खिदमत का एक अहम हिस्सा उनके मजमूआत हैं। “सोज़ ए वतन” और “संग ए मील” जैसे संग्रह इस बात की गवाही देते हैं कि वह शायरी को महज़ तखय्युल का खेल नहीं समझते थे, बल्कि उसे समाजी और सियासी ज़िम्मेदारी का हिस्सा मानते थे। “सोज़ ए वतन” में जहाँ देशभक्ति का जज़्बा अपने पूरे शबाब पर है, वहीं “संग ए मील” में उनकी ग़ज़लें और नज़्में इंसानी एहसासात के मुख्तलिफ़ रंग पेश करती हैं।
उनकी शायरी में तंज़ और हक़ीक़त का भी गहरा रिश्ता है।
“ऐ वफ़ा दूर बहुत दूर है वो खुशहाली
जो नज़र आती है सरकार के एलानों में”
यह शेर महज़ एक तंज़ नहीं, बल्कि अपने दौर की सियासी हकीकत का आइना है।
वफ़ा की ग़ज़लों में इश्क़, दर्द और तसव्वुर एक खास रवानी के साथ बहते हैं।
“पूछे वो काश हाल दिले बेक़रार का
हम भी कहें कि शुक्र है परवरदिगार का”
यहाँ दर्द और सब्र दोनों साथ चलते हैं, और यही उनकी शायरी की खूबसूरती है।
उनके यहाँ ज़िंदगी और मौत का फलसफ़ा भी बेहद सादा मगर गहरा है।
“जीने वाले भी मर ही जाते हैं
मरने वालों का नाम होता है”
यह शेर इंसानी वजूद की असल अहमियत को सामने लाता है।

वफ़ा साहब की शायरी में एक तरफ रूहानियत है, तो दूसरी तरफ तहज़ीबी मेल मिलाप का रंग भी दिखाई देता है। “गणेशाय नमः” से शुरू होने वाला कलाम इस गंगा जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल है।
“ऐ कि हर दिल पर है अजमत नक्श तेरे नाम की
इब्तिदा करते हैं तेरे नाम से हर काम की”
यहाँ इश्क़ इबादत बन जाता है और मोहब्बत एक रूहानी तजुर्बा।
उनकी शायरी में ज़िंदगी की सख्त हकीकतें भी मौजूद हैं।
“ख़ौफ़ आता है जिस को मरने से
उस का जीना हराम होता है”
यहाँ वह इंसान को हिम्मत और यक़ीन का पैग़ाम देते हैं।
इसी तरह उनकी शायरी में बहार का जिक्र भी एक अलग अंदाज़ में आता है।
“महमान चार दिन का है मौसम बहार का”
यहाँ खुशी की नापायदारी और वक्त की फानी सूरत का एहसास है।
वफ़ा की शायरी का एक और दिलकश रंग उसकी रूमानियत है।
“तुम्हारी निगाह दिल को बहला गई
इशारों इशारों में समझा गई”
यहाँ सादगी और असरअंदाज़ी अपने उरूज पर है।
उनकी ग़ज़लों में दर्द, तड़प और याद का रंग भी पूरी शिद्दत से मौजूद है।
“गज़ब की है दाद आफरी तेरी याद
जब आई मेरे दिल को तड़पा गई”
और यह भी
“वफ़ा लग गया जी को आजार ए इश्क़
जवानी के बदले कज़ा आ गई”
इन अशआर में इश्क़ की वह गहराई है, जो इंसान को पूरी तरह अपने घेरे में ले लेती है।
वफ़ा साहब की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी, सच्चाई और असरअंदाज़ी है। वह मुश्किल अल्फ़ाज़ या पेचीदा तखय्युलात के सहारे अपनी बात कहने के क़ायल नहीं थे। उनकी कोशिश यही रहती थी कि शेर आम फ़हम हो और सीधा दिल तक पहुँचे।
उर्दू अदब की दुनिया में ऐसे शायर कम ही मिलते हैं, जिनकी ज़िंदगी और फ़न दोनों में एक जैसी सच्चाई और खलूस पाया जाता हो। वफ़ा साहब उन्हीं चंद नामों में से एक हैं। उनकी शायरी हमें यह सिखाती है कि अदब की असली ताक़त उसकी सादगी, सच्चाई और इंसानियत में है।
आज के दौर में, जब अदब कई तरह की नई तर्ज़ों और तजुर्बों से गुजर रहा है, वफ़ा जैसे शायरों की याद हमें यह एहसास दिलाती है कि लफ़्ज़ अगर दिल से निकले हों, तो वह वक्त की सीमाओं को पार कर हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
वफ़ा साहब का कलाम उर्दू अदब की उस रोशन विरासत का हिस्सा है, जो आने वाली नस्लों को न सिर्फ़ ज़बान की खूबसूरती से रूबरू कराता है, बल्कि उन्हें अपने इतिहास, अपनी तहज़ीब और अपने जज़्बात से भी जोड़ता है और यही उनकी सबसे बड़ी अदबी पहचान है।

